कोर्ट की मंजूरी के बिना न लगान रसीद रुकेगी, न जमाबंदी होगी रद्द; पटना हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, प्रशासन को सख्त संदेश

बी. के. झा

NSK News

पटना, 28 जून।

भूमि विवादों और राजस्व प्रशासन से जुड़े मामलों में बिहार के लाखों भू-स्वामियों के लिए राहत भरा और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सक्षम न्यायालय के आदेश के बिना वर्षों से जारी लगान रसीद पर रोक लगाना अथवा जमाबंदी रद्द करना पूरी तरह गैरकानूनी है। न्यायालय ने कहा कि यदि राज्य सरकार को किसी जमाबंदी की वैधता पर संदेह है तो उसका समाधान प्रशासनिक आदेशों से नहीं, बल्कि सक्षम न्यायालय के समक्ष विधिक प्रक्रिया अपनाकर ही किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार को तत्काल प्रभाव से याचिकाकर्ता के पक्ष में पुनः लगान रसीद जारी करने का निर्देश देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि कार्यपालिका कानून की निर्धारित सीमाओं से बाहर जाकर नागरिकों के संपत्ति संबंधी अधिकारों का हनन नहीं कर सकती।

60 वर्षों से कट रही थी लगान रसीद, फिर अचानक क्यों रोक दी गई?

यह मामला जमुई निवासी कृष्ण कुमार गोयनका द्वारा दायर रिट याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि संबंधित भूमि की लगान रसीद लगभग छह दशकों से नियमित रूप से जारी हो रही थी। इसके बावजूद प्रशासन ने बिना किसी सक्षम न्यायालय के आदेश के अचानक लगान रसीद पर रोक लगा दी और जमाबंदी रद्द करने की कार्रवाई प्रारंभ कर दी।मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय की एकलपीठ ने सरकार से तीखा सवाल किया कि जब लगभग 60 वर्षों से राजस्व अभिलेखों में जमाबंदी मान्य थी और नियमित रूप से लगान वसूला जा रहा था, तब बिना किसी न्यायिक आदेश के उसे समाप्त करने का अधिकार प्रशासन को किस आधार पर प्राप्त हुआ?

कोर्ट में मामला लंबित, फिर भी प्रशासन ने शुरू कर दी कार्रवाई

सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष यह तथ्य भी आया कि जब यह मामला पहले से ही हाईकोर्ट में विचाराधीन था, उसी दौरान संबंधित अंचल अधिकारी (सीओ) ने जमाबंदी रद्द करने की अनुशंसा कर दी। इतना ही नहीं, अपर समाहर्ता स्तर पर भी उस अनुशंसा पर कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई।इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायालय में मामला लंबित रहने के दौरान इस प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के समान है। न्यायालय ने कहा कि कार्यपालिका ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो अथवा न्यायालय के समक्ष लंबित विवाद निष्प्रभावी हो जाए।

प्रशासनिक आदेश नहीं, न्यायिक प्रक्रिया सर्वोपरि

अपने विस्तृत आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमाबंदी किसी प्रशासनिक अधिकारी की इच्छा मात्र से समाप्त नहीं की जा सकती। यदि सरकार को किसी जमाबंदी की वैधता पर संदेह है, तो उसे संबंधित सक्षम न्यायालय में वाद दायर कर कानूनी चुनौती देनी होगी।अदालत ने यह भी दोहराया कि कानून के शासन (Rule of Law) में प्रशासनिक सुविधा न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती। नागरिकों के संपत्ति संबंधी अधिकारों पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल निर्णय केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही लिया जा सकता है।

सीओ की कार्रवाई पर अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अंचल अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद जमाबंदी रद्द करने की अनुशंसा करना न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है। अदालत ने इस कार्रवाई को अवैध घोषित करते हुए पूरी प्रक्रिया निरस्त कर दी।साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता के पक्ष में पूर्ववत लगान रसीद जारी की जाए और विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए।

लाखों भूमि स्वामियों के लिए महत्वपूर्ण नजीर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार में भूमि और राजस्व प्रशासन से जुड़े हजारों मामलों के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल साबित हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में कई मामलों में बिना न्यायालय की अनुमति के जमाबंदी रद्द करने अथवा लगान रसीद रोकने की शिकायतें सामने आती रही हैं।इस फैसले से स्पष्ट संदेश गया है कि प्रशासनिक अधिकारियों को भी संविधान और कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्य करना होगा।

निर्णय का व्यापक प्रभाव

पटना हाईकोर्ट का यह फैसला नागरिकों के संपत्ति अधिकार, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और न्यायिक प्रक्रिया की सर्वोच्चता को पुनः स्थापित करता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक शक्ति असीमित नहीं है और कानून से ऊपर कोई भी अधिकारी नहीं हो सकता।यह निर्णय न केवल राजस्व प्रशासन की जवाबदेही को मजबूत करेगा, बल्कि उन हजारों लोगों के लिए भी उम्मीद की नई किरण बनेगा, जो वर्षों से जमाबंदी और लगान रसीद से जुड़े विवादों में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

स्पष्ट संदेश यही है—बिना सक्षम न्यायालय के आदेश के न तो वर्षों पुरानी जमाबंदी समाप्त की जा सकती है और न ही लगान रसीद पर रोक लगाई जा सकती है। कानून के शासन में अंतिम शब्द न्यायालय का ही होगा, प्रशासन का नहीं।

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