बी के झा
NSK News




नई दिल्ली/चंडीगढ़ , 2 जुलाई
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी कांग्रेस ने संगठन को नया स्वरूप देकर चुनावी रणनीति को धार देने की कोशिश तो की है, लेकिन इस फेरबदल ने पार्टी के भीतर नई राजनीतिक हलचल भी पैदा कर दी है। संगठनात्मक नियुक्तियों के बाद वरिष्ठ नेता एवं सांसद मनीष तिवारी की सार्वजनिक नाराज़गी और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की कथित असहमति ने यह संकेत दे दिया है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले कांग्रेस को अपने ही घर की चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है।
सबसे पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर भावुक टिप्पणी कर अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने लिखा— “है बड़ा कोई अवगुण उसमें, जिसे कोई हुनर आवे…”। इसके साथ उन्होंने कहा कि काश उनके पास कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं की असुरक्षा की भी कोई दवा होती। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पिछले 45 वर्षों में कांग्रेस ने उन्हें बहुत कुछ दिया, लेकिन उन्होंने भी अपना पूरा जीवन और युवावस्था पार्टी की सेवा में समर्पित कर दी।
अंत में उन्होंने लिखा— “अब जो होना है, वो होकर रहेगा।”राजनीतिक हलकों में इस टिप्पणी को महज़ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व के प्रति गहरे असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, कांग्रेस द्वारा घोषित नई संगठनात्मक टीम में चुनाव संचालन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण समितियों के अध्यक्षों और सह-अध्यक्षों की नियुक्ति की गई, लेकिन मनीष तिवारी को किसी भी प्रमुख संगठनात्मक जिम्मेदारी में स्थान नहीं मिला।
मनीष तिवारी पंजाब और चंडीगढ़ की राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। वे चंडीगढ़ से वर्तमान सांसद हैं, इससे पहले आनंदपुर साहिब और लुधियाना का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं। ऐसे अनुभवी नेता को नई संरचना में स्थान नहीं मिलने से राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।हालांकि कांग्रेस नेतृत्व इस विवाद को अधिक तूल नहीं देना चाहता। पार्टी के नेताओं का कहना है कि चूंकि मनीष तिवारी वर्तमान में चंडीगढ़ से सांसद हैं और चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए उनकी संगठनात्मक भूमिका पंजाब कांग्रेस के बजाय चंडीगढ़ कांग्रेस में तय की जाएगी।
पार्टी का दावा है कि यह निर्णय पूरी तरह संगठनात्मक ढांचे के अनुरूप है, किसी प्रकार की उपेक्षा नहीं।लेकिन मामला केवल मनीष तिवारी तक सीमित नहीं दिख रहा। संगठनात्मक फेरबदल के बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की नाराज़गी की चर्चाओं ने भी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
सूत्रों के अनुसार, चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के बावजूद चन्नी इस नई व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने अपने गृह क्षेत्र मोरिंडा में समर्थकों की बैठक बुलाकर राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी है। पिछले कुछ दिनों से उनकी सार्वजनिक चुप्पी और मीडिया से दूरी भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
कांग्रेस ने अपने नए संगठनात्मक ढांचे में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रताप सिंह बाजवा को यथावत रखा है। वहीं, चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव प्रचार समिति की कमान सौंपी गई है। सुखविंदर सिंह डैनी, राज कुमार वेरका और संगत सिंह गिलजियां को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। विजय इंदर सिंघला को चुनाव प्रबंधन एवं समन्वय समिति का अध्यक्ष, सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का प्रमुख तथा सांसद अमर सिंह को घोषणा-पत्र समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
विभिन्न समितियों में कई वरिष्ठ नेताओं को सह-अध्यक्ष और सदस्य के रूप में भी शामिल किया गया है।कांग्रेस का दावा है कि इन नियुक्तियों के माध्यम से सभी वर्गों, क्षेत्रों और सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है। विशेष रूप से दलित, पिछड़े वर्ग और अनुभवी नेताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की रणनीति अपनाई गई है ताकि चुनाव से पहले संगठन को अधिक मजबूत बनाया जा सके।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक संतुलन बनाना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक आवश्यक वरिष्ठ नेताओं की भावनाओं और महत्वाकांक्षाओं का समुचित प्रबंधन है। यदि नाराज़ नेताओं को समय रहते संतुष्ट नहीं किया गया तो इसका असर चुनावी तैयारियों और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ सकता है।पिछले कुछ महीनों से पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। स्वयं चरणजीत सिंह चन्नी पहले भी दलित नेतृत्व की कथित उपेक्षा का मुद्दा उठा चुके हैं।
ऐसे में नई नियुक्तियों के बाद दो वरिष्ठ नेताओं की असहजता कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक नई चुनौती बनती दिखाई दे रही है।
अब सबकी निगाहें कांग्रेस आलाकमान पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी असंतुष्ट नेताओं को साधने में कितनी सफल होती है।
क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल विपक्ष से मुकाबले का नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए अपनी आंतरिक एकजुटता की परीक्षा भी साबित हो सकता है। यदि संगठनात्मक असंतोष समय रहते दूर नहीं हुआ, तो चुनावी रणनीति पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है।
