बी. के. झा
NSK News

मथुरा, 6 जुलाई
देश के सबसे चर्चित धार्मिक एवं न्यायिक विवादों में शामिल श्रीकृष्ण जन्मभूमि–शाही ईदगाह प्रकरण में एक नया घटनाक्रम सामने आया है। वर्षों से न्यायालय में लंबित इस संवेदनशील मामले के बीच श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास ने अदालत के बाहर आपसी सहमति और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की पहल करते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मध्यस्थता करने की सार्वजनिक अपील की है। इसके साथ ही न्यास ने मुस्लिम पक्ष के समक्ष मेवात क्षेत्र में 10 एकड़ वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने तथा नई मस्जिद के निर्माण, स्थानांतरण एवं उससे जुड़े समस्त व्यय का वहन स्वयं करने का प्रस्ताव भी रखा है।
न्यास का कहना है कि न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई अपनी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी, किंतु यदि दोनों पक्ष आपसी विश्वास, सम्मान और सौहार्द के आधार पर समाधान तक पहुंचते हैं, तो यह केवल एक विवाद का अंत नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव का ऐतिहासिक उदाहरण भी बन सकता है।
न्यास के अध्यक्ष एवं हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप हिंदू पक्ष के सभी वादी निर्धारित तिथि पर न्यायालय में उपस्थित हुए थे। उनके अनुसार मुस्लिम पक्ष का कोई प्रतिनिधि उस दिन उपस्थित नहीं हुआ, जिससे निराशा उत्पन्न हुई। उन्होंने कहा कि इसी कारण अब ईदगाह कमेटी और अखिलेश यादव को पत्र लिखकर औपचारिक रूप से संवाद एवं मध्यस्थता का आग्रह किया गया है।न्यास का तर्क है कि अखिलेश यादव स्वयं को यदुवंशी परंपरा से जुड़ा बताते रहे हैं तथा सार्वजनिक रूप से भगवान श्रीकृष्ण से अपनी सांस्कृतिक विरासत का संबंध भी स्वीकार करते रहे हैं। इसी आधार पर उनसे अपेक्षा की गई है कि वे राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने और शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाएं।
प्रस्ताव के अनुसार यदि वर्तमान स्थल से मस्जिद को स्थानांतरित करने पर सहमति बनती है, तो मुस्लिम पक्ष को मेवात में 10 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही नई मस्जिद के निर्माण, स्थानांतरण तथा अन्य सभी आवश्यक व्यवस्थाओं का पूरा खर्च हिंदू पक्ष वहन करेगा। न्यास का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव या वैमनस्य नहीं, बल्कि दोनों समुदायों की गरिमा बनाए रखते हुए स्थायी एवं सम्मानजनक समाधान निकालना है।
दिनेश फलाहारी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली से जुड़ी आस्था करोड़ों लोगों की भावनाओं का विषय है। उनका विश्वास है कि यदि संवाद और सहमति का मार्ग अपनाया जाए, तो वर्षों से चला आ रहा यह विवाद बिना किसी कटुता के समाप्त हो सकता है। उन्होंने अखिलेश यादव से इस विषय पर अपना स्पष्ट रुख रखने तथा मध्यस्थता की जिम्मेदारी स्वीकार करने का आग्रह किया।
इस पहल पर प्रतिक्रिया देते हुए कुछ हिंदू धर्मगुरुओं ने कहा कि यदि अखिलेश यादव इस विवाद के समाधान में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं और दोनों पक्षों के बीच सहमति स्थापित कराने में सफल होते हैं, तो यह हिंदू–मुस्लिम सौहार्द की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जाएगी। उनके अनुसार ऐसा कदम सामाजिक विश्वास बढ़ाने और संवाद की नई परंपरा स्थापित करने में सहायक हो सकता है।
इन्हीं धर्मगुरुओं ने यह भी दावा किया कि यदि इस विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकलता है, तो अयोध्या आंदोलन के दौरान रामभक्तों पर हुई पुलिस फायरिंग की घटना को लेकर समाज में समाजवादी पार्टी पर वर्षों से लगते रहे आरोपों तथा उससे जुड़ी नकारात्मक छवि को कम करने की दिशा में भी एक सकारात्मक संदेश जा सकता है। हालांकि यह संबंधित धर्मगुरुओं के व्यक्तिगत विचार हैं और इन्हें उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह पहल आगे बढ़ती है और दोनों पक्ष औपचारिक संवाद की प्रक्रिया में शामिल होते हैं, तो यह केवल श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में अन्य संवेदनशील धार्मिक विवादों के समाधान के लिए भी संवाद-आधारित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
अब पूरे मामले पर राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जगत की निगाहें टिकी हुई हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या शाही ईदगाह प्रबंधन समिति इस प्रस्ताव पर विचार करेगी और क्या अखिलेश यादव मध्यस्थता की भूमिका स्वीकार करेंगे। यदि दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर आते हैं, तो वर्षों पुराने इस संवेदनशील विवाद के समाधान की दिशा में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है।
