बी के झा
NSK News






नई दिल्ली, 20 जुलाई
शिक्षा व्यवस्था में गहराते सड़न और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का संसद मार्च आज हिंसक झड़प में बदल गया। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ते प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की आंसू गैस और लाठीचार्ज ने पूरा माहौल तनावपूर्ण बना दिया। सूत्रों के अनुसार, झड़प में 50 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें 10 से ज्यादा आईपीएस और डीएएनआईपीएस अधिकारी शामिल हैं। कई पुलिसकर्मियों के फ्रैक्चर की पुष्टि हुई है।
वहीं दिल्ली पुलिस ने 70 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है और हमलावरों के खिलाफ बीएनएस की गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।यह आंदोलन महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि 152 पेपर लीक की घटनाओं से पीड़ित सात करोड़ से अधिक छात्रों के आक्रोश का प्रतीक बन गया है। जब मेहनती युवा परीक्षा की तैयारी में रात-दिन एक कर रहे थे, तब सिस्टम के अंदरूनी कैंसर ने उनके सपनों को चूर-चूर कर दिया। और सजा? दोषियों को नहीं, बल्कि उसी युवा वर्ग को, जो शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहा था।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं की तीखी प्रतिक्रिया:-
वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार विशेषज्ञ रामेश्वर सिंह चौहान ने इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताते हुए कहा, “छात्रों पर लाठीचार्ज लोकतंत्र की हत्या है। यह सरकार युवा-विरोधी एजेंडे को लेकर चल रही है। जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान 152 पेपर लीक के बाद भी कुर्सी पर कायम हैं, तो यह न केवल जवाबदेही की कमी दर्शाता है, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास को बढ़ावा देता है।”प्रसिद्ध वकील सीमा गुप्ता ने जोड़ा, “आंसू गैस और हिरासत का सहारा लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश अस्वीकार्य है। उच्चतम न्यायालय को इस पूरे प्रकरण पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। युवाओं का भरोसा टूट रहा है और यह टूटता भरोसा देश के भविष्य के लिए खतरा है।”
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री धीरेन्द्र मिश्रा ने कहा कि विरोध का अधिकार, हिंसा का नहींवरिष्ठ अधिवक्ता श्री धीरेन्द्र मिश्रा ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है, किंतु यह अधिकार कानून-व्यवस्था को बाधित करने या हिंसक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं देता।उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में असहमति और विरोध की पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति या समूह कानून अपने हाथ में लेता है, सार्वजनिक व्यवस्था भंग करता है अथवा पुलिस एवं सुरक्षाबलों पर हमला करता है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होना न्यायसंगत और आवश्यक है। साथ ही, यदि पुलिस कार्रवाई को लेकर भी कोई शिकायत या आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है।”उन्होंने आगे कहा कि “कानून का शासन (Rule of Law) लोकतंत्र की आधारशिला है। प्रदर्शन का उद्देश्य संवाद होना चाहिए, टकराव नहीं। जिस प्रकार संयम प्रदर्शनकारियों से अपेक्षित है, उसी प्रकार कानून लागू करने वाली एजेंसियों से भी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन अपेक्षित है।”
समाज सेवी संस्थाओं का आक्रोश
विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी सरकार की भूमिका की कड़ी निंदा की है। युवा अधिकार मंच के संयोजक अनिल शर्मा ने कहा, “यह आंदोलन शिक्षा के व्यावसायीकरण और घोटालों के खिलाफ है। सोनम वांगचुक जैसे समर्पित कार्यकर्ता 23वें दिन भी अनशन पर डटे हुए हैं, जबकि युवा नेता अस्पताल में हैं। सरकार को उनकी मांगों—धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पेपर लीक की निष्पक्ष जांच—को तुरंत स्वीकार करना चाहिए।”जनहित अभियान की प्रमुख डॉ. मीनाक्षी राव ने टिप्पणी की, “पुलिस पर पथराव निंदनीय है, लेकिन मूल कारण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब सत्ता युवाओं की आवाज को दबाने में लगी हो, तो ऐसी झड़पें अपरिहार्य हो जाती हैं। हमें एक संतुलित जांच समिति का गठन चाहिए जिसमें न्यायपालिका, छात्र प्रतिनिधि और स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हों।”
घटनाक्रम और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
प्रदर्शन के दौरान CJP नेताओं अभिजीत दीपके और सौरव दास ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की। दीपके ने अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन साफ कहा कि जब तक सोनम वांगचुक का अनशन जारी है, आंदोलन चलेगा।
वांगचुक ने अस्पताल से संदेश दिया:
“मैं अनशन जारी रखूंगा। युवाओं के साथ बेरहमी देखकर यह फैसला लिया है। सरकार छात्रों को संसद में अपनी बात रखने की इजाजत दे।”इस बीच राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “भारत के सबसे युवा-विरोधी प्रधानमंत्री” करार देते हुए तीखा हमला बोला। राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने लाठीचार्ज को “लोकतंत्र पर हमला” बताया।
दिल्ली पुलिस ने शांति बनाए रखने की अपील की
दिल्ली पुलिस ने शांति बनाए रखने की अपील की है और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आगे की कार्रवाई का संकेत दिया।
गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच हुई बैठक के बाद भी कोई ठोस फैसला सामने नहीं आया। जंतर-मंतर को खाली करा लिया गया है, लेकिन CJP ने स्पष्ट कर दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा, जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं।
सवाल उठते हैं यह घटनाक्रम कई सवाल खड़े करता है:
क्या पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर केवल दमन ही समाधान है?
क्या शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगना गैर-जायज है जब लाखों छात्रों का भविष्य अंधकार में है?
क्या सत्ता पक्ष अब युवा ऊर्जा को केवल “उकसावा” मानकर खारिज कर देगा?
CJP का यह आंदोलन अब सिर्फ NEET लीक तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे शिक्षा तंत्र की सफाई, जवाबदेही और युवा भारत के सपनों की रक्षा का प्रतीक बन गया है। सरकार को अब देर न करनी चाहिए। युवाओं का धैर्य सीमा पार कर चुका है।
