काले कपड़ों में संसद पहुंचा विपक्ष, प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचे विरोध की गूंज; सरकार बोली—‘लोकतंत्र नहीं, अराजकता की राजनीति’

बी के झा

करीब 25 वर्षों से देश के प्रमुख राष्ट्रीय हिन्दी अखबार में वरिष्ठ पत्रकार के रुप में निष्पक्षता से लिखते आ रहे हैं।

NSK News

नई दिल्ली, 22 जुलाई

संसद के मानसून सत्र के बीच बुधवार को राजधानी का राजनीतिक तापमान उस समय और बढ़ गया, जब कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के सांसद काले कपड़े पहनकर संसद पहुंचे और छात्र आंदोलनों, कथित पुलिस कार्रवाई, परीक्षा पेपर लीक तथा बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

वहीं भारतीय जनता पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि “अराजकता की राजनीति” करार देते हुए विपक्ष पर संवैधानिक मर्यादाओं को लांघने का आरोप लगाया।संसद परिसर से लेकर प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचे विरोध ने सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को और तीखा बना दिया। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर लोकतांत्रिक मूल्यों के उल्लंघन का आरोप लगाते रहे, जबकि देश की निगाहें इस राजनीतिक संघर्ष पर टिकी रहीं।

मकर द्वार पर काले वस्त्रों में विपक्ष का प्रदर्शन

बुधवार सुबह संसद परिसर में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सांसद काले वस्त्र पहनकर मकर द्वार के सामने एकत्र हुए। विपक्ष का कहना था कि यह विरोध छात्र आंदोलनों के दौरान हुई कथित पुलिस कार्रवाई, विपक्षी नेताओं के साथ हुए व्यवहार तथा शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सरकार की कथित उदासीनता के खिलाफ है।कांग्रेस सांसद के. सुरेश ने कहा कि काले कपड़े लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक हैं और यह प्रदर्शन विपक्ष के नेताओं के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में आयोजित किया गया है।राष्ट्रीय जनता दल के सांसद संजय यादव ने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि देश में बार-बार परीक्षा प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं, युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है और पारदर्शिता की मांग करने वाले छात्रों की आवाज दबाई जा रही है।

राहुल गांधी की अगुवाई में पीएम आवास तक पहुंचा विरोध

मंगलवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा तथा अन्य विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास की ओर मार्च किया। उनकी मांग थी कि कथित परीक्षा पेपर लीक प्रकरण में जवाबदेही तय की जाए, छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जांच हो तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें।दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए नेताओं को आगे बढ़ने से रोका और बाद में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव सहित कई नेताओं को हिरासत में ले लिया। कुछ घंटों बाद सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया।प्रियंका गांधी ने पुलिस कार्रवाई के बाद कहा कि “हम डरने वाले नहीं हैं। यदि सरकार को लगता है कि हिरासत में लेकर आवाज दबा देगी, तो यह उसकी गलतफहमी है।

“कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी मंदिर मार्ग थाना पहुंचीं और हिरासत में लिए गए नेताओं की जानकारी ली।

बीजेपी का पलटवार—‘यह लोकतांत्रिक विरोध नहीं, अराजकता है

’विपक्ष के प्रदर्शन पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी।भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देना लोकतांत्रिक विरोध की मर्यादा का उल्लंघन है।उन्होंने कहा, “राहुल गांधी ने जिस प्रकार का व्यवहार किया, वह अशोभनीय और निंदनीय है। यह असहमति की राजनीति नहीं, बल्कि अराजकता की राजनीति है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक काला दिन है।”उन्होंने आगे कहा कि नेता प्रतिपक्ष का पद अत्यंत गरिमामय होता है और उस पद पर बैठे व्यक्ति से संविधान तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है।नितिन नवीन ने कहा कि प्रधानमंत्री केवल किसी एक राजनीतिक दल के नेता नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। ऐसे में उनके आधिकारिक आवास तक विरोध मार्च ले जाना लोकतांत्रिक विरोध और संस्थागत मर्यादा के बीच की सीमा को धुंधला करने का प्रयास माना जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष छात्रों के मुद्दे, पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे संवेदनशील विषयों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहा है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक अवसरवाद और सड़क की राजनीति बताकर जनता के बीच अलग संदेश देना चाहती है।विश्लेषकों का कहना है कि यदि छात्र आंदोलन पूरी तरह राजनीतिक संघर्ष का स्वरूप ले लेते हैं तो मूल मुद्दे पीछे छूटने का खतरा बढ़ जाता है।

संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण

कानूनविदों के अनुसार भारतीय संविधान शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों—जैसे संसद और प्रधानमंत्री आवास—की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी राज्य का संवैधानिक दायित्व है।उनका कहना है कि पुलिस की कार्रवाई की वैधता का आकलन परिस्थितियों, सुरक्षा इनपुट, निषेधाज्ञा और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। वहीं किसी भी विरोध प्रदर्शन में बल प्रयोग की आवश्यकता और अनुपातिकता की समीक्षा भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शिक्षाविदों की चिंता

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़े हैं। इन विषयों पर सरकार और विपक्ष दोनों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर ठोस समाधान प्रस्तुत करने चाहिए।

समाजसेवी संस्थाओं की अपील

कई सामाजिक संगठनों ने सरकार और विपक्ष दोनों से संयम बरतने की अपील की है। उनका कहना है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद है, टकराव नहीं। छात्र आंदोलनों को हिंसा और राजनीतिक ध्रुवीकरण से दूर रखते हुए उनके मूल मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

संसद से सड़क तक सियासी संघर्ष

वर्तमान घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था, युवाओं का भविष्य और बेरोजगारी अब केवल सामाजिक या प्रशासनिक मुद्दे नहीं रह गए हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच चुके हैं। एक ओर विपक्ष इन्हें जनआंदोलन का रूप देने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर भाजपा इसे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास बता रही है।

आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर यह टकराव और तेज होने की संभावना है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह राजनीतिक संघर्ष छात्रों की वास्तविक समस्याओं के समाधान तक पहुंचेगा, या फिर आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शन के बीच मूल मुद्दे एक बार फिर पीछे छूट जाएंगे।

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