नेताओं की लेटलतीफी से उड़ा *कार्यक्रम का मजाक: कुर्सी सिर पर रखकर निकल गईं महिलाएं, बोलीं — “छठ का प्रसाद मिला नहीं, कुर्सी ही सही!”

बी के झा

NSK

फारबिसगंज (अररिया) / न ई दिल्ली, 26 अक्टूबर

बिहार की सियासत में एक बार फिर जनता ने नेताओं को आईना दिखा दिया — वो भी एक “कुर्सी” के सहारे! फारबिसगंज स्थित दीनदयाल चौक पर रविवार को एनडीए के प्रधान चुनाव कार्यालय के उद्घाटन कार्यक्रम में जो नजारा देखने को मिला, उसने तमाशबीनों को हंसी और नेताओं को शर्म दोनों दे दी।

कार्यक्रम का समय था शाम 4 बजे, लेकिन नेताजी आए “बिहार टाइम” पर — यानी जब जनता का सब्र टूट चुका था। सुबह से ही स्थानीय महिलाएं छठ पूजा की साड़ी और सामग्री की आस में स्थल पर डेरा डाले बैठी थीं। जैसे-जैसे सूरज पश्चिम की ओर ढलने लगा, वैसे-वैसे उम्मीदें भी ढहने लगीं।“साड़ी नहीं मिली, तो कुर्सी ही सही!”जब नेताजी का कोई अता-पता नहीं मिला, तो नाराज महिलाओं ने तय कर लिया कि खाली हाथ नहीं लौटेंगी। किसी ने सिर पर, किसी ने कंधे पर कुर्सी उठाई — और बोलीं, “जब नेताजी आए ही नहीं, तो कुर्सी ही प्रसाद समझ लीजिए!”देखते ही देखते उद्घाटन स्थल “कुर्सी सम्मेलन” से “कुर्सी पलायन” में बदल गया।

कुछ महिलाएं तो हंसी-हंसी में कहती सुनी गईं — “नेता जी कुर्सी के लिए राजनीति करते हैं, हम तो कुर्सी लेकर ही जा रहे हैं!”

कार्यकर्ताओं ने रोका, पर ‘महिला शक्ति’ के आगे सब हार गए मौके पर मौजूद एनडीए कार्यकर्ताओं ने समझाने की कोशिश की, पर महिलाएं बोलीं —

“अबकी बार नेताजी से साड़ी नहीं, हिसाब चाहिए!”

टेंट हाउस वालों ने भी अपनी कुर्सियां बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन तब तक आधी कुर्सियां महिलाओं के सिर पर और आधी नेताओं की उम्मीदों पर जा चुकी थीं।

महागठबंधन ने कसा तंज: “

कुर्सी गई, वोट भी जाएगा”घटना की खबर फैलते ही विपक्ष ने मौके का फायदा उठाया।

महागठबंधन के नेताओं ने तंज कसते हुए कहा —एनडीए के नेता जनता से वोट लेने में फुर्ती दिखाते हैं, लेकिन कार्यक्रम में पहुंचने में घड़ी भूल जाते हैं। अब जनता ने दिखा दिया कि कुर्सी का असली मालिक कौन है!

नेताओं का जवाब: ‘कुछ शरारती तत्वों ने किया माहौल खराब’दूसरी ओर, एनडीए की ओर से सफाई आई कि “कुछ शरारती तत्वों ने माहौल खराब किया” — लेकिन वीडियो देखकर खुद नेताओं की हंसी छूट गई।

जनता बोली — नेताजी आएं या न आएं, छठ पूजा हम करेंगे

स्थानीय महिलाएं अब इस घटना को मजाक में लेते हुए कह रही हैं —नेता जी तो वोट के वक्त ही दिखेंगे, लेकिन छठ मइया हर साल आती हैं। इस बार छठ घाट पर नई कुर्सी जरूर रखेंगे — नेताजी की याद में!”

“कुर्सी का खेल” तो राजनीति में आम है, लेकिन इस बार जनता ने खेल पलट दिया।नेता नहीं आए — तो कुर्सी ही घर ले गए लोग।

अब नेताजी सोच में हैं कि अगली बार कार्यक्रम रखें या फर्नीचर का इंश्योरेंस कराएं!

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