बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 22 नवंबर
राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए उस समय हलचल तेज हो गई, जब अल फलाह यूनिवर्सिटी टेरर मॉड्यूल से जुड़े डॉक्टरों की फंडिंग और ऑपरेशनल योजना की परतें खुलनी शुरू हुईं। पहली नजर में ये सब उच्च शिक्षित और समाजसेवी लगने वाले युवा डॉक्टर दरअसल पिछले दो वर्षों से भारत की राजधानी और कई बड़े शहरों में सीरियल ब्लास्ट की साजिश रच रहे थे।जांच एजेंसियों ने अब उन सभी वित्तीय, रणनीतिक और लॉजिस्टिक कड़ियों को जोड़ लिया है, जो इस मॉड्यूल को एक खतरनाक आतंकी नेटवर्क में बदलने के लिए पर्याप्त थे।
कैसे जुटाए गए 26 लाख रुपये?—
शिक्षित आतंकियों की “सेल्फ फंडिंग” मॉडल का पर्दाफाशजांच में सामने आया है कि इस मॉड्यूल ने किसी बाहरी स्रोत से नहीं, बल्कि खुद की कमाई से एक बड़ा “टेरर फंड” तैयार किया।एजेंसियों के मुताबिक:डॉ. मुजम्मिल: 5 लाख रुपये डॉ. आदिल अहमद राथर: 8 लाख रुपये डॉ. मुफ्फर अहमद राथर: 6 लाख रुपये डॉ. उमर मोहम्मद: 2 लाख रुपये डॉ. शाहीना शाहिद: 5 लाख रुपये कुल: 26,00,000 रुपये कैश में ये सभी रकम एक जगह इकट्ठी कर डॉ. उमर को सौंपी गई, जो पूरे ऑपरेशन का “एडमिन और केमिकल मास्टरमाइंड” था।
किसकी क्या भूमिका थी?—
सामने आया आतंकी मॉड्यूल का पूरा ब्लूप्रिंटजांच एजेंसियों ने सभी सदस्यों की भूमिकाएं इस प्रकार चिन्हित की हैं:
डॉ. मुजम्मिल — विस्फोटक सामग्री की खरीद3 लाख रुपये से NPK और अमोनियम-यूरिया मिश्रित खाद खरीदा।इन्हें प्रोसेस कर विस्फोटक बनाने की प्रारंभिक जिम्मेदारी संभाली।
डॉ. उमर मोहम्मद — मुख्य केमिस्ट और तकनीकी जिम्मेदारीविस्फोटक को एक्टिव फॉर्म में बदलना।रिमोट डिवाइस, केमिकल ट्रिगर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और डिटोनेशन सिस्टम तैयार करना।एजेंसियों के अनुसार उमर इस मॉड्यूल का “ब्रेन” था।
बाकी सदस्य — फंडिंग, लॉजिस्टिक्स और छात्रों का ब्रेन वॉश कश्मीरी छात्रों को जोड़ना कैंपस व अस्पतालों की रेकी सुरक्षित ठिकानों की तलाश दो साल की भयावह तैयारी—
दिल्ली सहित कई शहर थे निशाने पर जांच एजेंसियों के मुताबिक, वर्ष 2023 से यह मॉड्यूल गुप्त रूप से विस्फोटक, रिमोट और हथियारों के पुर्जों को इकट्ठा कर रहा था।पूरे ऑपरेशन की तैयारी अत्यंत संगठित और पेशेवर ढंग से की गई थी।
सूत्रों का कहना है कि:इस मॉड्यूल ने दिल्ली, उत्तर भारत के कई शहरों, अस्पतालों और गेस्ट हाउस को संभावित ब्लास्ट टार्गेट के रूप में लिस्ट किया था।”क्या हमास मॉडल की नकल?—
बरामद वीडियो ने खोला बड़ा राज
एजेंसियों ने इन डॉक्टरों के फोन से:हमास की टनल वारफेयर हथियारों को अस्पतालों/गेस्ट हाउस में छिपाने के तरीकेऔर भूमिगत बंकर मॉडल जैसे कई वीडियो बरामद किए हैं।एक शीर्ष रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार:यह मॉड्यूल हमास की तरह मेडिकल और हॉस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर को हथियार भंडारण के लिए इस्तेमाल करने का मॉडल फॉलो कर रहा था। भारत में इसकी शुरुआत होना बेहद गंभीर चेतावनी है।
”दूसरी ओर, पूर्व RAW अधिकारी का कहना है:शिक्षित आतंकियों की यह पीढ़ी इंटरनेट मॉड्यूल पर चलती है। यह अधिक खतरनाक इसलिए है, क्योंकि उनके पास तकनीकी ज्ञान, पहचान छिपाने की क्षमता और संस्थानों तक आसान पहुंच होती है।”
अल फलाह यूनिवर्सिटी में ब्रेनवॉश—डॉक्टर्स बने कट्टरपंथी एजेंट एजेंसियों की जांच से खुलासा हुआ है कि:मुजम्मिल और उमर को जैश-ए-मोहम्मद की ओर से निर्देश मिलते थेये दोनों यूनिवर्सिटी में कश्मीर के छात्रों को टारगेट करते थे एक विशेष टेलीग्राम ग्रुप में केवल कश्मीरी छात्र शामिल थे कैंपस की लैब, मेडिकल सुविधा, गेस्ट हाउस और सुरक्षा गार्डों की गतिविधियों की रेकी की जाती थी एक
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने इस मामले पर टिप्पणी की:शिक्षण संस्थानों का राष्ट्र-विरोधी नेटवर्क में बदलना भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस केस ने साबित किया है कि कट्टरपंथी संगठनों का फोकस अब उच्च शिक्षित युवाओं पर है।”देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चेतावनी की घंटी इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं
—उच्च शिक्षित लोग आतंक की राह पर क्यों?
क्या भारत के शिक्षण संस्थान नए ‘टार्गेट ज़ोन’ बन रहे हैं?हमास जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंक मॉडल का भारत में प्रभाव कैसे पहुंच रहा है?
एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल ने इस पूरी साजिश पर टिप्पणी की:यह केवल एक केस नहीं, बल्कि वैश्विक आतंकवाद के नए ‘इंटेलिजेंट मॉड्यूल’ का नमूना है। भारत को अब आतंकवाद के इस नए चेहरे—डिजिटल, शिक्षित और सेल्फ फंडेड—के लिए तैयार रहना होगा।”
निष्कर्ष
अल फलाह यूनिवर्सिटी मॉड्यूल का पर्दाफाश सिर्फ एक आतंकी गिरोह को पकड़ने का मामला नहीं है, यह नई पीढ़ी के हाई-टेक आतंकवाद की ओर संकेत करता है।फंडिंग, तकनीक, टनल मॉडल, अस्पतालों की रेकी और कश्मीरी छात्रों को कट्टरपंथ की ओर मोड़ने की कोशिश—
ये सब मिलकर इसे भारत की हालिया सबसे बड़ी आतंकी साजिशों में से एक बनाते हैं।
