बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली, 11 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और इसके साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं। इसी बीच सी वोटर के अक्टूबर महीने के ताजा सर्वे ने बिहार की राजनीति में नई हलचल मचा दी है। सर्वे के मुताबिक, मुख्यमंत्री पद के पसंदीदा उम्मीदवारों में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव लगातार सबसे आगे हैं, जबकि जन सुराज के प्रशांत किशोर (PK) की लोकप्रियता में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है — जो एनडीए के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है ।
तेजस्वी यादव की छलांग —
युवाओं का भरोसा और जनता की उम्मीदेंसी वोटर के सर्वे में तेजस्वी यादव को 36.3% लोगों ने पसंदीदा मुख्यमंत्री उम्मीदवार बताया है। फरवरी में जहां उनका समर्थन 40% से ऊपर था, वहीं अगस्त तक यह घटकर 31% रह गया था। लेकिन सितंबर और अक्टूबर में तेजस्वी ने एक बार फिर मजबूत वापसी की है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी का बढ़ता ग्राफ उनके युवापन, सक्रियता और जमीनी जुड़ाव की वजह से है। उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता से लगातार संवाद बनाए रखा है।तेजस्वी यादव अब सिर्फ लालू यादव के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि युवा नेतृत्व के प्रतीक बनते जा रहे हैं।जनता का एक बड़ा वर्ग, विशेषकर पहली बार वोट डालने वाले युवा, यह महसूस कर रहा है कि अब बिहार को “पुरानी राजनीति नहीं, नई सोच” की जरूरत है।
प्रशांत किशोर की रफ्तार –
‘जन सुराज’ से जनता के बीच नई लहरइस सर्वे का दूसरा बड़ा चौंकाने वाला पहलू है प्रशांत किशोर की लोकप्रियता में लगातार वृद्धि।जन सुराज के सूत्रधार पीके को 23.2% रेटिंग मिली है, जो सितंबर के 23.1% से थोड़ा ऊपर है।हालांकि यह बढ़ोतरी मामूली लगती है, लेकिन जब यह रफ्तार एक वर्ष में 14% से बढ़कर 23% तक पहुंच जाए, तो यह बताता है कि जनता विकल्प खोज रही है।पीके की छवि एक ईमानदार और विकास-केन्द्रित योजनाकार की रही है, और यही बात बिहार के उन मतदाताओं को आकर्षित कर रही है जो अब जातीय समीकरणों से आगे देखना चाहते हैं।
नीतीश कुमार की गिरावट —
थकान और असंतोष की राजनीतिबिहार के सबसे अनुभवी राजनेता नीतीश कुमार अब पहले जैसी चमक खोते दिख रहे हैं।सर्वे के अनुसार, नीतीश की रेटिंग सितंबर के 16% से घटकर अक्टूबर में 15.9% रह गई है।लगातार सत्ता में बने रहने के बावजूद जनता में थकान, असंतोष और अविश्वास की भावना बढ़ रही है।नीतीश की सरकार पर ठेकेदारी व्यवस्था, भ्रष्टाचार, जल संसाधन मंत्रालय में अनियमितता और “विकास के नाम पर सियासी दिखावा” जैसे आरोप लगते रहे हैं।कभी “सुशासन बाबू” कहलाने वाले नीतीश कुमार के लिए अब यह टैग बचाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।तेजस्वी की लोकप्रियता के पीछे लालू की विरासत भी एक कारण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव की लोकप्रियता में एक और पहलू जुड़ा है —
लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत।भले ही लालू को चारा घोटाले में दोषी ठहराया गया, लेकिन जनता के बीच यह भावना गहराई से है कि असली चारा घोटाले का सूत्रधार पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा थे, जिन्हें कांग्रेस ने लंबे समय तक संरक्षण दिया।दरअसल, कांग्रेस ने लालू यादव के बढ़ते जनाधार से घबराकर उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर करने की रणनीति अपनाई थी।
लालू ने भले ही जातीय राजनीति की राह पर शुरुआत की हो, लेकिन उनके शासनकाल में गरीबों, दलितों और पिछड़ों को आवाज मिली —
यह भावना आज भी बिहार के वोटर के दिलों में जीवित है।संजय झा और नीतीश सरकार पर सवालराजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि पूर्व जल संसाधन मंत्री संजय झा, जो डॉ. मिश्रा के परिवार से आते हैं, नीतीश सरकार में सबसे प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं में से रहे हैं।उनके कार्यकाल में ठेकेदारी और कमीशनखोरी के कई आरोप लगे।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जिस लूट और भ्रष्टाचार की बात भाजपा लालू शासन के खिलाफ करती थी, वही भ्रष्टाचार अब एनडीए सरकार में कई गुना बढ़ गया है।
युवाओं ने बना लिया मन —
अबकी बार बदलाव की बयार”बिहार के राजनीतिक माहौल में इस बार एक बात साफ दिख रही है —
युवाओं और जागरूक मतदाताओं का मूड बदल चुका है।लोग अब जातीय वादों या मुफ्त योजनाओं के बजाय रोजगार, शिक्षा, उद्योग और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर वोट देने का मन बना रहे हैं।
एक स्थानीय समाजसेवी ने कहा —
बिहार की जनता अब थक चुकी है। नीतीश और एनडीए ने बहुत मौके पाए, लेकिन बिहार वहीं का वहीं रह गया। अब जनता को एक नया चेहरा चाहिए, और वह चेहरा तेजस्वी यादव हैं।”उन्होने कहा बिहार में इस बार के चुनाव में जात-पात का मुद्दा कोई माने नहीं रखता है बस बिहार को ठेकेदारी प्रथा से मुक्ति मिलनी चाहिए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर भी तंज कसते हुए कहा कि चारा घोटाले के मूख्य सूत्रधार डाँ जगन्नाथ मिश्रा का बेटा उनके पार्टी से विधायक भी हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी फिर तेजस्वी क्यों नहीं पहली पसंद बन सकते हैं बिहारियों के लिए।
चिराग और सम्राट की स्थितिसी वोटर सर्वे के अनुसार,चिराग पासवान की रेटिंग सितंबर के 9.5% से घटकर 8.8% रह गई है।वहीं भाजपा नेता सम्राट चौधरी की रेटिंग 6.8% से बढ़कर 7.8% हुई है।हालांकि इन दोनों नेताओं का जनाधार सीमित है, पर अगर समीकरण सही बने, तो ये “किंगमेकर” की भूमिका में आ सकते हैं।
निष्कर्ष — 2025 का चुनाव बनेगा पीढ़ियों का मुकाबला
बिहार का 2025 विधानसभा चुनाव अब केवल “गठबंधन बनाम गठबंधन” नहीं, बल्कि पीढ़ी बनाम पीढ़ी का मुकाबला बन चुका है —
एक तरफ नीतीश की थकी हुई प्रशासनिक शैली,दूसरी तरफ तेजस्वी की ऊर्जा और प्रशांत किशोर की रणनीति।बिहार की जनता इस बार शायद वही करेगी, जो पूरे देश को चौंका दे —विकास और बदलाव के नाम पर वोट
