बिहार चुनाव: महागठबंधन में सीट बंटवारे की जंग तेज, कांग्रेस 60 सीटों पर अड़ी, RJD ने शुरू की टिकट बांटने की प्रक्रिया

बी के झा

NSK

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पटना / नई दिल्ली, 14 अक्टूबर

बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं, लेकिन महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-VIP-वामदल) के भीतर सीट बंटवारे को लेकर जारी रस्साकशी अब खुलकर सामने आ गई है। एक ओर RJD ने अपने उम्मीदवारों को चुनावी सिंबल (चिह्न) बांटने शुरू कर दिए हैं, वहीं कांग्रेस अभी भी 60 सीटों की मांग पर अड़ी हुई है। उधर, विकासशील इंसान पार्टी (VIP) और वामपंथी दल भी अपनी-अपनी सीटों को लेकर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अगर जल्द सहमति नहीं बनी, तो यह मतभेद महागठबंधन को भारी पड़ सकते हैं।

तेजस्वी ने बांटे सिंबल, कांग्रेस अब भी असमंजस में

RJD नेता तेजस्वी यादव ने सीट बंटवारे की घोषणा के बिना ही कुछ उम्मीदवारों को सिंबल दे दिया है।जानकारी के मुताबिक, परबत्ता से डॉ. संजीव कुमार, मटिहानी से बोगो सिंह, हथुआ से राजेश कुमार सिंह (राजेश कुशवाहा), मनेर से भाई वीरेंद्र, साहेबपुर कमाल से ललन यादव और संदेश से मौजूदा विधायक किरण देवी के बेटे दीपू यादव को टिकट दे दिया गया है।हालांकि, कुछ उम्मीदवारों द्वारा सोशल मीडिया पर सिंबल साझा किए जाने से तेजस्वी नाराज हुए और उन्हें फटकार लगाई।

RJD प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने दावा किया कि “बिहार में जल्द बड़ा ‘खेला’ होगा,” लेकिन गठबंधन के भीतर चल रही अनिश्चितता ने बेचैनी जरूर बढ़ा दी है।

तेजस्वी की दिल्ली यात्रा रही बेनतीजा

सोमवार को तेजस्वी यादव दिल्ली पहुंचे थे ताकि कांग्रेस नेतृत्व से अंतिम बात कर सकें। उन्होंने राहुल गांधी से फोन पर चर्चा की, लेकिन आमने-सामने मुलाकात नहीं हो सकी।

नतीजा — कोई ठोस सहमति नहीं बनी।वापस पटना लौटते ही RJD ने अपने स्तर पर टिकट वितरण शुरू कर दिया, जिससे संकेत मिला कि पार्टी अब कांग्रेस की लंबी मांगों का इंतज़ार नहीं करना चाहती।महागठबंधन में सबसे बड़ा पेंच: कांग्रेस की 60 सीटों की मांगकांग्रेस ने 60 सीटों की मांग रखी है, जबकि RJD अधिकतम 50-55 सीटें देने पर तैयार है।

2020 में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल 19 सीटें ही जीत पाई थी।इस बार लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव खराब प्रदर्शन को देखते हुए सतर्क रुख अपना रहे हैं।उनका मानना है कि अधिक सीटें देने से “स्ट्राइक रेट फिर गिर सकता है” और महागठबंधन की समग्र स्थिति कमजोर हो सकती है।

VIP और वामपंथी दलों की भी अपनी शर्तेंमुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) कम से कम 20 सीटें चाहती है।RJD ने शर्त रखी है कि इनमें से 10 सीटों पर RJD के उम्मीदवार VIP के सिंबल पर लड़ेंगे।सहनी इस प्रस्ताव से नाखुश हैं और डिप्टी सीएम पद की भी उम्मीद लगाए बैठे हैं।

वहीं वामपंथी दल — CPI, CPM और CPI(ML) — ने 75 सीटों की मांग की है, जबकि RJD 19 से ज्यादा देने को तैयार नहीं।सीटों को लेकर टकराव वाली प्रमुख सीटें गठबंधन के भीतर विवाद कुछ सीटों पर और गहरा हो गया है —कहलगांव (भागलपुर): पारंपरिक रूप से कांग्रेस की सीट, लेकिन तेजस्वी यादव यहां RJD उम्मीदवार उतारना चाहते हैं।बछवारा (बेगूसराय): 2020 में कांग्रेस के पास थी, लेकिन इस बार RJD इसे CPI को देना चाहती है। कांग्रेस यहां अपने उम्मीदवार शिवप्रकाश गरीबदास को उतारने के मूड में है।नरकटियागंज (पश्चिम चंपारण): पिछली बार कांग्रेस से विनय वर्मा लड़े थे, इस बार RJD दीपक यादव को मौका देना चाहती है।इन सीटों पर झगड़ा अभी थमा नहीं है और बातचीत जारी है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: “देरी से होगा नुकसान”

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि महागठबंधन जितनी देर करेगा, उतना ही NDA को बढ़त मिलेगी।NDA पहले ही सीट बंटवारे का फार्मूला तय कर चुका है और भाजपा ने अपनी पहली सूची भी जारी कर दी है।इससे महागठबंधन पर दबाव बढ़ गया है।

एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार —> “2020 में कांग्रेस की कमजोर स्ट्राइक रेट और VIP के सीमित जनाधार को देखते हुए RJD को फैसले में सख्ती दिखानी होगी। अगर यह टकराव लंबा खिंचा तो एकजुटता का संदेश खत्म हो जाएगा।”

अंदरखाने की हकीकत:

असमंजस और अहंकार महागठबंधन में सीटों को लेकर केवल रणनीति नहीं, ‘इगो क्लैश’ भी बड़ी वजह बन गया है।कांग्रेस के कई स्थानीय नेता मानते हैं कि पार्टी का जनाधार अब सीमित रह गया है, लेकिन नेतृत्व फिर भी “राष्ट्रव्यापी प्रभाव दिखाने की कोशिश” में सीटों की संख्या बढ़ाना चाहता है।उधर, मुकेश सहनी खुद को सत्ता का ‘किंगमेकर’ मानते हुए डिप्टी सीएम की मांग तक रख चुके हैं, जबकि उनकी पार्टी के पास पिछले चुनाव में दो से अधिक सीटें नहीं थीं।

निष्कर्ष:

एकजुटता ही चुनौती, समय कम बचा बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म है, और NDA ने पहले ही प्रचार अभियान तेज कर दिया है।महागठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती अब एकता और समय पर निर्णय है।

अगर कांग्रेस, RJD, VIP और वामदल जल्द कोई फॉर्मूला नहीं निकालते, तो उम्मीदवारों की नाराज़गी और देरी से प्रचार का नुकसान निश्चित है।

अब सबकी निगाहें कांग्रेस की आज होने वाली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक पर टिकी हैं —क्या इस बैठक में फॉर्मूला तय होगा या महागठबंधन के भीतर की खींचतान और बढ़ेगी?बिहार की सियासत में यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

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