महागठबंधन या ‘लठबंधन’? बिहार में सीट बंटवारे पर बवाल, सहनी की चेतावनी से मचा सियासी भूचाल

NSK

पटना/ नई दिल्ली, 16 अक्टूबर

बिहार की सियासत एक बार फिर उबाल पर है। विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण के नामांकन की अंतिम घड़ी करीब है, लेकिन विपक्षी महागठबंधन अब भी सीट बंटवारे के झमेले में उलझा है। हालात ऐसे हैं कि जनता सवाल पूछने लगी है — ये महागठबंधन है या लठबंधन?

तेजस्वी यादव, राहुल गांधी और मुकेश सहनी की तिकड़ी अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां एक गलत फैसला पूरे समीकरण को पलट सकता है।

दिल्ली-पटना के बीच सियासी पिंग-पोंगतेजस्वी यादव सोमवार को दिल्ली पहुंचे थे — उम्मीद थी कि राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे से आमने-सामने मुलाकात कर विवाद सुलझा लेंगे। लेकिन हुआ उल्टा। मुलाकात नहीं हुई और बातचीत फिर टल गई। अब जब नामांकन का वक्त सिर पर है, तेजस्वी ने अपने रणनीतिक सलाहकार संजय यादव को दिल्ली भेजा है ताकि कांग्रेस हाईकमान से आखिरी समझौता कराया जा सके।पटना में महागठबंधन के सूत्रों का कहना है कि अब खुद राहुल गांधी इस मसले को देख रहे हैं, लिहाजा जल्द कोई सहमति बनने की संभावना जताई जा रही है। लेकिन तेजस्वी यादव के करीबी मानते हैं कि हर बार की तरह “एक-दो दिन में” का बयान अब जनता के बीच मज़ाक बन चुका है।

सहनी के धैर्य का बांध टूटा, तीन बार टाली प्रेस कॉन्फ्रेंसविकासशील इंसान पार्टी (VIP) के मुखिया मुकेश सहनी अब तक की बातचीत से खासे नाराज हैं। गुरुवार को उन्होंने पटना में दोपहर 12 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली थी — यह कदम कांग्रेस और राजद दोनों के लिए अलार्म की घंटी था।राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने उन्हें फोन कर किसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस टलवाई, लेकिन सहनी ने साफ चेतावनी दी — “अगर कल सुबह तक सीटों की सूची नहीं मिली, तो वीआईपी अपना रास्ता अलग करेगी।”सूत्रों के अनुसार, देर शाम वीआईपी को कुछ सीटों की एक प्रारंभिक लिस्ट थमाई गई है, लेकिन सहनी उसे लेकर पार्टी नेताओं से अंतिम मंथन कर रहे हैं। अगर बात नहीं बनी, तो वे इसे ‘अति पिछड़ा (EBC) कार्ड’ के रूप में भुनाने की रणनीति बना रहे हैं — यानी “EBC को डिप्टी सीएम नहीं बनने दिया गया” का मुद्दा।

कौन कितनी सीट पर अड़ा?अब तक की स्थिति में राजद लगभग 50, कांग्रेस 22, माले 18, सीपीआई 6 और सीपीएम 4 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुके हैं।सिर्फ वीआईपी ही ऐसी पार्टी है जिसका ठिकाना तय नहीं।राजद और कांग्रेस के बीच यह सहमति बनी थी कि सहनी को 18 सीटें मिलेंगी — जिनमें से 10 राजद और 8 कांग्रेस छोड़ेंगी। लेकिन जब सहनी को संख्या बताई गई, तब तक सीटों की लिस्ट लापता थी।सीपीआई के एक वरिष्ठ नेता ने खुलकर कहा, “कांग्रेस की ज़िद ने महागठबंधन की बढ़त मिटा दी है। एनडीए अपने मतभेदों के बावजूद मैदान में उतर चुका है, जबकि हम आपसी टकराव में फंसे हैं।

कांग्रेस की ‘धीमी रणनीति’, लालू-तेजस्वी की ‘बेचैनी’कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पिछले दो हफ्तों से रोज़ कहते आ रहे हैं — “घोषणा बस कल या परसों होगी।”लेकिन तेजस्वी के धैर्य की परीक्षा अब चरम पर है। उन्होंने दिल्ली जाकर खुद पहल की, मगर राहुल गांधी की प्राथमिकताएं अलग दिखीं।कांग्रेस अब भी तेजस्वी को सीएम चेहरा और सहनी को डिप्टी सीएम घोषित करने के पक्ष में नहीं है।इसका असर इतना गहरा है कि सोशल मीडिया पर कांग्रेस और राजद नेताओं के बीच शेरो-शायरी और दोहे की जंग छिड़ गई है।

बीजेपी और शाह की नजरें तैयार सियासी मौके परइधर एनडीए ने न सिर्फ अपने सभी उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है बल्कि अमित शाह खुद पटना पहुंच चुके हैं।वे एनडीए के नामांकन कार्यक्रमों में शामिल होंगे और चुनाव प्रचार की संयुक्त रणनीति तय करेंगे।सियासी पंडितों का कहना है — “अगर राहुल गांधी की सुस्ती जारी रही, तो इस बार तेजस्वी यादव को ऐसा झटका लग सकता है जिससे आरजेडी की वापसी बेहद मुश्किल हो जाएगी।

विश्लेषण:

विपक्ष के अंदर की फूट, एनडीए के लिए वरदान?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष की यह अंतर्कलह, खासकर कांग्रेस और वीआईपी के बीच की रस्साकशी, एनडीए के लिए अप्रत्याशित लाभ लेकर आ सकती है।तेजस्वी अगर इस चुनाव में कमजोर प्रदर्शन करते हैं, तो आरजेडी की साख को गहरी चोट लगेगी और बिहार में एक नए नेतृत्व की जरूरत पैदा होगी — जिसे पप्पू यादव या मुकेश सहनी जैसे चेहरे भरने की कोशिश करेंगे।

निष्कर्ष:

बिहार की राजनीति एक बार फिर ‘घड़ी की सुइयों’ से नहीं, स्वार्थ और अहंकार के टकराव से चल रही है।जहां एनडीए एकजुट होकर मैदान में है, वहीं महागठबंधन अब भी तय नहीं कर पा रहा कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन।ऐसे में जनता का सवाल बिल्कुल जायज़ है —क्या ये महागठबंधन सचमुच एकजुट है, या फिर यह सिर्फ एक “लठबंधन” बनकर रह जाएगा?

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