महाराजाओं के शहर में करें सैर: कम बजट में घूमने के लिए बेस्ट बिहार का दरभंगा जिला

बी के झा

NSK

दरभंगा/ हरिना, झंझारपुर (बिहार) /नई दिल्ली, 13 अक्टूबर

अगर आप इतिहास, आध्यात्म और प्राकृतिक सुंदरता का संगम एक ही जगह पर कम बजट में देखना चाहते हैं, तो बिहार का दरभंगा जिला आपकी अगली यात्रा का स्वर्ग बन सकता है।मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाने वाला यह शहर न केवल अपने राजसी वैभव के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां के मंदिर, किले, संग्रहालय और प्राकृतिक अभयारण्य इसे भारत के सबसे विशिष्ट पर्यटन स्थलों में शामिल करते हैं।

दरभंगा को ‘महाराजाओं का शहर’ कहा जाता है, जहां एक ओर शाही महलों की भव्यता है तो दूसरी ओर रामायण काल की पौराणिक गाथाएं जीवंत हैं।1. अहिल्यास्थान — रामायण काल की जीवंत कथा दरभंगा के कमतौल रेलवे स्टेशन से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को समर्पित है। मान्यता है कि यहीं भगवान श्रीराम ने अहिल्या को पत्थर से मनुष्य रूप में मुक्त किया था।हर वर्ष रामनवमी और विवाह पंचमी पर यहां विशाल मेला लगता है, जो मिथिला के धार्मिक जीवन का अभिन्न अंग है।

2. श्यामा काली मंदिर — तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र1933 में निर्मित यह मंदिर स्थानीय लोगों के बीच ‘श्यामा माई’ के नाम से प्रसिद्ध है।माना जाता है कि इसका निर्माण दरभंगा महाराज की अस्थियों पर हुआ था और इसमें सात नदियों के पवित्र जल का उपयोग किया गया था।ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय परिसर में स्थित यह मंदिर अपनी हरियाली और ‘श्यामा माई उत्सव’ के लिए प्रसिद्ध है।

3. दरभंगा किला — शाही वैभव का प्रतीकराज किला के नाम से प्रसिद्ध यह विशाल परिसर दरभंगा राजवंश की ऐतिहासिक विरासत है।फतेहपुर सीकरी की तर्ज़ पर बना यह किला कभी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह का शाही निवास हुआ करता था।यहां राम बाग पैलेस, नागना पैलेस, और कंकाली मंदिर जैसे कई ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं जो दर्शकों को बीते युग की शाही जीवनशैली से परिचित कराते हैं।

4. चंद्रधारी संग्रहालय — इतिहास की जीवंत झलक1957 में स्थापित यह संग्रहालय मानसरोवर झील के पूर्वी तट पर स्थित है।यहां 11 दीर्घाओं में कांच, हाथी दांत, लकड़ी और मिट्टी से बनी अद्भुत कलाकृतियां प्रदर्शित हैं।नेपाल और तिब्बत से लाई गई बुद्ध प्रतिमाएं तथा रामायण पर आधारित पेंटिंग्स इसकी प्रमुख विशेषता हैं।

ध्यान रहे — यह संग्रहालय हर सोमवार बंद रहता है।5. कुशेश्वरस्थान बर्ड सेंचुरी — प्रवासी पक्षियों का स्वर्गवन्यजीव प्रेमियों के लिए कुशेश्वरस्थान किसी जन्नत से कम नहीं।यह सेंचुरी 14 गांवों के क्षेत्र में फैली है और प्राकृतिक आर्द्रभूमियों से घिरी है।हर साल नवंबर से मार्च के बीच यहां साइबेरिया और मंगोलिया से आने वाले दुर्लभ प्रवासी पक्षी बसेरा करते हैं, जिनमें साइबेरियन क्रेन और डेलमेटियन पेलिकन प्रमुख हैं।पास ही स्थित कुशेश्वरनाथ मंदिर इस क्षेत्र को धार्मिक महत्व भी प्रदान करता है।

कभी मिथिलांचल की शान था दरभंगा राजवंश कभी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के शासन में दरभंगा मिथिलांचल की गौरवशाली राजधानी थी।उनकी शालीनता, विद्वता और सनातन धर्म के प्रति निष्ठा ने दरभंगा को विश्व पटल पर पहचान दी।

मगर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के शासनकाल में, दरभंगा की राजधानी जैसी हैसियत और ‘आर्यावर्त’ अखबार की स्वायत्त आवाज़ — दोनों को धीरे-धीरे मिटा दिया गया।फिर भी दरभंगा और मधुबनी आज भी दुनिया के सबसे दार्शनिक, सांस्कृतिक और किफायती शहरों में गिने जाते हैं।

कंदरपी घाट (हरिना गांव) — इतिहास में खोया हुआ एक तीर्थ स्थलदरभंगा जिला से सटे मधुबनी के अंधराठाढ़ी प्रखंड में स्थित हरिना गांव, जिसे कंदरपी घाट के नाम से भी जाना जाता है, मिथिला के इतिहास का एक भुला दिया गया अध्याय है।कहा जाता है कि यहीं दरभंगा महाराज ने नेपाल के महाराजा को परास्त कर अपना शासन स्थापित किया था।विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने यहां माता दक्षिणेश्वरी नरेंद्र विजया काली की मूर्ति की स्थापना की थी।उस समय इस मंदिर के निर्माण में स्वर्गीय मथुरा झा का महत्वपूर्ण योगदान था।बाद में कमला नदी की बाढ़ में यह प्राचीन मंदिर जलमग्न हो गया।फिर उनके पोते स्वर्गीय हरिश्चंद्र झा ने अपनी निजी भूमि पर पुनः मां नरेन्द्र विजया काली मंदिर की स्थापना की, जो आज भी श्रद्धा का केंद्र है।

दुर्भाग्यवश, यह ऐतिहासिक स्थल आज भी बिहार सरकार और केंद्र सरकार — दोनों की उपेक्षा का शिकार है।स्थानीय लोग आज भी उम्मीद लगाए हैं कि एक दिन कंदरपी घाट को उसका ऐतिहासिक दर्जा वापस मिलेगा, और यह स्थल देश-दुनिया के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनेगा।

अंतिम पंक्ति — विरासत को पहचान दिलाने की जरूरत दरभंगा और मधुबनी की धरती केवल मिथिला चित्रकला या छठ पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली इतिहास, अध्यात्म और शौर्य गाथाओं के लिए भी जानी जानी चाहिए।कंदरपी घाट जैसे गुमनाम स्थल, हमारे अतीत की वह धरोहर हैं जिन्हें अगर संरक्षित किया जाए, तो यह क्षेत्र पर्यटन और संस्कृति दोनों के क्षेत्र में एक नया स्वर्ण अध्याय लिख सकता है।

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