जीना है तो मरना सीखो…” पिता की पुण्यतिथि पर बोले चिराग पासवान, बिहार चुनाव से पहले बीजेपी-जेडीयू की बढ़ी चिंता

*जीना है तो मरना सीखो…” पिता की पुण्यतिथि पर बोले चिराग पासवान, बिहार चुनाव से पहले बीजेपी-जेडीयू की बढ़ी चिंता* बी के झा पटना / नई दिल्ली, 8 अक्टूबर बिहार की सियासत इन दिनों पूरी तरह गरमाई हुई है। विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद अब सभी राजनीतिक दल सीट बंटवारे को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। ऐसे में एनडीए के घटक दलों में चल रही खींचतान के बीच लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान का ताजा बयान भाजपा और जेडीयू दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहा है।दरअसल, बुधवार को अपने पिता दिवंगत केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पुण्यतिथि पर चिराग पासवान ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए एक भावनात्मक संदेश साझा किया। लेकिन इस श्रद्धांजलि में छिपा सियासी संदेश अब बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की सुगबुगाहट बढ़ा रहा है।जीना है तो मरना सीखो…” से मिला सियासी संकेतचिराग पासवान ने अपने पिता को याद करते हुए ट्वीट किया —पापा हमेशा कहा करते थे — जुर्म करो मत, जुर्म सहो मत। जीना है तो मरना सीखो, कदम-कदम पर लड़ना सीखो।यह ट्वीट सिर्फ भावनात्मक श्रद्धांजलि नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है — खासतौर पर तब, जब एनडीए में सीट शेयरिंग पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई है।बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट” का संकल्पअपने दूसरे ट्वीट में चिराग ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया। उन्होंने लिखा —पापा, आपकी पुण्यतिथि पर आपको मेरा नमन। मैं विश्वास दिलाता हूं कि आपके दिखाए मार्ग और आपके विजन ‘बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट’ को साकार करने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हूं। बिहार के समग्र विकास का जो सपना आपने देखा था, अब समय आ गया है उसे धरातल पर उतारने का।”उन्होंने आगे कहा कि बिहार का आगामी चुनाव “लोकतंत्र का महापर्व” है, और यह अवसर है बिहार को नई दिशा देने का।सीट बंटवारे पर सस्पेंस बरकरारसूत्रों के अनुसार, एनडीए के अन्य घटक दलों — जेडीयू, हम और रालोजपा — के साथ सीटों को लेकर लगभग सहमति बन चुकी है। लेकिन लोजपा (रामविलास) के साथ बातचीत अब भी जारी है। चिराग पासवान ने खुद कहा कि वह अभी इस पर कुछ नहीं बोलेंगे।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2020 की तरह अगर इस बार भी चिराग को “सम्मानजनक सीट” नहीं मिली, तो वह एक बार फिर एनडीए से अलग राह चुन सकते हैं। पिछले चुनाव में उनकी बगावत का खामियाजा नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को उठाना पड़ा था।बीजेपी-जेडीयू की बढ़ी टेंशनचिराग के इस रुख ने भाजपा और जेडीयू दोनों की चिंता बढ़ा दी है। भाजपा चाहती है कि लोजपा (रामविलास) उसके साथ रहे ताकि दलित और युवा वोट बैंक प्रभावित न हो। वहीं, जेडीयू को डर है कि अगर चिराग फिर से अलग रास्ता चुनते हैं, तो कई सीटों पर वोट कटवा फैक्टर जेडीयू के नुकसान का कारण बन सकता है।पिता की विरासत, बेटे की परीक्षा”राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव चिराग पासवान के लिए राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा है। एक तरफ पिता रामविलास पासवान की विरासत को जिंदा रखना है, वहीं दूसरी ओर बिहार की सियासत में अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी है।बिहार की जनता की नजरें चिराग परजैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, बिहार की जनता की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या चिराग एनडीए के साथ बने रहेंगे या फिर “बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट” के नारे के साथ एक बार फिर अकेले मैदान में उतरेंगे। निष्कर्ष:रामविलास पासवान की पुण्यतिथि पर बेटे चिराग का यह संदेश जितना भावनात्मक था, उतना ही सियासी भी। “जीना है तो मरना सीखो…” जैसी पंक्तियों में जहां पिता की सीख झलकती है, वहीं बिहार की राजनीति में आने वाले संघर्ष की झलक भी साफ दिखाई देती है।

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