बी के झा
NSK

गोरखपुर / नई दिल्ली, 16 फरवरी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक Mohan Bhagwat के उस वक्तव्य ने देशव्यापी विमर्श को जन्म दे दिया है, जिसमें उन्होंने कहा कि “इस देश में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है।” यह वक्तव्य उन्होंने गोरखपुर के तारामंडल क्षेत्र स्थित योगीराज गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में संघ के गोरक्ष प्रांत द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रमुख जनों को संबोधित करते हुए दिया।संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि हिंदू कोई संकीर्ण पहचान नहीं, बल्कि एक व्यापक जीवन-दृष्टि है। उनके शब्दों में, “हिंदू शब्द संज्ञा नहीं, बल्कि विशेषण है—जो सबको साथ लेकर चलता है। रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक है।”
हिंदुत्व की व्याख्या:
समन्वय, सहिष्णुता और मोक्ष
संघ प्रमुख ने कहा कि हिंदू समाज का मूल स्वभाव समन्वयवादी है—“हम मानते हैं कि हमारा रास्ता भी ठीक है और तुम्हारा भी।” यही वह भाव है, जो विविध पंथों, संप्रदायों और आस्थाओं को एक सूत्र में बांधता है।उन्होंने हिंदू धर्म को मोक्ष की ओर ले जाने वाला जीवन-मार्ग बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल उद्देश्य अपने लिए नहीं, दूसरों के हित में चलना है।
राष्ट्र, धर्म और संस्कृति:
संघ की वैचारिक रूपरेखा संघ प्रमुख ने भारत को धर्मप्राण राष्ट्र बताया और कहा कि धर्म हमारे आचरण में रचा-बसा है। संस्कारों की पीढ़ीगत परंपरा से संस्कृति बनी और उसी संस्कृति के आधार पर राष्ट्र का निर्माण हुआ।उन्होंने मातृशक्ति को भारत को जोड़ने वाला आधार बताया और कहा कि विविधता के बावजूद “हम एक हैं”—यही भारत की आत्मा है।“
संघ सत्ता या लोकप्रियता का आकांक्षी नहीं”Rashtriya Swayamsevak Sangh की भूमिका स्पष्ट करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संघ न तो सत्ता चाहता है, न प्रभाव और न ही लोकप्रियता।उनका कहना था, “समाज यदि स्वयं स्वस्थ होकर अपना दायित्व निभाने लगे, तो संघ की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।”उन्होंने बाइबिल के एक वाक्य का उल्लेख करते हुए कहा—“हम किसी को नष्ट करने नहीं, बल्कि जोड़ने आए हैं।”
स्वतंत्रता संग्राम की चार धाराएं
संघ प्रमुख ने भारत की स्वतंत्रता यात्रा को चार वैचारिक धाराओं में विभाजित किया—क्रांति की धारा, जो Subhas Chandra Bose तक चली।राजनीतिक जागृति की धारा, जिसमें जनचेतना को स्वतंत्रता की कुंजी माना गया।आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और समाज सुधार की धारा।मूल की ओर वापसी की धारा, जिसे Swami Vivekananda और Swami Dayanand Saraswati ने आगे बढ़ाया।
उन्होंने कहा कि इन सभी धाराओं से K. B. Hedgewar का संपर्क रहा और इन्हीं से संघ की वैचारिक नींव पड़ी।
पंच परिवर्तन: संघ का शताब्दी एजेंडा
संघ प्रमुख ने संघ के शताब्दी वर्ष के लक्ष्य के रूप में पंच परिवर्तन का उल्लेख किया—
सामाजिक समरसता
नागरिक कर्तव्यबोध
पर्यावरण संरक्षण
कुटुंब प्रबोधनस्व का बोध
उनका कहना था कि इन्हीं के माध्यम से सशक्त, संगठित और भव्य समाज का निर्माण संभव है।
राजनीतिक विश्लेषक: “वैचारिक विस्तार, चुनावी संकेत भी
”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वक्तव्य केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संदेश भी है।एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार, “हिंदू को जीवन-दृष्टि के रूप में परिभाषित करना संघ की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पहचान की राजनीति को सांस्कृतिक समन्वय में बदला जा रहा है।”
शिक्षाविदों की राय: दार्शनिक दृष्टि बनाम सामाजिक यथार्थ
शिक्षाविदों का एक वर्ग इसे भारतीय दर्शन की समन्वयवादी परंपरा से जोड़कर देखता है, जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि ऐसे वक्तव्यों की व्याख्या बेहद सावधानी से होनी चाहिए, ताकि सामाजिक विविधता पर प्रश्नचिह्न न लगे।
कानूनविद: संवैधानिक परिप्रेक्ष्य जरूरी
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “दार्शनिक स्तर पर कही गई बातों और संवैधानिक पहचान के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।”
हिंदू संगठनों व धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
कई हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं ने संघ प्रमुख के वक्तव्य का समर्थन करते हुए कहा कि यह समावेशी हिंदुत्व की व्याख्या है, जो किसी को बाहर नहीं करती।
मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं की प्रतिक्रिया
मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने बयान पर संयमित प्रतिक्रिया दी।एक मौलाना ने कहा, “यदि ‘हिंदू’ शब्द को सांस्कृतिक पहचान के रूप में समझा जाए और धार्मिक स्वतंत्रता बनी रहे, तो संवाद संभव है। लेकिन इसे धार्मिक पहचान पर थोपना स्वीकार्य नहीं होगा।”
विपक्षी दल: “सांस्कृतिक दर्शन या राजनीतिक विमर्श?”
विपक्षी दलों ने बयान को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना है कि ऐसे वक्तव्यों से समाज में अनावश्यक भ्रम और ध्रुवीकरण की आशंका रहती है।एक विपक्षी नेता ने कहा, “देश की विविधता ही उसकी ताकत है। किसी भी विचार को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके देखना कठिन है।
निष्कर्ष:
विचार का विस्तार, बहस का विस्तार
गोरखपुर से दिया गया यह वक्तव्य केवल संघ का वैचारिक पक्ष नहीं, बल्कि भारत की पहचान, संस्कृति और सह-अस्तित्व पर एक व्यापक बहस को जन्म देता है।एक ओर इसे समन्वय और समरसता का संदेश बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसके सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थों पर गंभीर चर्चा शुरू हो चुकी है।
स्पष्ट है कि यह बयान केवल एक मंचीय वक्तव्य नहीं, बल्कि आने वाले समय में वैचारिक और राजनीतिक विमर्श की दिशा तय करने वाला प्रसंग बन चुका है।
