बिहार में NDA ने सीट बांटकर तेजस्वी को दी ‘राहत’, देरी में भी सुकून की वजह क्या है?

बी के झा

पटना / नई दिल्ली, 13 अक्टूबर

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे की पहेली आखिरकार एनडीए खेमे में सुलझ गई है। बीजेपी और जेडीयू ने बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लेकर जहां गठबंधन की एकता का संदेश दिया है, वहीं चिराग पासवान की पार्टी लोजपा-रामविलास को 29 सीटें देकर संतुलन साधने की कोशिश की गई है।इस बंटवारे से एनडीए ने न केवल चुनावी तैयारियों में बढ़त बना ली है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से महागठबंधन के भीतर चल रही खींचतान को भी हवा दे दी है।

एनडीए में सीट बंटवारा फाइनल: बीजेपी-जेडीयू बराबर, पासवान को बड़ा हिस्सा एनडीए ने रविवार को ऐलान किया कि बीजेपी और जेडीयू दोनों 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, जबकि लोजपा-रामविलास के हिस्से में 29 सीटें आई हैं।यह पहला मौका है जब बीजेपी और जेडीयू पूरी तरह बराबर सीटों पर चुनाव मैदान में उतर रही हैं। इससे भगवा दल ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब वह बिहार की राजनीति में जूनियर नहीं, बल्कि बराबर का साझेदार है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक

बीजेपी का यह कदम नीतीश कुमार के दबदबे को संतुलित करने और अपने संगठन को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।महागठबंधन को ‘मुकेश सहनी’ के रूप में मिली राहत एनडीए के इस कदम का असर विपक्षी खेमे — महागठबंधन — में भी महसूस किया जा रहा है।

तेजस्वी यादव को फिलहाल सबसे बड़ी राहत मुकेश सहनी से मिली है, जो पिछले कुछ हफ्तों से लगातार दबाव की राजनीति कर रहे थे।

सहनी की पार्टी — विकासशील इंसान पार्टी (VIP) — महागठबंधन का हिस्सा है, लेकिन वे आरजेडी से अपनी शर्तें मनवाने में जुटे थे।उनकी दो मुख्य मांगें थीं —

1. सीटों की संख्या बढ़ाई जाए, और

2. सरकार बनने पर उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जाए।

मुकेश सहनी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि चाहे उन्हें 14 सीटें मिलें या 44, लेकिन डिप्टी सीएम की कुर्सी उन्हीं की होनी चाहिए, क्योंकि उनका “समुदाय अब उन्हें उसी रूप में देखना चाहता है।”तेजस्वी यादव और आरजेडी नेतृत्व इन मांगों पर राजी नहीं थे। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही थी कि सहनी पलटी मारकर एनडीए का रुख कर सकते हैं।

NDA के ऐलान ने महागठबंधन की चिंता घटाईलेकिन अब जब एनडीए ने सीटों का बंटवारा फाइनल कर दिया है, तो मुकेश सहनी के लिए खेमे बदलना कठिन हो गया है।

राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, एनडीए के अंदर नई एंट्री के लिए अब जगह लगभग बंद हो चुकी है। यही वजह है कि आरजेडी और कांग्रेस खेमे में एक “सुकून की सांस” देखी जा रही है।अब तेजस्वी यादव पर सहनी के दबाव का असर कम होगा और महागठबंधन चुनावी रणनीति पर फोकस कर सकेगा।

2020 की याद:

तब जेडीयू थी बड़ी, अब बराबरी पर बीजेपी

गौर करने वाली बात यह है कि 2020 के चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 43 पर जीती थी, जबकि बीजेपी ने 110 पर लड़े और 74 सीटें जीतीं।यानी स्ट्राइक रेट के लिहाज से बीजेपी कहीं आगे थी।विश्लेषक मानते हैं कि इसी प्रदर्शन का हवाला देकर बीजेपी ने इस बार जेडीयू से बराबरी की मांग की और उसे मनवा भी लिया।पासवान फैक्टर: NDA में भी समीकरण दिलचस्प लोजपा-रामविलास को 29 सीटें मिलना एक अहम संकेत है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इन सीटों पर बीजेपी अपने प्रभाव वाले उम्मीदवारों को भी मैदान में उतार सकती है, ताकि वोट ट्रांसफर सुचारू रहे।लोजपा की युवा नेतृत्व टीम बिहार के युवा मतदाताओं को साधने में एनडीए की मदद कर सकती है।

राजनीतिक तस्वीर साफ, पर मुकाबला अभी बाकी एनडीए ने एक तरफ जहां सीट बंटवारे में बढ़त बनाकर चुनावी मैदान में बढ़त बना ली है, वहीं महागठबंधन ने राहत की सांस तो ली है, लेकिन चुनौती खत्म नहीं हुई है।आरजेडी को अब न केवल अपने भीतर के समीकरणों को संभालना है, बल्कि कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के साथ तालमेल को भी मजबूत बनाना है।

निचोड़

एनडीए ने अपने घर को सजा लिया है, जबकि महागठबंधन ने भीतर के तूफान को फिलहाल शांत कर लिया है।अब असली परीक्षा मैदान में होगी — जहां सियासी हवा तय करेगी कि तेजस्वी की राहत टिकाऊ है या नीतीश-भाजपा की बढ़त निर्णायक

NSK

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *