बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 19 नवंबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया भाषण की सराहना करना कांग्रेस सांसद शशि थरूर के लिए राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। थरूर द्वारा इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका व्याख्यान में प्रधानमंत्री के वक्तव्य की प्रशंसा करने के बाद पार्टी के भीतर से उन पर उठे सवालों ने कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को एक बार फिर सार्वजनिक कर दिया है।थरूर ने अपने विस्तृत एक्स पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी के उस भाषण के कई हिस्सों की तारीफ़ की थी, जिसमें पीएम ने मैकाले की ‘गुलामी की मानसिकता’ और भारत की भाषाओं, परंपराओं और ज्ञान प्रणाली को पुनर्स्थापित करने के 10 वर्षीय राष्ट्रीय मिशन पर जोर दिया था। थरूर ने लिखा कि उन्हें यह देखकर प्रसन्नता हुई कि प्रधानमंत्री ने “चुनावी मोड” से हटकर “भावनात्मक मोड” में जनता की समस्याओं पर बात की।
कांग्रेस में असहजता, BJP का तीखा प्रहार थरूर की इस सराहना ने कांग्रेस के भीतर असहजता पैदा कर दी। कुछ नेताओं ने इसे पार्टी लाइन से विचलन और राजनीतिक असावधानी करार दिया।लेकिन असली राजनीतिक प्रहार भाजपा की ओर से आया। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा:“कांग्रेस उन नेताओं के खिलाफ फ़तवा जारी कर देती है जो राष्ट्रीय हित को पारिवारिक हित से ऊपर रखते हैं। जो पार्टी लोकतंत्र का पाठ पढ़ाती है, उसके अंदर ही लोकतंत्र नहीं बचा है।
”इतना ही नहीं, भाजपा ने कांग्रेस की तुलना करते हुए कहा कि पार्टी का विस्तार “इंदिरा नाज़ी कांग्रेस” के रूप में किया जाना चाहिए, क्योंकि उसके व्यवहार में “आपातकालीन मानसिकता और तानाशाही प्रवृत्ति” दिखाई देती है।
विश्लेषण: थरूर की भूमिका और कांग्रेस की दुविधा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थरूर कांग्रेस में उस धड़े का प्रतिनिधित्व करते हैं जो वैचारिक रूप से अधिक उदार, आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से प्रेरित है।उनका प्रधानमंत्री के भाषण की प्रशंसा करना किसी वैचारिक लचीलेपन या सकारात्मकता का संकेत हो सकता है, लेकिन कांग्रेस की चुनौती यह है कि ऐसी टिप्पणियों को भाजपा तुरंत अपने राजनीतिक आख्यान में पिरो देती है—जिससे पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े होते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार चुनाव में करारी हार और संगठनात्मक अनिश्चितता के बीच कांग्रेस पहले ही दबाव में है। ऐसे समय में थरूर जैसे कद के नेता की स्वतंत्र टिप्पणी को पार्टी भीतर “अनुशासन का उल्लंघन” समझती है, जबकि भाजपा इसे “कांग्रेस की सहिष्णुता की कमी” साबित करने का अवसर मानती है।थरूर का स्टैंड: आलोचना नहीं, केवल सराहना
थरूर ने स्वयं स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा का अर्थ यह नहीं कि वे राजनीतिक मतभेदों से पीछे हट रहे हैं। उनके अनुसार,“जहाँ अच्छी बात है, वहाँ तारीफ करने में हिचक क्यों?
राष्ट्रीय मुद्दों पर सकारात्मक दृष्टिकोण रखना किसी भी सांसद का कर्तव्य है।”सियासी असर: पार्टी लाइन बनाम व्यक्तिगत विचारथरूर–
कांग्रेस मतभेद की यह घटना दिखाती है कि भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत बौद्धिक स्वतंत्रता और कठोर पार्टी अनुशासन के बीच तनाव लगातार बना हुआ है।जहाँ भाजपा इसे कांग्रेस की कमजोरी बताकर अपने राजनीतिक संदेश को और धार देती है,
वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह विविध विचारों को किस सीमा तक स्वीकार करेगी, विशेषकर तब जब उसे चुनावी झटकों से उबरने के लिए आंतरिक एकजुटता की सबसे अधिक आवश्यकता है।
