राहुल गांधी के आरोपों पर SIT जांच की मांग ठुकराई; सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “यहां क्यों आए हैं?”

बी के झा

NSK

नई दिल्ली , 13 अक्टूबर

मतदाता सूची में गड़बड़ियों को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी है। सोमवार को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की शिकायतों का समाधान चुनाव आयोग या संबंधित मंचों पर किया जा सकता है, लेकिन जनहित याचिका (PIL) के ज़रिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में नहीं।

जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा

आपकी शिकायत का निवारण अन्य कानूनी माध्यमों से किया जा सकता है। जनहित के नाम पर इस अदालत में आने की ज़रूरत नहीं थी।”क्या थी याचिका की मांग?

सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हैं, जो निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक गारंटी को प्रभावित करती हैं।याचिका में दावा किया गया कि बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में हजारों की संख्या में डुप्लिकेट, अवैध और फर्जी वोटर एंट्री पाई गईं।

PIL में कहा गया कि —एक ही EPIC नंबर (मतदाता पहचान पत्र नंबर) के तहत कई निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति दर्ज पाया गया।कुछ लोग एक ही क्षेत्र में अलग-अलग पहचान नंबरों के साथ बार-बार दर्ज थे।हजारों मतदाता एक ही मकान नंबर या पिता के नाम जैसे समान विवरणों के तहत सूचीबद्ध थे।

40 हजार से अधिक फर्जी वोटरों का दावा याचिकाकर्ता के अनुसार, महादेवपुरा में 40,000 से अधिक अवैध मतदाता,10,000 से ज्यादा डुप्लिकेट एंट्री,और हजारों संदिग्ध मतदाता पते पाए गए।

महाराष्ट्र के चंद्रपुर और कलबुर्गी जैसे इलाकों में भी इसी तरह की गड़बड़ियों का हवाला दिया गया।चंद्रपुर में लगभग 80 मतदाता एक ही खाली पते पर पंजीकृत थे, जबकि कलबुर्गी में संदिग्ध मतदाता सूची में बढ़ोतरी के मामले में FIR दर्ज होने का जिक्र भी याचिका में किया गया।चुनाव आयोग पर कार्रवाई न करने का आरोप याचिकाकर्ता का कहना था कि इन सभी तथ्यों के साथ चुनाव आयोग को औपचारिक प्रतिनिधित्व दिया गया, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।इसलिए न्यायालय से अनुरोध किया गया कि वह स्वतंत्र SIT बनाकर जांच का आदेश दे।

हालांकि अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा —यह मामला प्रशासनिक स्तर पर सुलझाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट हर शिकायत की जांच के लिए नहीं बैठ सकता।”

संविधान के अनुच्छेदों का हवाला

याचिका में यह भी कहा गया कि मतदाता सूची में इस तरह की हेराफेरी संविधान के अनुच्छेद 324, 325 और 326 का उल्लंघन है —

अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को निष्पक्ष चुनाव की जिम्मेदारी देता है,अनुच्छेद 325 किसी नागरिक को जाति, धर्म या मत के आधार पर सूची से बाहर करने पर रोक लगाता है,और अनुच्छेद 326 हर वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार सुनिश्चित करता है।राहुल गांधी के आरोपों की पृष्ठभूमि गौरतलब है कि कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने चुनावी सभाओं और सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया था कि मतदाता सूची में फर्जी वोटरों की एंट्री कराई जा रही है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।उन्होंने कहा था कि यह “लोकतंत्र की आत्मा के साथ खिलवाड़” है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह मामला न्यायिक रूप से बंद माना जा रहा है, और शिकायतकर्ता को चुनाव आयोग के समक्ष पुनः अपील करने की छूट दी गई है।न्यायिक संकेत साफ: ‘राजनीतिक मुद्दे अदालत में नहीं, संस्थागत मंचों पर सुलझाएं’कानूनी जानकारों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह संदेश देता है कि राजनीतिक प्रकृति के विवादों को न्यायिक मंच पर लाने के बजाय संस्थागत माध्यमों — जैसे चुनाव आयोग या विधिक शिकायत प्राधिकरण — के जरिए सुलझाना चाहिए।

निचोड़:

राहुल गांधी के आरोपों से उपजे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है —लोकतंत्र की पवित्रता चुनाव आयोग से शुरू होती है, अदालत से नहीं।”अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है कि वह इन आरोपों पर आगे क्या कदम उठाता है।

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