“राहुल गांधी का एक फोन… और टल गया सियासी ब्रेकअप!” तेजस्वी-मुकेश सहनी के बीच बढ़ी दूरियां, आख़िरी वक्त पर राहुल ने बचाया महागठबंधन

बी के झा

NSK

पटना / नई दिल्ली, 17 अक्टूबर

बिहार चुनाव 2025 के रण में महागठबंधन एक और बड़े सियासी संकट से बाल-बाल बच गया। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के बीच सीट बंटवारे को लेकर इतना जबरदस्त टकराव हुआ कि मामला लगभग “सियासी ब्रेकअप” तक पहुंच गया था।लेकिन आख़िरी समय में राहुल गांधी के एक फोन कॉल ने वह काम कर दिया, जो दर्जनों बैठकें नहीं कर पाईं — महागठबंधन टूटने से बच गया।

ब्रेकअप की कगार पर पहुंचा गठबंधन लोकसभा चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव के साथ हेलिकॉप्टर राइड करते नज़र आने वाले मुकेश सहनी अब वही शख्स हैं जो आरजेडी के रुख से इतने नाराज़ थे कि उन्होंने गठबंधन से बाहर निकलने का मन बना लिया था।

सूत्रों के मुताबिक, तेजस्वी के साथ लगातार कई मैराथन बैठकों में बात नहीं बनी। आरजेडी 12 सीटों से आगे बढ़ने को तैयार नहीं थी, जबकि सहनी 15 सीटें और डिप्टी सीएम पद की मांग पर अड़े थे।गुरुवार को सहनी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर गठबंधन से बाहर होने का ऐलान करने का पूरा मन बना लिया था — लेकिन तभी दिल्ली से एक फोन आया जिसने पूरी सियासत की दिशा बदल दी।

दीपांकर भट्टाचार्य बने कड़ी, राहुल बने निर्णायक

नाराज़ सहनी ने आरजेडी से बातचीत टूटने के बाद CPI (ML) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से मुलाकात की। उन्होंने मांग रखी कि महागठबंधन में वीआईपी को “सम्मानजनक स्थान” दिया जाए।दीपांकर ने कहा कि वे राहुल गांधी से बात करेंगे, लेकिन पहले सहनी को खुद पत्र लिखना होगा।सहनी ने उसी रात राहुल गांधी को एक भावनात्मक पत्र लिखा —जिसमें लिखा था,हमारी प्राथमिकता सीटें नहीं, गठबंधन की एकता है। हमने अपनी मांग 35 से घटाकर 18+2 कर दी है। बस, हमें वह जगह चाहिए जो हमारे जनाधार के अनुरूप हो।”इसके बाद दीपांकर ने राहुल गांधी को फोन लगाया, और वहीं से कहानी पलट गई।

राहुल गांधी की ‘डायरेक्ट कॉल डिप्लोमेसी’दीपांकर भट्टाचार्य के कॉल के बाद राहुल गांधी ने खुद पहल की।उन्होंने तेजस्वी यादव, लालू यादव, और मुकेश सहनी — तीनों से बात की। राहुल ने साफ संदेश दिया किबिहार में महागठबंधन किसी भी कीमत पर एकजुट रहना चाहिए। मतभेद बातचीत से सुलझाएं, ब्रेकअप से नहीं।”इसी बातचीत के बाद मुकेश सहनी ने दो बार प्रेस कॉन्फ्रेंस का समय बदला — और अंततः पीसी रद्द कर दी।राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि “अगर राहुल गांधी का फोन 2 घंटे देर से आता, तो महागठबंधन टूट चुका होता।”

तेजस्वी-सहनी रिश्तों में दरार क्यों आई?तेजस्वी और सहनी के बीच तनाव की असली वजह “सम्मान बनाम नियंत्रण” की राजनीति बताई जा रही है।सहनी चाहते थे कि उन्हें गठबंधन में एक “समान साझेदार” की तरह ट्रीट किया जाए, जबकि आरजेडी उन्हें छोटे सहयोगी के रूप में देख रही थी।डिप्टी सीएम पद की मांग और सीट चयन में वीआईपी के दखल ने स्थिति और पेचीदा कर दी।कांग्रेस ने शुरुआत में सहनी मामले को “तेजस्वी पर छोड़ दिया” था, लेकिन जब मामला ब्रेकअप की तरफ गया, तब राहुल गांधी को “फायर फाइटर” की भूमिका निभानी पड़ी।

दिल्ली दरबार से पटना तक चला ड्रामादिल्ली में राहुल गांधी और खड़गे से मिलने की सहनी की कोशिशें पहले नाकाम रहीं थीं। वे मुलाकात किए बिना पटना लौट आए थे।कांग्रेस आलाकमान ने तेजस्वी पर भरोसा जताते हुए कहा था कि “जो फैसला तेजस्वी लेंगे, वही पार्टी का फैसला होगा।”लेकिन तेजस्वी-सहनी की तनातनी ने कांग्रेस को एहसास दिलाया कि अगर अभी हस्तक्षेप नहीं किया गया तो बिहार में विपक्षी गठबंधन की एकता ध्वस्त हो सकती है।

राजनीतिक विश्लेषण:

राहुल बने ‘क्राइसिस मैनेजर’राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राहुल गांधी का यह दखल केवल बिहार की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के लिए भी अहम संकेत है।राहुल ने दिखाया कि वे अब बैकफुट नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में हैं। तेजस्वी को भी यह संदेश मिला कि गठबंधन में ‘अहं’ नहीं, तालमेल ज़रूरी है।”

निष्कर्ष:

तूफान थमा, लेकिन लहरें अब भी हैंफिलहाल महागठबंधन टूटने से बच गया है, लेकिन भीतर की सियासी खटास अभी बाकी है।तेजस्वी और सहनी के बीच भरोसे की डोर दोबारा जुड़ गई है, पर कितनी मज़बूत है — यह सीट बंटवारे के ऐलान के बाद ही साफ होगा।

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