बी के झा
पटना/ न ई दिल्ली, 19 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) भीतर से उबल रहा है। भाजपा-जेडीयू गठबंधन की ऐतिहासिक जीत जितनी चर्चा में नहीं है, उससे कहीं अधिक चर्चा तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर उठ रहे सवालों और उनके दो प्रमुख सलाहकारों—
संजय यादव और रमीज नेमत खान—को लेकर बनी हुई है।तेजस्वी के घर 1, पोलो रोड पर सोमवार को बुलाई गई समीक्षा बैठक इस उथल-पुथल की सबसे जीवंत मिसाल बन गई।
समीक्षा बैठक से पहले ही फूट पड़ा असंतोष:
“संजय यादव हरियाणा जाओ!”मीटिंग शुरू होने से पहले ही RJD कार्यकर्ताओं का गुस्सा फट पड़ा।
राज्यसभा सांसद संजय यादव के खिलाफ जोरदार नारे लगे—“संजय यादव हरियाणा जाओ!”
कारण वही पुराना आरोप—तेजस्वी के राजनीतिक फैसलों पर संजय यादव की अत्यधिक पकड़।काडर का कहना है कि “पार्टी के पुराने साथी और ज़मीनी नेता किनारे कर दिए गए, और टिकट बंटवारे में सलाहकारों की पसंद को तरजीह मिली।”मीटिंग शुरू हुई तो तेजस्वी खुद खड़े हो गए अपने करीबी के बचाव में तनावपूर्ण माहौल में जैसे ही बैठक शुरू हुई, तेजस्वी यादव ने खुद पहल करते हुए संजय यादव का बचाव किया।
उन्होंने कहा—संजय ने जितनी मेहनत की है, वह मैं जानता हूँ। बाहर वाले नहीं जानते। मेरी हर लड़ाई में वह साथ रहा है।तेजस्वी की इस टिप्पणी पर बैठक कक्ष में मौजूद नेता चुप रहे, पर चेहरे कई बातें कह रहे थे।
भावुक हुए तेजस्वी: “जरूरत हो तो मैं नेता पद छोड़ने को तैयार हूं”मीटिंग के दौरान तेजस्वी इतने भावुक हो गए कि उन्होंने विधायक दल के नेता के पद से हटने तक की पेशकश कर दी।यह बयान अचानक आया और माहौल भारी हो गया।
उन्होंने कहा—अगर आपको लगता है कि कोई और व्यक्ति पार्टी के हित में बेहतर है, तो उसे चुन लीजिए।इस पर लालू प्रसाद यादव को हस्तक्षेप करना पड़ा।लालू यादव ने विधायकों से कहा—आप लोग तेजस्वी को ही नेता चुनें। परिवार के जो भी विवाद हैं,
वह अंदरुनी हैं—हम सुलझा लेंगे।
सलाहकारों की भूमिका पर क्यों उठे सवाल?
संजय यादव हरियाणा के रहने वाले हैं और रमीज नेमत खान यूपी के बलरामपुर के।RJD के कई नेता (और तेजस्वी की बहन रोहिणी आचार्य) आरोप लगाते रहे हैं कि:तेजस्वी अपनी राजनीतिक रणनीति में इन्हीं दो व्यक्तियों को तरजीह देते हैं पुराने नेताओं, जिलाध्यक्षों, ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं की सलाह को अनसुना किया गयाटिकट बंटवारे में “धरातल की रिपोर्ट नहीं, सलाहकारों की सूची चली”संगठन पर पकड़ कमजोर हुई और हार की नींव वहीं रखी गई
अब जब नतीजे खराब आए हैं, दोनों सलाहकार पार्टी के गुस्से का केंद्र बन गए हैं।
स्थानीय बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेषक क्या कह रहे हैं?
1. डॉ. अरुणेश चौधरी (राजनीति विज्ञान विभाग, पटना विश्वविद्यालय)
2. RJD की हार सिर्फ चुनावी रणनीति की विफलता नहीं है, यह संगठन और नेतृत्व के बीच बढ़ती दूरियों का परिणाम है।सलाहकारों पर निर्भरता हर नेता को महंगी पड़ती है—तेजस्वी कोई अपवाद नहीं।”
3. वरिष्ठ पत्रकार सविता झासंजय यादव पर जो गुस्सा दिखा, वह असल में वर्षों से जमा असंतोष का विस्फोट है।RJD की राजनीति हमेशा जनाधार आधारित रही है, लेकिन इस बार नेतृत्व ‘इन-हाउस सर्कल’ में कैद दिखा।”
4. सामाजिक चिंतक प्रो. रमेश प्रसाद कार्यकर्ता असंतोष सिर्फ सलाहकारों को लेकर नहीं है।लोगों में यह भी धारणा बनी कि तेजस्वी कुछ लोगों की घेरेबंदी में फँसकर जनता के मुद्दों से दूरी बना बैठे।
”5. चुनाव विश्लेषक अनिरुद्ध तिवारी हाई कमांड बनाम जमीनी कैडर की लड़ाई कांग्रेस में देखी थी, अब RJD में नजर आ रही है।अगर तेजस्वी ने संवाद बढ़ाया और संगठन को प्राथमिकता दी, तो RJD खुद को पुनर्गठित कर सकती है।”आगे क्या? RJD चिंतन-मनन के मोड़ परगुस्सा, अविश्वास, सलाहकार बनाम संगठन की खाई—
RJD फिलहाल इन्हीं पर खड़ी है।लालू प्रसाद यादव ने अंदरूनी विवाद सुलझाने का आश्वासन दिया है, लेकिन चुनौती बड़ी है:तेजस्वी को संगठन के भीतर भरोसा बहाल करना होगा सलाहकारों की भूमिका पर स्पष्ट नीति बनानी होगी टिकट
बंटवारे और रणनीति में काडर की भागीदारी बढ़ानी होगी चुनावी हार ने RJD को एक कठोर दर्पण दिखाया है—
अब देखना होगा कि पार्टी अपनी छवि देख कर चुप रहती है या खुद को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश करती है।
NSK

