बी के झा
NSK

बेंगलुरु (कर्नाटक), 9 नवंबर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100वें स्थापना वर्ष के अवसर पर आयोजित भव्य समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत का संबोधन दो मुख्य संदेशों के कारण चर्चा में रहा—पहला, संगठन में सदस्यता और पहचान का प्रश्न; दूसरा, पाकिस्तान के प्रति भारत की सुरक्षा-संबंधी नीति पर उनका कड़ा रुख।“
धार्मिक पहचान बाहर छोड़नी होगी”
भागवत ने स्पष्ट कहा कि संघ में किसी व्यक्ति को उसकी अलग धार्मिक, जातिगत या पंथ-आधारित पहचान के साथ स्वीकार नहीं किया जाता।
उन्होंने कहा—“कोई ब्राह्मण अलग से नहीं है, न कोई मुसलमान अनुमति से है, न कोई ईसाई अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आता है। आपकी विशेषता स्वागत योग्य है, पर शाखा में आने पर वह बाहर रहती है। शाखा में आप सिर्फ ‘हिंदू समाज के सदस्य’ और ‘भारत माता के पुत्र’ होते हैं।”उनके इस बयान पर हॉल तालियों से गूंज उठा।भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि शाखाओं में आने वालों की संख्या या व्यक्तिगत पहचान कहीं दर्ज नहीं होती
“हम सब भारत माता के पुत्र हैं — यही हमारी पहचान है।पाकिस्तान पर सख्त संदेश
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भागवत ने पाकिस्तान को लेकर दो-टूक बात कही।उन्होंने कहा कि भारत शांति चाहता है, पर पाकिस्तान बार-बार घुसपैठ, आतंक और अस्थिरता फैलाने की कोशिश करता है।“
1971 में जो हुआ, वह इसलिए हुआ क्योंकि पाकिस्तान ने गलत राह पकड़ी थी। आज भी यदि वह दुष्कृत्य करता रहेगा, तो उसे उसी भाषा में जवाब मिलेगा जिसे वह समझ सके,” उन्होंने कहा।
विश्लेषण: ‘
पहचान बाहर रखो’ — समावेशिता या पहचान की निकासी?भागवत का संदेश कई स्तरों पर बहस पैदा करता है।RSS, जिसकी स्थापना 1925 में हुई, हमेशा से सामूहिक राष्ट्रीय पहचान की बात करता रहा है। शताब्दी समारोह में भागवत का यह स्पष्टिकरण कि किसी भी धर्म के लोग संघ में आ सकते हैं, पर अपनी धार्मिक पहचान शाखा में नहीं ला सकते — यह ‘एकरूपता आधारित समावेशन’ का मॉडल प्रतीत होता है।यह संदेश दो तरह से पढ़ा जा सकता है:
समावेशिता का दावा हर धर्म, जाति और पंथ का व्यक्ति संघ में आ सकता है —
बशर्ते वह ‘हिंदू समाज’ की व्यापक सांस्कृतिक पहचान स्वीकार करे।
परंतु प्रश्न भी उठते हैं क्या निजी धार्मिक पहचान को शाखा से बाहर रखने का आग्रह विविधता को सीमित करता है?क्या यह प्रक्रिया वास्तविक समावेशन है या पहचान का निष्कर्षण’?
यह बहस आगे भी भारतीय सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में गूंजेगी—कौन संगठन में आ सकता है, और किस रूप में ?
निष्कर्ष
मोहन भागवत के बयान में संगठनात्मक अनुशासन, राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रीय सुरक्षा—तीनों का स्पष्ट संदेश था। हॉल की तालियों ने उनके वक्तव्य को समर्थन दिया, लेकिन समाज में यह चर्चा भी जारी रहेगी कि आधुनिक भारत में व्यक्तिगत पहचान, सामूहिक पहचान और राष्ट्रीय समावेशन—इन तीनों का संतुलन कैसे स्थापित होता है।
