बी.के. झा
NSK


नई दिल्ली, 28 दिसंबर
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा आरएसएस–भाजपा की संगठनात्मक शक्ति की सराहना ने न केवल सियासी हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी गहरे वैचारिक मतभेद को उजागर कर दिया है। मामला अब एक ट्वीट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह कांग्रेस की विचारधारा, रणनीति और विरोध की भाषा पर राष्ट्रीय बहस में बदल चुका है।इस बहस को और धार दी कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के क्लासिक संवादों का सहारा लेते हुए कहा—“
मजबूत तो डाकू भी होता है। तो क्या आप अपने बच्चों से कहेंगे कि डाकू बनो?
”यह टिप्पणी कांग्रेस के भीतर चल रहे उस द्वंद्व को सामने लाती है, जिसमें एक धड़ा भाजपा से लड़ने के लिए उसकी संगठनात्मक क्षमता से सीखने की बात कर रहा है, जबकि दूसरा धड़ा इसे वैचारिक विचलन मान रहा है।विवाद की शुरुआत: एक तस्वीर और एक वाक्य
दिग्विजय सिंह ने शनिवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पुरानी तस्वीर साझा की। तस्वीर में मोदी फर्श पर बैठे दिखाई देते हैं और उनके पीछे लालकृष्ण आडवाणी कुर्सी पर।
दिग्विजय सिंह ने लिखा—“किस प्रकार RSS का जमीनी स्वयंसेवक… नेताओं के चरणों में बैठकर प्रदेश का मुख्यमंत्री और फिर देश का प्रधानमंत्री बना। यह संगठन की शक्ति है।”यही पंक्ति विवाद की जड़ बन गई।हालांकि बाद में सिंह ने स्पष्ट किया कि वे आज भी RSS और मोदी के घोर विरोधी हैं, और उनकी टिप्पणी केवल संगठनात्मक अनुशासन तक सीमित थी।
सलमान खुर्शीद का तीखा प्रतिवाद: डर बनाम लोकतंत्र
सलमान खुर्शीद ने ANI से बातचीत में RSS की ताकत की तुलना शोले के गब्बर सिंह से करते हुए कहा—“क्या आप ऐसा समाज बनाना चाहते हैं कि बच्चा रोए तो मां कहे—चुप हो जा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा?”
खुर्शीद ने आरोप लगाया कि आज देश की संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश हो रही है और कांग्रेस का संघर्ष डर के खिलाफ है।उन्होंने यह भी जोड़ा कि दिग्विजय सिंह की शब्दावली और संदर्भ को समझना जरूरी है और उनके इरादों पर सवाल उठाना अनुचित है।कांग्रेस के भीतर दो धाराएं
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,
यह विवाद कांग्रेस के भीतर दो वैचारिक धाराओं को उजागर करता है—
व्यावहारिक धाराजो मानती है कि भाजपा–RSS का संगठन मजबूत हैऔर उससे तकनीकी सीख लेने में हर्ज नहीं वैचारिक शुद्धतावादी धाराजो RSS को मूलतः विभाजनकारी मानती हैऔर किसी भी तरह की सराहना को खतरनाक मानती है एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“कांग्रेस असमंजस में है—क्या वह भाजपा से वैचारिक युद्ध लड़े या संगठनात्मक दक्षता की प्रतिस्पर्धा?
”शिक्षाविदों की राय: ताकत और नैतिकता अलग चीजें
राजनीति शास्त्र के शिक्षाविद मानते हैं कि“संगठन की मजबूती नैतिक श्रेष्ठता की गारंटी नहीं होती।”उनके अनुसार, इतिहास में कई संगठन बेहद मजबूत रहे हैं, लेकिन समाज के लिए घातक साबित हुए।यही वजह है कि संगठनात्मक शक्ति की चर्चा करते समय मूल्य–आधार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। RSS और भाजपा की प्रतिक्रिया
भाजपा नेताओं ने इस पूरे विवाद को कांग्रेस की आंतरिक उलझन बताया।एक भाजपा प्रवक्ता ने कहा—“अब कांग्रेस के नेता खुद मान रहे हैं कि RSS–BJP का संगठन मजबूत है। यह हमारी कार्यसंस्कृति की स्वीकृति है।”RSS से जुड़े विचारकों का कहना है कि“अनुशासन और समर्पण को डर से जोड़ना गलत है। RSS समाज निर्माण की विचारधारा है।
”हिन्दू संगठनों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
कुछ हिन्दू संगठनों ने कहा कि“RSS की ताकत उसके स्वयंसेवक आधारित मॉडल में है, न कि भय में।”वहीं कुछ हिन्दू धर्मगुरुओं ने संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा—“किसी भी संगठन की ताकत का मूल्यांकन उसके समाज के प्रति योगदान से होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक सफलता से।”
मणिकम टैगोर का तीखा बयान:
अल-कायदा से तुलना कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने विवाद को और तीखा करते हुए RSS की तुलना अल-कायदा से कर दी।
उन्होंने कहा—“दोनों नफरत फैलाते हैं। नफरत से क्या सीखा जा सकता है?”
उनके इस बयान ने कांग्रेस के भीतर भी असहजता पैदा कर दी, क्योंकि इससे बहस संगठनात्मक सीख से हटकर चरम वैचारिक टकराव में बदल गई।
मुस्लिम मौलानाओं की प्रतिक्रिया
कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कहा कि“RSS की राजनीति ने देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ाई है। ऐसे संगठन से सीखने की बात डर पैदा करती है।”हालांकि कुछ मौलानाओं ने यह भी कहा कि“राजनीतिक बहस को धार्मिक ध्रुवीकरण में नहीं बदलना चाहिए।
”कानूनविदों का नजरिया
संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि“किसी संगठन की ताकत का आकलन लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुपालन से होना चाहिए—संविधान, संस्थाएं और अल्पसंख्यक अधिकार।
”वरिष्ठ पत्रकारों की टिप्पणी: कांग्रेस का ‘आत्मसंघर्ष’
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार,यह विवाद भाजपा से ज्यादा कांग्रेस की पहचान पर है।एक वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं—“कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही कि वह किस भाषा में लड़े—गांधी की या गब्बर के डर से।”
निष्कर्ष:
सवाल सिर्फ RSS का नहीं, कांग्रेस का हैदिग्विजय सिंह की एक पोस्ट ने कांग्रेस को आईना दिखा दिया है।सवाल यह नहीं कि RSS कितना मजबूत है,सवाल यह है कि—कांग्रेस खुद को कैसे मजबूत करेगी?संगठन से, आंदोलन से या केवल विरोध की भाषा से?आज कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर है जहां सीख और समझ, सराहना और समर्पण,रणनीति और विचारधारा—
सबके बीच संतुलन उसके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा।और शायद यही इस पूरे विवाद का असली सार है।
