SIR के तहत वोटर लिस्ट में बड़ी सर्जरी: लोकतंत्र की सफ़ाई या सियासी शोर?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 25 जनवरी

देशभर में Special Intensive Revision (SIR) के तहत जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। निर्वाचन आयोग के अनुसार यह प्रक्रिया मतदाता सूची को मृतकों, फर्जी, डुप्लीकेट और स्थानांतरित (शिफ्टेड) मतदाताओं से मुक्त करने के उद्देश्य से की गई है, लेकिन इसके आंकड़े सामने आते ही सियासी तापमान तेज़ हो गया है।उत्तर प्रदेश सबसे आगे, हर पाँचवां नाम बाहरSIR के तहत सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है।

यहां 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं। पहले जहां यूपी में 15.44 करोड़ वोटर दर्ज थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 12.55 करोड़ रह गई है।आंकड़ों के मुताबिक—46.23 लाख मतदाता मृत पाए गए 25.47 लाख फर्जी या डुप्लीकेट2.17 करोड़ शिफ्टेड या लापताअर्थात यूपी में हर 100 में से लगभग 19 मतदाता सूची से बाहर हो गए।दक्षिण और पश्चिम भारत में भी बड़ा असर यूपी के बाद तमिलनाडु दूसरे नंबर पर है, जहां 97 लाख वोटर्स हटाए गए। यहां 15.13% मतदाताओं के नाम कटे।तीसरे स्थान पर गुजरात है, जहां 73.73 लाख नाम हटे, जो कुल वोटर्स का 14.52% है।पश्चिम बंगाल (58.20 लाख) और राजस्थान (41.85 लाख) में औसतन हर 100 में से 8 वोटर्स ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए।छोटे राज्यों में प्रतिशत ज्यादा, संख्या कम छत्तीसगढ़ में 27.34 लाख (12.9%),केरल में 24.08 लाख,गोवा में 11.85 लाख,पुडुचेरी में 1.03 लाख औरअंडमान-निकोबार में 64 हजार वोटर्स के नाम हटाए गए।सबसे कम असर लक्षद्वीप में रहा, जहां 58 हजार में से केवल 1600 नाम (करीब 2.79%) हटे।

चुनाव आयोग का पक्ष: “यह लोकतंत्र की शुद्धिकरण प्रक्रिया है”

निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR कोई नई प्रक्रिया नहीं है, बल्कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग का संवैधानिक दायित्व है।आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार—“मृत, फर्जी और स्थानांतरित मतदाताओं का नाम बने रहना चुनावी पारदर्शिता के लिए खतरा है। ड्राफ्ट सूची अंतिम नहीं है, आपत्ति और दावे दर्ज कराने का पूरा अवसर दिया गया है।”आयोग यह भी स्पष्ट करता है कि एक भी जीवित और पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य होगा, इसलिए पुनरीक्षण की कई परतें रखी गई हैं।सरकार का रुख: ‘फर्जी वोट लोकतंत्र पर हमला’केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दलों का कहना है कि—“जो लोग फर्जी वोट के सहारे चुनावी समीकरण साधते थे, वही आज सबसे ज्यादा शोर मचा रहे हैं।”सरकार के अनुसार, एक स्वच्छ मतदाता सूची से—फर्जी मतदान रुकेगा

चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ेगीऔर लोकतंत्र मजबूत होगा

विपक्ष का आरोप: ‘चुनावी इंजीनियरिंग

’वहीं विपक्षी दलों ने SIR पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।उनका आरोप है कि—गरीब प्रवासी मजदूर अल्पसंख्यक शहरी झुग्गी बस्तियों के निवासीइन वर्गों के नाम disproportionately हटाए गए हैं।एक प्रमुख विपक्षी नेता का कहना है—“यह आंकड़ों की सफाई नहीं, बल्कि मतदाता आधार को प्रभावित करने की कोशिश है। अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ तो लाखों नागरिक वोट के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।”

कानूनविदों और शिक्षाविदों की राय: संतुलन ज़रूरी

संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि—मतदाता सूची की शुद्धता अनिवार्य हैलेकिन मताधिकार संविधान का मूल अधिकार (Basic Structure) से जुड़ा विषय हैवरिष्ठ कानूनविदों के अनुसार—“SIR संवैधानिक है, लेकिन इसकी प्रक्रिया पारदर्शी, सहभागी और शिकायत-निवारण से भरपूर होनी चाहिए। एक भी योग्य मतदाता का नाम कटना राज्य की विफलता मानी जाएगी।

”राजनीतिक शिक्षाविद इसे “डेटा बनाम डेमोक्रेसी” की बहस करार दे रहे हैं।

निष्कर्ष:

असर चुनावों तक जाएगा ड्राफ्ट वोटर लिस्ट फिलहाल अंतिम नहीं है, लेकिन इसके संकेत स्पष्ट हैं—भारत के लोकतंत्र में अब आंकड़ों की राजनीति और अधिकारों की राजनीति आमने-सामने है।आने वाले चुनावों में यह साफ होगा कि—

क्या यह प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत करेगीया फिर सियासी अविश्वास को और गहरा देगीएक बात तय है:SIR सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि इसके सियासी मायने दूरगामी हैं।

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