बी के झा
NSK

नई दिल्ली / पटना, 27 अक्टूबर
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का दूसरा चरण शुरू होते ही सियासी तूफ़ान खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने सोमवार को चुनाव आयोग की नीयत और विश्वसनीयता पर तीखा हमला बोला। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने कहा कि बिहार में हुए SIR के अनुभव ने पूरे देश में आयोग की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका आरोप है कि “वोट चोरी” के मामलों पर कोई ठोस जवाब नहीं मिला, जिससे जनता और विपक्ष दोनों असंतुष्ट हैं।
बिहार से शुरू हुआ विवाद, अब 12 राज्यों तक पहुंचामुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सोमवार को घोषणा की कि देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों—छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप—में SIR का दूसरा चरण शुरू किया जाएगा।लेकिन इस ऐलान के तुरंत बाद कांग्रेस ने सवाल उठा दिया कि जब बिहार में SIR पर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो अब वही प्रक्रिया बाकी राज्यों में क्यों दोहराई जा रही है?
“बिहार लोकतंत्र की हत्या की प्रयोगशाला बन गया”पवन खेड़ा ने एक्स (X) पर अपने बयान में लिखा—क्या बिहार को लोकतंत्र की हत्या की प्रयोगशाला बना दिया गया है? क्या नए SIR के दिशा-निर्देश 2003 के नियमों से अलग होंगे? क्या यह दौर भी सिर्फ वोट काटने के लिए है?”
खेड़ा ने आरोप लगाया कि बिहार में 65 लाख वोट काटे गए, लेकिन नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए कोई घर-घर अभियान नहीं चला। उन्होंने कहा कि आलंद (कर्नाटक) में राहुल गांधी द्वारा ‘वोट चोरी’ का खुलासा किए जाने के बाद SIT ने यह माना कि एक केंद्रीकृत तंत्र के जरिए मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया चल रही थी।
आयोग की नीयत पर “विश्वसनीयता संकट”कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि जब चुनाव आयोग पर ही जनता का भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो लोकतंत्र की रीढ़ कैसे मजबूत रह सकती है? खेड़ा ने कहा—ऐसे आयोग द्वारा SIR कराना संदेह के घेरे में है, जिसकी नीयत, मंशा और विश्वसनीयता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान है।”
विपक्ष में मचा हड़कंप, गठबंधन में बेचैनीपवन खेड़ा के बयान के बाद न सिर्फ कांग्रेस बल्कि इंडी गठबंधन की कई पार्टियों में हलचल मच गई है। शिवसेना (उद्धव गुट) के संजय राउत ने भी SIR को लेकर चिंता जताई।
विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR की आड़ में “मतदाता पुनर्गठन” के नाम पर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।हालांकि सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। भाजपा के नेताओं का कहना है कि SIR की प्रक्रिया पारदर्शी है और इसका उद्देश्य सिर्फ मतदाता सूची को अद्यतन रखना है।
सवाल यह भी—
SIR से डर क्यों रहा विपक्ष?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष के इस विरोध के पीछे गहरी सियासी आशंका है। दरअसल, SIR का सबसे बड़ा असर उन क्षेत्रों में पड़ सकता है जहां मतदाताओं की संरचना जातीय या धार्मिक रूप से संवेदनशील है। भाजपा समर्थक वर्ग इसे “घुसपैठियों की पहचान” से जोड़कर देख रहा है। वहीं, विपक्षी दल इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला” बता रहे हैं।
निष्कर्ष:
सियासत में फिर एक नया मोर्चाSIR को लेकर मची यह बहस चुनावी साल में लोकतंत्र की बुनियाद — यानी “मतदाता सूची” — को ही राजनीतिक युद्ध का नया मैदान बना रही है।एक ओर निर्वाचन आयोग अपनी पारदर्शिता और प्रक्रिया की पवित्रता पर जोर दे रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे “वोट बैंक हेरफेर” का औजार बता रहा है।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में SIR — Special Intensive Revision — मतदाता सूची को कितना “सुधारता” है और सियासत को कितना “भड़काता” है।
