SIR पर ममता बनर्जी का सियासी आक्रोश “फॉर्म मैंने भी नहीं भरा… क्या दंगाइयों की पार्टी को नागरिकता साबित करनी है?” मतदाता सूची पर बड़ा राजनीतिक तूफ़ान | विशेष रिपोर्ट

बी के झा

नई दिल्ली/कोलकाता , 11 दिसंबर

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि एक भी योग्य मतदाता का नाम सूची से हटाया गया तो वे धरना देंगी। ममता ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने स्वयं अभी तक SIR फॉर्म नहीं भरा है और सवाल उठाया—“क्या मुझे दंगाइयों की पार्टी को अपनी नागरिकता साबित करनी है?”उनके इस बयान के बाद बंगाल और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है।

ममता का आरोप — “SIR राजनीतिक हथियार है, लक्ष्य—2026 चुनाव”ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि SIR का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से किया जा रहा है ताकि 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले चुनावी संतुलन बदला जा सके।उन्होंने कहा—“यदि एक भी योग्य मतदाता का नाम हटाया गया, मैं धरना दूंगी।यह चुनाव से दो महीने पहले वोटों का गणित बदलने की कोशिश है।”**मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल में किसी भी तरह के डिटेंशन सेंटर नहीं बनने देंगे।उन्होंने गृह मंत्रालय पर आरोप लगाते हुए कहा—“कुछ लोग बंगालियों को बांग्लादेशी बताने पर तुले हुए हैं।हम किसी को बंगाल से बाहर नहीं जाने देंगे।”

भाजपा पर सीधा हमलाममता ने भाजपा को “दंगाइयों की पार्टी” कहा और चुटकी लेते हुए कहा—“क्या उनकी नागरिकता पर कभी सवाल उठता है? या बस बंगालियों की ही जांच होती है?”उनका आरोप था कि चुनाव आयोग में भाजपा समर्थकों की नियुक्ति कर SIR प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है।उन्होंने दावा किया कि दिल्ली से अधिकारियों को भेजकर जिलाधिकारियों की SIR प्रक्रिया की “निगरानी” कराई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रियाएँ

1. “राजनीतिक ध्रुवीकरण का नया दौर”—राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अनिरुद्ध भट्टाचार्य“यह बयान बंगाल की राजनीतिक ध्रुवीकरण को नई ऊँचाई देता है।SIR तकनीकी प्रक्रिया है, लेकिन बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में इसे आसानी से राजनीतिक नैरेटिव में बदला जा सकता है।ममता इसे अपने कोर वोटबेस—बंगाली, मुस्लिम और गरीब वर्ग—को संदेश देने के लिए मुद्दा बना रही हैं।”

2. “वोटर लिस्ट पर विवाद 2026 की लड़ाई का प्रिव्यू”—वरिष्ठ चुनाव विश्लेषक सोनिया कौर“ममता का यह बयान 2026 की जंग की शुरुआत का संकेत है।अगर SIR के जरिए मतदाता सूची में बड़े बदलाव होते हैं तो यह चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है—इसीलिए राजनीतिक तनाव इतना अधिक है।

हिंदू संगठनों का दृष्टिकोण

विश्व हिंदू परिषद के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का बयान:“मतदाता सूची का सत्यापन लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।यदि कोई अवैध मतदाता हटाया जा रहा है, तो इसमें क्या आपत्ति?

ममता बनर्जी अपने वोट बैंक की राजनीति के लिए अनावश्यक भय फैलाने की कोशिश कर रही हैं।

”हिंदू जागरण मंच के प्रदेश संयोजक का तर्क:“बंगाल में अवैध घुसपैठ वास्तविक समस्या है।SIR को रोकने का विरोध यह दर्शाता है कि TMC अपनी राजनीति अवैध मतदाताओं पर निर्भर मानती है।”

शिक्षाविदों का दृष्टिकोण

जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. रमाला घोष:“मतदाता सूची एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन उसके राजनीतिकरण से लोकतंत्र कमजोर होता है।ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर नेताओं को संयमपूर्ण भाषा का उपयोग करना चाहिए।”कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रो. आमिर अली:“यदि वास्तव में योग्य मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, तो ममता का विरोध जायज़ है।लेकिन बयानबाज़ी से संस्थाओं पर अविश्वास पैदा होता है—जो राष्ट्रहित में नहीं।

वरिष्ठ पत्रकारों के विचार

1. “बंगाल की राजनीति भावनाओं से संचालित”—वरिष्ठ पत्रकार उर्मिला चक्रवर्ती“ममता बनर्जी का हर बयान जनता के गहरे भावनात्मक तंतुओं को छूता है।नागरिकता का मुद्दा बंगाल में संवेदनशील है, इसलिए SIR को लेकर उनकी प्रतिक्रिया जनता में बड़ा राजनीतिक असर उत्पन्न कर सकती है।

2. “EC को पारदर्शिता बढ़ानी होगी”—वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता“जब मतदाता सूची की प्रक्रिया विवादों में घिर जाए तो चुनाव आयोग को अधिक खुलापन दिखाना चाहिए।अन्यथा यह राजनीतिक अविश्वास और बढ़ेगा।”

निष्कर्ष

SIR के मसले पर ममता बनर्जी के तीखे बयान ने बंगाल की राजनीति में नई उथल-पुथल ला दी है।यह विवाद केवल मतदाता सूची का नहीं, बल्कि—नागरिकता,चुनावी पारदर्शिता,और 2026 के राजनीतिक समीकरण का संकेत बन चुका है।

आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या TMC इसे राजनीतिक प्रतिरोध का प्रमुख मुद्दा बनाती है या यह सिर्फ एक आरंभिक चेतावनी भर है।

NSK

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