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पटना / नई दिल्ली, 15 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नामांकन प्रक्रिया के बीच राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।बुधवार को राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने राघोपुर विधानसभा सीट से नामांकन दाखिल कर सियासी हलचल तेज कर दी।
नामांकन के दौरान उन्होंने जेडीयू और उसके शीर्ष नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए कहा —जेडीयू अब नीतीश कुमार के हाथों में नहीं रही।
पार्टी को ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी चला रहे हैं — और ये तीनों बीजेपी के हाथों बिक चुके हैं।”तेजस्वी ने यह भी कहा कि इन नेताओं ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य अमित शाह के हाथों गिरवी रख दिया है, जिससे राज्य की राजनीति में नया भूचाल आ गया है।
तीसरी बार राघोपुर से मैदान में तेजस्यावी यादव ने बुधवार को राघोपुर विधानसभा सीट से अपना नामांकन दाखिल किया।यह तीसरी बार है जब उन्होंने इसी सीट से चुनाव लड़ा है।
नामांकन के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा —राघोपुर की जनता ने हम पर लगातार दो बार भरोसा किया है। हमें विश्वास है कि इस बार भी जनता हमें सेवा का अवसर देगी।
जनता मालिक है — वही तय करेगी कि बिहार किस दिशा में जाएगा।”तेजस्वी ने कहा कि वे केवल सरकार नहीं, बल्कि एक नया बिहार बनाना चाहते हैं।हमारा लक्ष्य सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि बिहार को भ्रष्टाचार और अपराधमुक्त राज्य बनाना है,”उन्होंने कहा।‘अफवाहों का जवाब जनता देगी’
तेजस्वी यादव ने दो टूक कहा कि वे केवल राघोपुर सीट से ही चुनाव लड़ेंगे।कई लोग अफवाह फैला रहे थे कि मैं दो सीटों से चुनाव लड़ूंगा। मैं 243 सीटों से लड़ रहा हूँ, क्योंकि पूरा बिहार मेरा परिवार है — लेकिन जब चुनाव की बात आती है, तो मैं सिर्फ राघोपुर से लड़ता हूँ और हमेशा वहीं से लड़ूंगा,”
उन्होंने मुस्कराते हुए कहा।उनके इस बयान से समर्थकों में जोश तो बढ़ा ही, साथ ही विपक्षी खेमे में हलचल भी मच गई।जेडीयू के भीतर उठी हलचल तेजस्वी के तीखे बयान ने जेडीयू के अंदर भी सरगर्मी बढ़ा दी है।
उन्होंने जिस तरह से ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी के नाम लेकर सीधे आरोप लगाए कि ये “BJP के हाथों बिके हुए नेता हैं”, उससे राजनीतिक माहौल गरमा गया है
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, तेजस्वी का यह बयान न सिर्फ नीतीश कुमार की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि जेडीयू के भीतर भारी असंतोष और टूट का डर है।कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी के इस बयान से यह संकेत भी मिलता है कि बिहार में चुनाव से पहले एक बड़ा राजनीतिक फेरबदल संभव है।
राजनीतिक पंडितों की राय: “
क्या नीतीश का अगला कदम महागठबंधन की ओर?”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेजस्वी यादव का यह हमला सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है।
एक वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार के अनुसार —तेजस्वी यह दिखाना चाहते हैं कि नीतीश कुमार अब खुद अपनी पार्टी पर नियंत्रण नहीं रखते। उनके करीबी नेता बीजेपी के प्रभाव में हैं। यह स्थिति आने वाले दिनों में महागठबंधन की पुनर्संरचना का संकेत हो सकती है।”कुछ पंडितों ने यह भी कहा है कि चुनाव से पहले नीतीश कुमार किसी नए राजनीतिक समीकरण की ओर कदम बढ़ा सकते हैं, जिसकी झलक तेजस्वी के बयान से झलकती है।
तेजस्वी का आत्मविश्वास और जनता से अपील नामांकन के बाद तेजस्वी यादव ने जनता से अपील करते हुए कहा —बिहार की जनता बदलाव चाहती है। लोग महंगाई, बेरोज़गारी, अपराध और भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं।
अब बिहार नया सोच रहा है — और जनादेश भी इस सोच के साथ होगा।”उन्होंने यह भी कहा कि “अब वक्त है बिहार को नीतीश कुमार के भ्रम से मुक्त कराने का।
”विपक्ष की प्रतिक्रिया
तेजस्वी के बयानों पर NDA खेमे से तीखी प्रतिक्रिया आई है।जेडीयू प्रवक्ता ने पलटवार करते हुए कहा —तेजस्वी यादव को पहले यह बताना चाहिए कि उनके परिवार के शासनकाल में भ्रष्टाचार और जंगलराज क्यों था। जनता सब जानती है।”
वहीं भाजपा के एक नेता ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा —तेजस्वी हर बार राघोपुर से नामांकन करते हैं, लेकिन बिहार बदलने का वादा अब पुराना हो गया है। उन्हें पहले अपने घर की सियासत ठीक करनी चाहिए।
”विश्लेषण:
राघोपुर से उठे सियासी तूफान का असर पूरे बिहार में तेजस्वी यादव का यह बयान केवल एक विधानसभा क्षेत्र का मसला नहीं, बल्कि राज्यव्यापी राजनीतिक संकेत है।
राघोपुर से उनका नामांकन और जेडीयू नेताओं पर हमला बिहार में गठबंधन राजनीति की नई दिशा तय कर सकता है।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तेजस्वी अब “युवा नेता” के दायरे से निकलकर मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पूरी मजबूती से खुद को स्थापित कर रहे हैं।
निष्कर्ष
तेजस्वी यादव के इस बयान से यह साफ है कि बिहार का चुनावी रण अब पूरी तरह गरमाने लगा है।
जेडीयू, भाजपा और राजद — तीनों दलों में अंदरूनी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नीतीश कुमार अगला कदम क्या उठाते हैं —क्या वे फिर किसी नए गठबंधन की ओर मुड़ेंगे या अपने मौजूदा साथियों के साथ मैदान में डटे रहेंगे?
