ट्रेन नहीं, चलता-फिरता ‘लंगर’! 33 घंटे के सफर में मुफ्त में मिलता है खाना

बी के झा

NSK

नादेर ( महाराष्ट्र ) /अमृतसर/नई दिल्ली , 13 अक्टूबर

लंबी ट्रेन यात्राओं में खाने-पीने का बढ़ता खर्च हर यात्री की जेब पर भारी पड़ता है। लेकिन भारतीय रेलवे की एक ट्रेन ऐसी भी है, जहां 33 घंटे और लगभग 2000 किलोमीटर के सफर में यात्रियों को एक भी पैसा खर्च किए बिना भोजन मिलता है।जी हां, हम बात कर रहे हैं ‘सचखंड एक्सप्रेस’ (12715/12716) की — जो केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि सेवा, श्रद्धा और ‘लंगर’ की चलती-फिरती परंपरा है।

नांदेड़ से अमृतसर तक – दो पवित्र स्थलों को जोड़ती सेवा यात्रायह ट्रेन महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा से चलकर पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर तक जाती है।करीब 33 घंटे के सफर में यह ट्रेन सात राज्यों — महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब — से होकर गुजरती है, और लगभग 37 से 39 स्टेशनों पर रुकती है।यात्रियों के लिए यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानवीय अनुभव बन जाती है।जैसे ही ट्रेन में ‘लंगर सेवा’ शुरू होती है, माहौल एक गुरुद्वारे जैसा शांत, श्रद्धामय और प्रेमपूर्ण हो जाता है।

कहां और कैसे बनता है यह लंगर का खाना?इस ट्रेन में मिलने वाला खाना रेलवे की पेंट्री में नहीं, बल्कि रास्ते में पड़ने वाले स्थानीय गुरुद्वारों में तैयार किया जाता है।सिख परंपरा के अनुसार, यह भोजन सेवा भाव और दान से संचालित होता है — बिना किसी सरकारी सहायता के।जहां-जहां ट्रेन रुकती है, वहां सेवक (वालंटियर्स) पहले से तैयार होते हैं। वे यात्रियों तक कढ़ी-चावल, दाल, रोटी, सब्ज़ी, खिचड़ी जैसे सादे लेकिन स्वादिष्ट भोजन पहुंचाते हैं।सिर्फ़ एक अनुरोध किया जाता है — यात्री अपना टिफिन या थाली साथ रखें ताकि सफाई और व्यवस्था बनी रहे।यह परंपरा करीब 29 वर्षों से लगातार जारी है।न कोई टिकट पर अतिरिक्त शुल्क, न कोई विज्ञापन — बस ‘सेवा में समर्पित हाथ’ और ‘श्रद्धा से भरे दिल’।

सेवा की मिसाल — धर्म से बढ़कर मानवता‘सचखंड एक्सप्रेस’ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं।जो भी यात्री इसमें सफर करता है, चाहे वह किसी भी धर्म या राज्य से हो — सभी को समान रूप से खाना परोसा जाता है।यह भारतीय संस्कृति की उस महान भावना को दर्शाता है, जहां भोजन सेवा और मानवता एक-दूसरे के पर्याय हैं।कई यात्री इसे ‘रेल पर चलता गुरुद्वारा’ कहते हैं। ट्रेन के डिब्बों में जब थालियां सजती हैं, तो लोग ‘वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतेह’ का नारा लगाते हुए भोजन ग्रहण करते हैं।

सफर का बजट आधा नहीं, शून्य हो जाता है!आज जब रेल यात्राओं में पानी की बोतल से लेकर भोजन तक के दाम बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में यह ट्रेन यात्रियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं।2000 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में भोजन का पूरा खर्च सेवाभाव से जुड़े संगठनों और श्रद्धालुओं के दान से उठाया जाता है।इससे यात्रियों का हज़ारों रुपये का खर्च बचता है और उन्हें यात्रा के साथ आध्यात्मिक तृप्ति भी मिलती है।

‘सचखंड’ — नाम ही संदेश है‘सचखंड’ का अर्थ है सत्य का धाम — यानी वह स्थान जहां आत्मा परमात्मा से मिलती है।यह ट्रेन उसी विचार की प्रतीक है — जहां सेवा ही साधना है और भोजन ही भक्ति।यह भारत की उस संस्कृति का जीता-जागता उदाहरण है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” — “सारा संसार एक परिवार है” — के सिद्धांत पर टिकी है।

रेल यात्रा से आगे, मानवीयता का संदेश‘सचखंड एक्सप्रेस’ आज केवल यात्रियों को नहीं जोड़ती, बल्कि राज्यों, भाषाओं और दिलों को भी जोड़ती है।यह ट्रेन बताती है कि सेवा, दया और समानता के सूत्र में ही भारत की सच्ची आत्मा बसती है।रेल की पटरियों पर दौड़ती यह ट्रेन, सचमुच भारत की आत्मा – सेवा, श्रद्धा और समर्पण — को अपने हर स्टेशन तक पहुंचाती है।

अंतिम पंक्ति

यह ट्रेन नहीं, चलती-फिरती श्रद्धा हैजब दुनिया सुविधा के नाम पर प्रतिस्पर्धा कर रही है, तब ‘सचखंड एक्सप्रेस’ निःस्वार्थ सेवा का चलता उदाहरण बनी हुई है।यह हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी यात्रा सिर्फ मंज़िल तक नहीं, मन तक पहुंचने के लिए भी होती है।

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