बी के झा
मणिपुर, ( इंफाल ) / न ई दिल्ली, 20 नवंबर
मणिपुर के इंफाल में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू धर्म और भारतीय सभ्यता पर एक ऐसा बयान दिया जिसने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि “अगर हिंदू नहीं रहेगा तो दुनिया नहीं रहेगी। भारत एक अमर सभ्यता है, बाकी सबका उदय और पतन हमने देखा है। धर्म का सही मार्गदर्शन दुनिया को हिंदू समाज ही देता है।”भागवत के मुताबिक, हिंदू समाज का “बेसिक नेटवर्क” ही भारत को अमर बनाता है।
उन्होंने दावा किया कि इतिहास में यूनान, मिस्र और रोम जैसी सभ्यताएँ मिट गईं, लेकिन भारत आज भी मजबूती से खड़ा है।यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में सामाजिक तनाव, धार्मिक ध्रुवीकरण और मणिपुर संकट जैसे मुद्दों पर गर्मागर्मी जारी है। इसलिए उनके संदेश और उसके राजनीतिक मायनों पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।भागवत का संदेश: “हिंदू सभ्यता अमर है, दुनिया को मार्गदर्शन देती रही है”
भागवत ने कहा—“भारत एक अमर सभ्यता है।”“हिंदू समाज रहेगा तो ही दुनिया रहेगी।”“धर्म का सही अर्थ और मार्गदर्शन दुनिया को हिंदू समाज ही देता है।”“हमने समाज का मजबूत नेटवर्क तैयार किया है, इसी से भारत टिक पाया है।”उन्होंने ब्रिटिश शासन का उदाहरण देते हुए कहा—“
ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, लेकिन भारत में उनके सूर्यास्त की शुरुआत हुई। 1857 से 1947 तक हमने संघर्ष की आवाज कभी दबने नहीं दी।”भागवत ने मणिपुर में शांति और सामाजिक एकता की भी अपील की और कहा कि “RSS किसी के खिलाफ नहीं है”, न ही वह “किसी संगठन को रिमोट से कंट्रोल करता है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन:
“बयान में संदेश भी है, राजनीति भी”
1. चुनावी माहौल का संकेत?कई विश्लेषक मानते हैं कि यह बयान हिंदू पहचान और सभ्यता के मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरविंद मिश्रा कहते हैं—“RSS हमेशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करता है। लेकिन ‘दुनिया हिंदू के बिना नहीं रहेगी’ जैसे बयान आमतौर पर बड़े राजनीतिक संकेत देते हैं और चुनावी माहौल में भावनात्मक असर पैदा करते हैं।”
2. मणिपुर के संदर्भ में ‘एकता का संदेश’पूर्व नौकरशाह और राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ सिंह का मत है—“मणिपुर में एक साल से अधिक समय से तनाव है। भागवत का ‘सामाजिक एकता’ पर जोर वहीं की परिस्थितियों को देखते हुए है, लेकिन हिंदू सभ्यता के वैश्विक संदर्भ ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया।”
3. सभ्यता बनाम धर्म का विमर्शकुछ विद्वान कहते हैं कि बयान अधिक दार्शनिक है, लेकिन शब्दों की तीक्ष्णता ने इसे विवादित बना दिया।
इतिहासकार राजीव ठाकुर कहते हैं—“भारतीय सभ्यता बहुलतावादी है। इसे सिर्फ हिंदू शब्द तक सीमित करने से बहस गहरी तो होगी, पर जरूरी नहीं कि सबके लिए स्वीकार्य हो।”
विपक्ष के कड़े सवाल: “क्या देश सिर्फ हिंदुओं का है?
”कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा,“आरएसएस प्रमुख बार-बार हिंदू खतरे में होने की बात करते हैं। यह डर का माहौल बनाने की रणनीति है। भारत सभी धर्मों का देश है, न कि किसी एक की जागीर।”
RJD व SP का आरोप
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता ने कहा—“अगर दुनिया हिंदू के बिना नहीं रहेगी—यह दावा वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और सामाजिक तीनों स्तर पर गलत है।”
आरजेडी ने कहा—“देश को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बचाने की जरूरत है, न कि ऐसे बयान देने की।”
टीएमसी और DMK की तीखी आलोचनाएं
टीएमसी ने कहा—“RSS भारत को एक धर्म में रंगना चाहता है।”DMK ने कहा कि यह “संविधान की मूल भावना” के खिलाफ है।
मुस्लिम उलेमा और मौलानाओं की प्रतिक्रिया: “दुनिया विविधता से चलती है, किसी एक धर्म से नहीं”
जमीयत उलेमा-ए-हिंदएक वरिष्ठ उलेमा के बयान में कहा गया—“भारत सभी धर्मों की भूमि है। दुनिया किसी एक समाज से नहीं चलती। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई… सब मिलकर दुनिया को सुंदर बनाते हैं। किसी भी धर्म को सर्वोच्च या अनिवार्य बताना सही नहीं।”ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड“RSS प्रमुख को समझना चाहिए कि भारत की ताकत उसकी विविधता है। हिंदू समाज का सम्मान हम करते हैं, लेकिन ऐसी टिप्पणी से सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है।
”मणिपुर के मुस्लिम समुदाय का बयान“
जब राज्य संकट में है, हमें एकता की जरूरत है। यह वक्त बयानबाजी का नहीं, सामंजस्य का है।”क्या यह बयान सामाजिक एकता बढ़ाएगा या विवाद गहराएगा?
विश्लेषकों के अनुसार—दोनों संभावनाएं बाकी**भागवत ने साफ कहा कि RSS “किसी का विरोधी नहीं,” और “समाज को मजबूत करने के लिए काम करता है।”लेकिन राजनीतिक परिदृश्य में संदेश अलग तरह से पढ़ा जा रहा है।सकारात्मक पक्ष सभ्यता और संस्कृति को लेकर गौरवबोध बढ़ता है मणिपुर में शांति का संदेश दिया राष्ट्रीय एकता की बात की विवादित पक्ष हिंदू समाज को दुनिया के अस्तित्व से जोड़ना अन्य धर्मों को अप्रत्यक्ष रूप से गौण बताने की आशंका
राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने का खतरा
अंत में—यह बयान एक विचार भी है, चुनौती भी मोहन भागवत का यह वक्तव्य दार्शनिक है या राजनीतिक—इस पर मतभेद हैं, लेकिन इतना तय है कि इसने राष्ट्रव्यापी चर्चा को जन्म दे दिया है।भारत जिस विविधता, बहुलता और सहिष्णुता की नींव पर खड़ा है, वहां ऐसी टिप्पणियाँ हमेशा समर्थकों को उत्साहित विरोधियों को आक्रामक और विश्लेषकों को सतर्क कर देती हैं।
अब देश में बहस सिर्फ यह नहीं कि भागवत क्या कहना चाहते थे,बल्कि यह भी कि भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है—सभ्यतागत चेतना या राजनीतिक ध्रुवीकरण?
NSK

