अल-फलाह यूनिवर्सिटी: कैसे बना ‘व्हाइट कॉलर’ आतंक का सबसे ख़तरनाक अड्डा?_

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ फ़रीदाबाद, 15 नवंबर

जांच में खुलासा—डॉक्टर्स की साज़िश, चार कारें, 360 किलो विस्फोटक और 6 दिसंबर-26 जनवरी के लिए ‘डेथ प्लान’हरियाणा की अल-फलाह यूनिवर्सिटी… नाम ऐसा, जो शिक्षा, चिकित्सा और मानव सेवा की पहचान होना चाहिए था। लेकिन NIA, स्पेशल सेल और ATS की संयुक्त जांच ने इस कैंपस से जो राज खोले—

उन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया।एक मेडिकल यूनिवर्सिटी धीरे-धीरे व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल में बदल गई, जहां डॉक्टर्स ही आतंकी गिरोह के दिमाग, चेहरा और हाथ बन चुके थे।कमरा नंबर 17-13: जहां डॉक्टर नहीं, ‘दहशत की फैक्ट्री’ चल रही थीजब पुलिस की टीमें अल-फलाह की बिल्डिंग नंबर 17 के रूम नंबर 13 तक पहुँचीं, कमरे की चौखट पार करते ही मानो आतंक का नक़्शा सामने रख दिया गया।यही कमरा था जहांब्लास्ट की तारीखें तय हुईंविस्फोटक तैयार करने की प्रक्रिया लिखी गई हैं

डलर्स से कॉन्टैक्ट का सिस्टम बनाया गयाऔर मेडिकल कॉलेज की लैब से चोरी हुए केमिकल्स की लिस्ट तैयार की गई कमरे से मिली डिजिटल डिवाइसपेन ड्राइव कैमिकल नोट्सटेरर चैट्सऔर मुज़म्मिल की डायरी सब इस बात के सबूत थे कि यह कमरा ‘मेडिकल स्टडी रूम’ नहीं, बल्कि जिहादी कमांड सेंटर था।

डॉक्टर्स का नेटवर्क: मुज़म्मिल, शाहीन, उमर और टीम Dजांच में खुलासा हुआ—

इस मॉड्यूल को चलाने वाले डॉक्टरों की टीम चार स्तरों में बंटी थी।डॉ. मुज़म्मिल – मास्टरमाइंड डॉ. शाहीन – महिलाओं को रैडिकलाइज़ करने वाली ‘मैडम सर्जन’डॉ. उमर – विस्फोटक विशेषज्ञडॉ. मुज़फ्फर – अब अफगानिस्तान में छिपा, RCN जारीटीम D – डॉक्टरों का टेरर ग्रुप, कोडवर्ड में निर्देश प्राप्त करने वालाडॉ. शाहीन की डायरी से ‘ऑपरेशन हमदर्द’ का खुलासा हुआ। उसका मिशन था—मुस्लिम लड़कियों को रिक्रूट करनाजैश-ए-मोहम्मद के कमांडर्स से संपर्क बनाए रखना कोडवर्ड में निर्देश लेना और देना कोडवर्ड्स स्थापित थे

:Heart Specialist – किसी टास्क के लिए नियुक्त डॉक्टरMedicine Stock – हथियारOperation Theatre – रेकी वाली जगहOperation Preparation – फंडिंग व्यवस्थायही नहीं—जांच ने साबित किया कि पाकिस्तान के जैश हैंडलर्स सादिया अज़हर और आफिरा बीबी से शाहीन को सीधे आदेश मिलते थे।चार कारें, चार शहर, चार ब्लास्टडॉक्टर्स ने चार शहरों में एक साथ ब्लास्ट के लिए चार कारें खरीदी थीं—

1. शाहीन की कार – AK-47 और विस्फोटक सहित पकड़ी गई2. उमर की i20 – लाल किले के पास ब्लास्ट के लिए इस्तेमाल3. इको स्पोर्ट्स – फरीदाबाद के गांव से बरामद4. ब्रेज़ा – शाहीन के नाम पर, सितंबर में खरीदी गई, अब कब्जे मेंइन कारों कोअयोध्या वाराणसी लखनऊ दिल्ली में अलग-अलग तारीखों पर उड़ाने की प्लानिंग थी।

साजिश के ‘डेथ डेट्स’: 6 दिसंबर और 26 जनवरीमुज़म्मिल की डायरी में लिखे कोड में ये दो तारीखें मिलीं—6 दिसंबर – अयोध्या, वाराणसी, लखनऊ में सीरियल ब्लास्ट26 जनवरी – लाल किले पर बड़ा धमाका26 किलो नहीं, पूरी 26 क्विंटल NKP फर्टिलाइज़र खरीदा गया था, ताकि बड़े पैमाने पर विस्फोटक तैयार किए जा सकें।अल-फलाह की लैब से विस्फोटक केमिकल कैसे बाहर निकले?

सबसे बड़ा सवाल यही है।

क्या प्रशासन को पता नहीं था किलैब से संवेदनशील केमिकल गायब हो रहे हैं?कुछ डॉक्टर लगातार बाहर रात में आते-जाते रहते थे?कमरा नंबर 13 में एक छिपी हुई ‘प्राइवेट लैब’ चलाई जा रही थी?यदि यह सब बिना सहयोग के हो रहा होगा, यह मानना कठिन है।

इसीलिए जांच एजेंसियां अबयूनिवर्सिटी के ट्रस्टस्टाफएचआर सेलऔर फंडिंग सोर्सकी एक-एक कड़ी खंगाल रही हैं।ED की एंट्री: फंडिंग चैनल और कश्मीर कनेक्शन

ED अबअल फलाह यूनिवर्सिटी का पूरा लेन-देनडॉक्टर्स के बैंक खातोंटेलीग्राम चैनलों के पैसेऔर तुर्किए-अफगानिस्तान से आने वाली रकमट्रेस कर रही है।जांच में सबसे हैरान करने वाला तथ्य यही है—अल फलाह में सबसे ज्यादा नियुक्तियाँ जम्मू-कश्मीर से ही क्यों होती थीं?क्या यह संयोग था? या एक योजनाबद्ध व्यवस्था?

NAAC और AIU को भी धोखा दिया गयायूनिवर्सिटी ने झूठा दावा किया कि उसे NAAC ने A-ग्रेड दिया

NAAC ने स्पष्ट किया—न तो आवेदन मिला, न रेटिंग दीAIU ने अल फलाह की सदस्यता तत्काल रद्द कर दीनोटिस मिलते ही यूनिवर्सिटी की वेबसाइट अचानक डाउन हो गईयह साफ संकेत है कि यूनिवर्सिटी के अंदर किसी बड़े स्तर का मैनेजमेंट डिसेप्शन चल रहा था।

तुर्किए-अफगानिस्तान-पाकिस्तान—तीनों का नेटवर्क सक्रियइंडिया टीवी के राजनीतिक संपादक देवेंद्र पाराशर ने खुलासा किया—पकड़े गए डॉक्टर फैसल अशफ़ाक़ बट नामक हैंडलर से संपर्क में थेफैसल की लोकेशन—अफगानिस्तान दो और हैंडलर्स—हाशिम और उक़ासा—विदेश में बैठे थेटेलीग्राम चैनलों के ज़रिए लगातार रैडिकलाइज़ेशन चल रहा था

यह पूरा नेटवर्क एक बात साफ करता है—अल फलाह यूनिवर्सिटी में आतंकी मॉड्यूल स्थापित करने की प्लानिंग पाकिस्तान की थी, लेकिन उसकी फील्ड ऑपरेटिंग तुर्किए से हो रही थी।

कैंपस में बारूद… कारों में विस्फोटक… और किसी को खबर नहीं?जांच एजेंसियों का यही सबसे बड़ा सवाल है।क्या प्रबंधन को नहीं दिखा कि—कारें लगातार कैंपस में खड़ी हो रही हैं?डॉक्टर रात-रात गायब रहते थे?लैब का स्टॉक कम हो रहा था?बाहर से रोज़ आने वाला मौलाना ‘जिहाद’ की क्लास लेता था?इतने बड़े मॉड्यूल का बिना किसी अंदरूनी मदद के खड़ा हो जाना असंभव है।निष्कर्ष: यह संयोग नहीं—‘प्रयोग’ थाअल-फलाह यूनिवर्सिटी सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं रही…यह धीरे-धीरे जिहादी भर्ती का केन्द्र,फंडिंग का हब,और विस्फोटक तैयार करने की फैक्ट्री बन चुकी थी।

अब इस मॉड्यूल का सफाया शुरू हो चुका है।पकड़े गए आतंकियों के हैंडलर्स, फंडिंग नेटवर्क और पाक-तुर्किए कनेक्शन तक पहुंचना अब समय की बात है।हमें भरोसा रखना चाहिए—भारतीय सुरक्षा एजेंसियां हर उस हाथ को काटेंगी, जो इस देश के खिलाफ उठेगा।

(बी.के. झा)

एडिटर-इन-चीफ, NSK

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