बी के झा
NSK


पटना/पूर्णिया, 7 फरवरी
बिहार की राजनीति शुक्रवार देर रात उस वक्त उफान पर आ गई, जब पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को पटना पुलिस ने 31 साल पुराने एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर लिया। मामला किराए के मकान पर कथित कब्जे और धोखाधड़ी से जुड़ा है, लेकिन इसकी टाइमिंग और अंदाज़ ने इसे कानून से ज्यादा राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया है।पटना के गर्दनीबाग थाना कांड संख्या 552/1995 में दर्ज इस मामले में आरोप है कि वर्ष 1995 में पप्पू यादव ने एक मकान किराए पर लिया, उसे कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया और बाद में उस पर कब्जा कर लिया।
शिकायतकर्ता विनोद बिहारी लाल की ओर से दर्ज एफआईआर में धोखाधड़ी, धमकी और साजिश के आरोप लगाए गए थे।
अदालत की सख्ती: समन से कुर्की तक
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, इस मामले में पप्पू यादव को कई बार समन जारी किए गए, लेकिन लगातार पेशी न होने पर अदालत ने पहले गिरफ्तारी वारंट, फिर इश्तेहार, और अंततः संपत्ति कुर्की का आदेश दिया। दो दिन पहले अदालत के इसी आदेश के बाद पुलिस ने शुक्रवार रात कार्रवाई की।करीब साढ़े नौ बजे पटना के उत्तरी मंदिरी स्थित सांसद के आवास पर पुलिस पहुंची। इसके बाद लगभग ढाई से तीन घंटे तक हाई-वोल्टेज ड्रामा चलता रहा। समर्थक जुटते गए, पुलिस और कार्यकर्ताओं में तीखी बहस हुई और हालात तनावपूर्ण हो गए। अंततः आधी रात के बाद पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया गया।
उन्हें रात पुलिस सेल में रखा गया है और शनिवार को कोर्ट में पेशी होनी है।
पप्पू यादव का पलटवार: “मुझे मारने की साजिश”
गिरफ्तारी के बाद पप्पू यादव ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। उन्होंने कहा,“मेरे साथ क्या होगा, मुझे नहीं पता। मैं फांसी पर चढ़ने को तैयार हूं, लेकिन झुकने वाला नहीं हूं।”एक टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने आरोप लगाया कि नीट छात्रा के मामले में आवाज उठाने के कारण बिहार सरकार और गृह मंत्री सम्राट चौधरी उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें आशंका है कि उनकी हत्या कराई जा सकती है।
पप्पू यादव का दावा है कि पुलिस सिविल ड्रेस में उनके घर पहुंची, जिससे उन्हें लगा कि कोई हमला होने वाला है।“हम मरना पसंद करेंगे, लेकिन सच के रास्ते से नहीं हटेंगे,” उन्होंने कहा।
पुलिस का पक्ष: “कोर्ट के आदेश का पालन”
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह अदालती आदेश के तहत की गई है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार,“यह कोई नया मामला नहीं है। 1995 से मामला लंबित है। लगातार गैर-हाजिरी के कारण कोर्ट ने सख्त आदेश दिया था, जिसे लागू करना पुलिस की जिम्मेदारी थी।”
कानूनविदों की राय: कार्रवाई वैध, लेकिन देर से क्यों?
कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि गिरफ्तारी प्रक्रियात्मक रूप से वैध है, लेकिन 31 साल पुराने मामले में अचानक तेज़ी सवाल खड़े करती है।पटना हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार,“यदि कोर्ट के आदेश की अवहेलना हुई है, तो गिरफ्तारी जायज़ है। लेकिन यह भी सवाल है कि तीन दशक तक मामला क्यों लटका रहा और अब अचानक इतनी सख्ती क्यों दिखी?”
राजनीतिक विश्लेषक: कानून से ज्यादा संदेश की राजनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब कानूनी से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव में बदल चुका है।एक विश्लेषक कहते हैं,“पप्पू यादव एक आक्रामक और सड़क की राजनीति करने वाले नेता हैं। उनकी गिरफ्तारी सत्ता और असहमति के टकराव के रूप में देखी जा रही है।
”विपक्ष का हमला: “डराने की राजनीति”
विपक्षी दलों ने इस गिरफ्तारी को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं।राजद और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि“पुराने मामलों को अचानक सक्रिय कर विपक्षी आवाज़ों को दबाने की कोशिश की जा रही है।”हालांकि, कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
शिक्षाविदों की टिप्पणी: लोकतंत्र में असहमति की जगह
वरिष्ठ शिक्षाविदों का मानना है कि यह मामला लोकतंत्र में असहमति और सत्ता के व्यवहार पर बहस छेड़ता है।एक शिक्षाविद के अनुसार,“अगर कोई जनप्रतिनिधि कानून से ऊपर नहीं हो सकता, तो सत्ता भी कानून से ऊपर नहीं होनी चाहिए। संतुलन ही लोकतंत्र की आत्मा है।
निष्कर्ष:
अदालत तय करेगी, राजनीति तय करेगी
माहौल 31 साल पुराने मकान विवाद में पप्पू यादव की गिरफ्तारी अब सिर्फ एक अदालती प्रक्रिया नहीं रही। यह बिहार की राजनीति में सत्ता, विरोध और कानून के रिश्ते पर बड़ा सवाल बन चुकी है।अब निगाहें अदालत पर हैं, जहां यह तय होगा कि यह मामला कानून के पन्नों में किस मोड़ पर जाता है—
और बिहार की राजनीति में इसका असर कितना गहरा होगा।फिलहाल, एक रात जेल में और बिहार की राजनीति में एक और उबाल।
