बी के झा
नई दिल्ली , 18 नवंबर
सेना के आवासीय परिसर में स्थित ‘मस्जिद-ए-आलीशान’ में नागरिकों को नमाज़ पढ़ने की अनुमति देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ कहा—
यह मसला केवल धार्मिक नहीं, सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। सेना के क्षेत्र में बाहरी लोगों का प्रवेश प्रशासनिक विवेक का विषय है— और हम इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन तमाम बहसों पर विराम लगा देता है, जिनमें तर्क दिया जा रहा था कि मस्जिद 1877 से खुली थी और कोविड-19 से पहले कभी कोई सुरक्षा समस्या नहीं उठी।
शीर्ष अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि सेना को मिली सुरक्षा-संबंधी विशेष शक्तियाँ सर्वोच्च हैं और नागरिकों की धार्मिक गतिविधियाँ उन्हें प्रभावित नहीं कर सकतीं।
पूरा मामला: कोविड के दौरान लगा प्रतिबंध, फिर विवाद शुरू तमिलनाडु के चेन्नई स्थित आर्मी क्वॉर्टर परिसर में एक ऐतिहासिक मस्जिद है, जिसे ‘मस्जिद-ए-आलीशान’ कहा जाता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान सेना ने सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के तहत नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी।याचिकाकर्ता का तर्क यह था कि—
1877 से 2022 तक मस्जिद में आम नागरिक नमाज पढ़ते रहे कभी सुरक्षा समस्या नहीं हुई इसलिए कोविड का कारण समाप्त होने के बाद प्रवेश बहाल होना चाहिए लेकिन अदालत ने माना कि महामारी के बाद सुरक्षा मानकों में देशभर में बदलाव आए हैं, और सेना को सुरक्षा आकलन के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार है।
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला भी बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट की अप्रैल 2024 की उस व्यवस्था में दखल देने से भी इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था—
आर्मी क्वॉर्टर में स्थित मस्जिद मुख्यतः यूनिट से जुड़े सैन्यकर्मियों के उपयोग के लिए हैबाहरी नागरिकों को प्रवेश देना या न देना पूरी तरह प्रशासन का विशेषाधिकार हैछावनी भूमि प्रशासन नियम, 1937 के अनुसार, सैन्य क्षेत्र में धार्मिक स्थल भी सुरक्षा नियमों के अधीन होते हैंहाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि मस्जिद धार्मिक स्थल जरूर है, परंतु उसकी स्थिति सैन्य क्षेत्र के भीतर है, इस कारण सुरक्षा नियम सर्वोपरि होंगे।सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश: सेना के क्षेत्र में ‘ओपन एक्सेस’ संभव नहीं
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता से पूछा—
यह सेना का उच्च-सुरक्षा क्षेत्र है। आप कैसे उम्मीद करते हैं कि हम नागरिकों को खुले प्रवेश की अनुमति देने का आदेश दें? सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती।”यानी अदालत ने यह साफ कर दिया कि सेना की सुरक्षा नीतियों के सामने धार्मिक अधिकार सीमित हो जाते हैं।यह फैसला महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि यह “धार्मिक गतिविधियों बनाम सुरक्षा” के सवाल पर स्पष्ट और व्यावहारिक संतुलन स्थापित करता है।सेना के लिए क्यों है यह मसला महत्वपूर्ण?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की सेना के कैंटोनमेंट और आवासीय क्षेत्रों में—
संवेदनशील हथियार भंडार संचार उपकरण रणनीतिक दस्तावेज ट्रेनिंग और मूवमेंट की गोपनीय जानकारी मौजूद रहती है।ऐसे में “ओपन एक्सेस” किसी भी रूप में सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।सेना का रुख हमेशा से रहा है कि धार्मिक स्थल चाहे कोई भी हो—
“सुरक्षा पहले, बाकी बाद में।”
फैसले का व्यापक असर यह
फैसला आने वाले समय में उन सभी सैन्य क्षेत्रों पर लागू मिसाल बनेगा जहाँ—
मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारा चर्च जैसे धार्मिक स्थल सीमाओं के भीतर मौजूद हैं।सभी पर सुरक्षा नियम धार्मिक पहुंच से प्राथमिक माने जाएंगे।एक तरह का ‘सुरक्षा सिद्धांत’: भावनाएँ महत्वपूर्ण, पर सुरक्षा सर्वोपरि सुप्रीम
कोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर यह स्थापित करता है कि—राज्य की सुरक्षा संरचना सेना की ज़िम्मेदारीऔर राष्ट्रीय हित किसी भी धार्मिक अधिकार से ऊपर हैं, जब मामला सैन्य सीमाओं का हो।
इसमें अदालत ने एक बहुत स्पष्ट रास्ता दिखाया—
संवेदना हो सकती है, पर सुरक्षा में ढील नहीं हो सकती।
NSK

