आव्रजन बना भारत–न्यूज़ीलैंड FTA का सबसे बड़ा रोड़ा, व्यापार समझौते पर भीतर ही भीतर सुलग रही वेलिंगटन की सियासत

बी के झा

वेलिंगटन / नई दिल्ली, 23 दिसंबर

भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) जहां आर्थिक साझेदारी की नई इबारत लिखने की ओर बढ़ता दिख रहा है, वहीं वेलिंगटन की घरेलू राजनीति में यह समझौता अब आव्रजन और श्रम बाजार के मुद्दे पर तीखे टकराव का कारण बन गया है। न्यूज़ीलैंड की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार में शामिल न्यूज़ीलैंड फर्स्ट पार्टी और उसके नेता व विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने समझौते के कुछ प्रावधानों पर खुलकर आपत्ति जताई है।

पीटर्स का कहना है कि FTA के तहत भारत को दी जा रही आव्रजन संबंधी रियायतें केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे न्यूज़ीलैंड के श्रम बाजार और सामाजिक संरचना को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित कर सकती हैं।

आव्रजन प्रावधानों पर तीखा सवाल

विंस्टन पीटर्स ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि“FTA के नाम पर जिन आव्रजन रियायतों को मंजूरी दी जा रही है, वे दोतरफा व्यापार से सीधे तौर पर जुड़ी नहीं हैं, बल्कि भारत से न्यूज़ीलैंड में लोगों के आगमन को बढ़ावा देती हैं।”उन्होंने दावा किया कि प्रति व्यक्ति आधार पर न्यूज़ीलैंड ने भारत को अपने श्रम बाजार तक जितनी पहुंच दी है, वहऑस्ट्रेलियाऔर ब्रिटेन द्वारा अपने-अपने भारत FTA में दी गई पहुंच से कहीं अधिक है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल तकनीकी असहमति नहीं, बल्कि घरेलू मतदाताओं को संदेश देने की कोशिश भी है—खासतौर पर तब, जब न्यूज़ीलैंड पहले से बढ़ती बेरोज़गारी महंगाई और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है।

बेरोजगारी के दौर में ‘अविवेकपूर्ण फैसला’?

पीटर्स ने इस फैसले को ऐसे समय में “बेहद अविवेकपूर्ण” करार दिया है, जब न्यूज़ीलैंड की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है।उनकी पार्टी ने विशेष रूप से आपत्ति जताई—

भारतीय नागरिकों के लिए प्रस्तावित नए रोजगार वीजा

भारतीय छात्रों को अधिक कार्य अधिकार और दीर्घकालिक श्रम गतिशीलता प्रावधानों

परन्यूज़ीलैंड फर्स्ट का तर्क है कि ऐसे प्रावधान“भविष्य की सरकारों के नीति विकल्पों को सीमित कर सकते हैं और घरेलू रोजगार पर दबाव बढ़ा सकते हैं।”

राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं?

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार—“यह विवाद असल में व्यापार बनाम आव्रजन का नहीं, बल्कि वैश्वीकरण बनाम घरेलू सुरक्षा का है। पीटर्स उसी असंतोष को आवाज़ दे रहे हैं जो पश्चिमी लोकतंत्रों में लगातार बढ़ रहा है।”

शिक्षाविदों का कहना है कि FTA जैसे समझौते अब केवल व्यापारिक नहीं रहे, बल्कि जनसंख्या श्रम प्रवाहऔर राष्ट्रीय पहचान से भी गहराई से जुड़ चुके हैं।भारत से रिश्तों पर जोर, दूरी नहीं कड़ी

आलोचना के बावजूद विंस्टन पीटर्स ने यह साफ किया कि उनकी पार्टी का विरोध भारत या उसके नेतृत्व के खिलाफ नहीं है।

उन्होंने स्पष्ट कहा—“न्यूज़ीलैंड फर्स्ट भारत–न्यूज़ीलैंड संबंधों को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है।”पीटर्स ने यह भी याद दिलाया कि विदेश मंत्री के रूप में ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत क्षेत्र से बाहर उनकी पहली यात्रा भारत की थी, और उन्होंने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के प्रति सम्मान व्यक्त किया।उनके अनुसार,भारत सरकार को यह बात पहले ही स्पष्ट कर दी गई है कि FTA पर आपत्ति भारत की मंशा या भारतीय वार्ताकारों की क्षमता पर सवाल नहीं है, बल्कि न्यूज़ीलैंड की गठबंधन सरकार के भीतर मतभेदों का नतीजा है।

भारत सरकार की दृष्टि:

संयम और रणनीति भारत सरकार के कूटनीतिक सूत्रों का कहना है दिल्ली इस विवाद कोआंतरिक राजनीतिक प्रक्रियाऔर साझेदार देश की लोकतांत्रिक बहसके रूप में देख रही है।

एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार—“भारत ने हमेशा संतुलित और पारस्परिक लाभ पर आधारित FTA की वकालत की है। आव्रजन भारत के लिए अवसर है, दबाव नहीं।”

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया

भारत में विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है।कुछ दलों का कहना है कि“भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रम गतिशीलता भारत के युवाओं के लिए वास्तविक अवसर बने, न कि केवल राजनीतिक सौदेबाजी का विषय।”वहीं कुछ ने इसे भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक हैसियत का प्रमाण बताया।

रक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञों की राय

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है किभारत–न्यूज़ीलैंड संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं।इंडो–पैसिफिक रणनीति,चीन का बढ़ता प्रभाव,और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित काफी हद तक साझा हैं।

एक रणनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“यदि FTA को सही संतुलन के साथ आगे बढ़ाया गया, तो यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूती देगा।

”निष्कर्ष:

व्यापार समझौता, लेकिन राजनीतिक कसौटी परभारत–न्यूज़ीलैंड FTAअब केवल टैरिफ और निर्यात का मामला नहीं रहा।यह—आव्रजन रोजगार घरेलू राजनीतिऔर वैश्विक शक्ति संतुलन की कसौटी पर खड़ा है।विंस्टन पीटर्स की आपत्तियां यह दिखाती हैं कि वैश्वीकरण के इस दौर में हर व्यापार समझौता,

एक राजनीतिक परीक्षा भी होता है।आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या-क्या वेलिंगटन आंतरिक मतभेदों के बावजूद नई दिल्ली के साथ इस समझौते को एक संतुलित और दूरदर्शी रूप दे पाता है या नहीं

NSK

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