इस्तीफे के बाद पहली बार संसद पहुंचे धर्मेंद्र प्रधान, एनडीए सांसदों ने ‘पाग’ पहनाकर किया सम्मानित स्वागत; सत्ता ने बताया नैतिकता का उदाहरण, विपक्ष बोला- जनता के दबाव का असर

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 28 जुलाई

केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सोमवार को धर्मेंद्र प्रधान पहली बार संसद पहुंचे। संसद परिसर के मकरद्वार पर एनडीए के सांसदों ने उनका जोरदार स्वागत किया। “धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद” के नारों के बीच सांसदों ने उन्हें पारंपरिक ‘पाग’ पहनाकर सम्मानित किया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इसकी चर्चा बनी हुई है।संसद के भीतर जहां विपक्ष विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने में जुटा रहा, वहीं संसद के बाहर एनडीए सांसदों का यह स्वागत कार्यक्रम राजनीतिक संदेश देने वाला कदम माना जा रहा है।

सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान ने किसी पद से चिपके रहने के बजाय लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिक जिम्मेदारी का परिचय दिया है, इसलिए उनका सम्मान किया गया।

क्या होती है ‘पाग’?’

पाग’ भारतीय संस्कृति में सम्मान, गौरव और आत्मीयता का प्रतीक मानी जाती है। मिथिला, राजस्थान, गुजरात सहित देश के कई हिस्सों में खासकर मिथिला में पाग का स्थान विशिष्ट अतिथियों और सम्मानित व्यक्तियों को पाग पहनाने की परंपरा रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संसद में धर्मेंद्र प्रधान को पाग पहनाकर एनडीए ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनका इस्तीफा किसी राजनीतिक मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने का निर्णय था।

विपक्ष ने साधा निशाना

हालांकि विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखा। विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में नैतिक जवाबदेही में विश्वास करती है तो केवल इस्तीफा ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जिन मुद्दों को लेकर देशभर में छात्रों का आक्रोश देखने को मिला, उनकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अब इस्तीफे को “सम्मान” का राजनीतिक प्रतीक बनाकर मूल सवालों से ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है।विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि संसद के भीतर जवाबदेही तय करने के बजाय स्वागत समारोह आयोजित करना उन लाखों छात्रों की भावनाओं के अनुरूप नहीं है, जो लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत के पीछे केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश भी छिपा है। उनके अनुसार एनडीए यह दिखाना चाहता है कि सरकार अपने नेताओं के साथ मजबूती से खड़ी है और इस्तीफे को दोष स्वीकार करने के बजाय नैतिक उत्तरदायित्व की मिसाल के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि दूसरी ओर विपक्ष इस घटनाक्रम को सरकार पर जनदबाव की जीत के रूप में प्रचारित करने की कोशिश करेगा।

ऐसे में एक ही घटना को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक व्याख्या कर रहे हैं और आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के साथ-साथ सार्वजनिक विमर्श में भी प्रमुख बना रह सकता है।

सीजेपी आंदोलन के बाद दिया था इस्तीफा

धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में सीजेपी के उग्र आंदोलन और देशभर में बने तनावपूर्ण माहौल के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा था कि उनका विश्वास हमेशा लोकतंत्र और देश की युवा शक्ति पर रहा है।उन्होंने कहा था कि, “मैं सदैव हमारे प्रजातंत्र की शक्ति में अटूट विश्वास रखने वाला रहा हूं।

युवाओं की आकांक्षाएं और उनका भविष्य सर्वोपरि है। यह मेरे व्यक्तिगत सम्मान का विषय नहीं, बल्कि देश की युवा शक्ति के भविष्य का प्रश्न है।”उन्होंने आगे कहा था कि जंतर-मंतर और देश के विभिन्न हिस्सों में बनी परिस्थितियों का राष्ट्रविरोधी ताकतें लाभ न उठा सकें, देश की एकता बनी रहे और विद्यार्थियों का भविष्य किसी कानूनी या राजनीतिक विवाद में न उलझे, इसी भावना से उन्होंने प्रधानमंत्री को अपना त्यागपत्र सौंपा। साथ ही प्रधानमंत्री के प्रति मार्गदर्शन, विश्वास और सहयोग के लिए आभार भी व्यक्त किया।

छात्र राजनीति से केंद्रीय मंत्रिमंडल तक

धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से शुरू हुआ। छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने वाले नेताओं में उनकी पहचान संगठन कौशल और प्रशासनिक अनुभव के लिए रही है।

अब उनके इस्तीफे और उसके बाद संसद में हुए सम्मान ने भारतीय राजनीति में नैतिक जवाबदेही, राजनीतिक संदेश और जनधारणा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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