बी के झा


नई दिल्ली / ढ़ाका, 26 दिसंबर
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश जिस अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, वह अब केवल सड़कों पर दिखने वाले उपद्रव और राजनीतिक टकराव तक सीमित नहीं रह गया है। देश के भीतर एक मौन लेकिन बेहद खतरनाक संकट आकार ले चुका है—परिवार नियोजन व्यवस्था का चरमराना। कंडोम और अन्य गर्भनिरोधकों की भारी किल्लत के बीच बांग्लादेश की जन्मदर 50 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है।
विशेषज्ञ इसे केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और भविष्य की राजनीतिक अस्थिरता से जोड़कर देख रहे हैं।कंडोम की कमी, नीति की नाकामी बांग्लादेश के परिवार नियोजन महानिदेशालय के पास इस समय कंडोम का स्टॉक केवल 39 दिनों के लिए बचा है। हालात इतने गंभीर हैं कि अगले साल की शुरुआत में कम से कम एक महीने तक सरकारी स्तर पर कंडोम वितरण पूरी तरह ठप रहने की आशंका है। यह स्थिति फंड की कमी, मानव संसाधन के अभाव और लंबे समय से चली आ रही नीतिगत उदासीनता का नतीजा मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक,“यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। यह उस शासन-शैली का परिणाम है, जिसमें सुरक्षा और सत्ता को प्राथमिकता दी गई, लेकिन जनसंख्या प्रबंधन जैसे मूलभूत मुद्दों कोई नजरअंदाज किया गया।
”50 साल बाद बढ़ी प्रजनन दर:
खतरे की घंटी
मल्टीपल इंडिकेटर क्लस्टर सर्वे 2025 के अनुसार, बांग्लादेश की कुल प्रजनन दर 2024 में 2.3 से बढ़कर 2.4 हो गई है। यह पिछले 50 वर्षों में पहली बार हुआ है जब देश की जन्मदर में बढ़ोतरी दर्ज की गई हो।
शिक्षाविदों का कहना है कि यह आंकड़ा मामूली दिख सकता है, लेकिनु“जनसंख्या जैसे बड़े पैमाने पर यह बढ़ोतरी सामाजिक ढांचे, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर जबरदस्त दबाव डाल सकती है।”
गर्भनिरोधकों के उपयोग में तेज गिरावट
सर्वे के आंकड़े और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं—15–49 वर्ष की विवाहित महिलाओं में गर्भनिरोधक उपयोग 62.7% से गिरकर 58.2%आधुनिक गर्भनिरोधकों तक पहुंच 77.4% से घटकर 73.5%यह स्पष्ट करता है कि गर्भनिरोधकों की उपलब्धता और प्रजनन दर के बीच सीधा और खतरनाक संबंध है। कोविड के बाद बढ़ी लापरवाही बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, कोविड-19 के दौरान गर्भनिरोधकों की मांग बढ़ी, लेकिन सरकार ने परिवार नियोजन को प्राथमिकता नहीं दी। 2023 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने लगभग एक साल तक गर्भनिरोधकों की खरीद रोक दी, जिससे आपूर्ति श्रृंखला टूट गई।आंकड़े इसकी गवाही देते हैं—
सितंबर 2019: 97.48 लाख कंडोम सितंबर 2025: सिर्फ 41.52 लाख हालांकि सरकार ने हाल ही में सभी पांच गर्भनिरोधकों की खरीद के लिए एक परियोजना को मंजूरी दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नुकसान की भरपाई में वर्षों लग सकते हैं।
शिक्षाविदों की चेतावनी: सामाजिक संतुलन खतरे मेंढाका विश्वविद्यालय के जनसंख्या विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अमीनुल इस्लाम के अनुसार,“गर्भनिरोधकों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी ने जन्म नियंत्रण गतिविधियों को लगभग पंगु बना दिया है। इसके अलावा, हाल के वर्षों में दो से अधिक बच्चे चाहने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है, जो दीर्घकालिक खतरे का संकेत है।”
हिंदू संगठनों की चिंता: अल्पसंख्यकों पर असरबांग्लादेश के हिंदू संगठनों ने इस संकट पर अलग दृष्टिकोण रखा है। उनका कहना है कि“राजनीतिक अराजकता और प्रशासनिक कमजोरी का सबसे बुरा असर हमेशा अल्पसंख्यकों पर पड़ता है। बढ़ती आबादी, संसाधनों की कमी और सामाजिक तनाव का सीधा असर हिंदू समुदाय की सुरक्षा और जीवन स्तर पर पड़ सकता है।”उनका दावा है कि जनसंख्या असंतुलन भविष्य में सांप्रदायिक और सामाजिक दबाव को और बढ़ा सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों की राय: जनसंख्या भी सुरक्षा मुद्दा रक्षा और रणनीतिक मामलों के जानकार इस संकट को केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं मानते।
एक रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार,“तेजी से बढ़ती आबादी, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता मिलकर कट्टरपंथ और आंतरिक सुरक्षा के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करती है। यह बांग्लादेश ही नहीं, पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
”विपक्षी दलों का हमला: सरकार की विरासत पर सवाल बांग्लादेश के विपक्षी दलों ने इस पूरे संकट के लिए पूर्व सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है।
एक विपक्षी नेता ने कहा,“जिस देश को कभी परिवार नियोजन का मॉडल माना जाता था, वहां आज कंडोम तक उपलब्ध नहीं हैं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राज्य की प्राथमिकताओं की शर्मनाक तस्वीर है।
”निष्कर्ष:
उपद्रव से बड़ा खतरा
बांग्लादेश में सड़कों पर दिखने वाला उपद्रव जितना शोर करता है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक यह मौन जनसंख्या संकट है। कंडोम की कमी, गिरती परिवार नियोजन सेवाएं और बढ़ती जन्मदर मिलकर एक ऐसे भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं, जहां गरीबी, अस्थिरता और कट्टरता और गहराएगी।
यह संकट केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि शासन, नीति और राष्ट्रीय दिशा का संकट है।अगर समय रहते इसे नहीं संभाला गया, तो बांग्लादेश के लिए यह समस्या उपद्रव से कहीं ज्यादा विनाशकारी साबित हो सकती है।
