बी के झा
NSK

पटना, 11 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के एग्ज़िट पोल ने सियासी हलचल तेज़ कर दी है। इंडिया टीवी–Matrize के मुताबिक बिहार में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को सत्ता वापसी की मजबूत संभावना दिखाई दे रही है। पोल के अनुमान में एनडीए को 147–167 सीटें, महागठबंधन को 70–90, प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को 0–2 और अन्य दलों को 2–8 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है।
हालांकि एग्ज़िट पोल की अपनी सीमाएं होती हैं और इतिहास गवाह है कि कई बार ये सर्वे वास्तविक परिणामों से काफी दूर साबित हुए हैं। इसलिए 14 नवंबर को मतगणना के दिन ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर एग्ज़िट पोल एनडीए के पक्ष में क्यों झुकते दिख रहे हैं? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
1. आक्रामक प्रचार और मोदी–शाह की जोड़ी का प्रभावइस चुनाव में एनडीए ने प्रचार के मोर्चे पर कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने दर्जनों रैलियों में विपक्ष पर तीखे हमले किए।एनडीए ने अपनी रणनीति में “जंगल राज” का मुद्दा फिर से उठाया और मतदाताओं को राजद की “वापसी के ख़तरे” का संदेश दिया।
विशेषकर महिला मतदाताओं के बीच प्रधानमंत्री की रैलियों को उल्लेखनीय रिस्पॉन्स मिला।
2. कल्याणकारी योजनाओं और नए वादों का असरएनडीए ने अपनी उपलब्धियों—सड़कों, बिजली कनेक्शन, गांवों में इंफ्रास्ट्रक्चर और केंद्र की योजनाओं—को ज़ोरदार तरीके से पेश किया।इसके अलावा, महिलाओं को 10,000 रुपये का स्टार्टअप सहायता, 125 यूनिट मुफ्त बिजली, और गरीब परिवारों के लिए नई योजनाएं वोटरों को आकर्षित करती दिखीं।वहीं महागठबंधन ने भी बड़े वादे किए—
हर परिवार से एक सरकारी नौकरी
गरीब महिलाओं को एकमुश्त 30,000 रुपये लेकिन एनडीए का दावा है कि उनका वादा “व्यवहारिक और लागू करने योग्य” है, जबकि महागठबंधन पर “अवास्तविक सपने बेचने” का आरोप लगाया जाता रहा।
3. तेजस्वी बनाम नीतीश—दो युगों की लड़ाईइन चुनावों को बिहार की राजनीति में एक युगांतकारी मोड़ माना जा रहा है।नीतीश कुमार का यह संभवतः आखिरी चुनाव बताया जा रहा है।दूसरी ओर, लालू प्रसाद यादव ने पार्टी की कमान लंबे समय पहले तेजस्वी यादव को सौंप दी है, इसलिए इस बार लड़ाई “पुरानी व्यवस्था बनाम नई पीढ़ी” जैसी भी दिखी।
यह मुकाबला जातीय समीकरणों, विकास बनाम परिवर्तन और स्थिरता बनाम प्रयोग के बीच झूलता रहा।
4. मतदाता सूची का विवाद और ध्रुवीकरण का आरोपकांग्रेस और महागठबंधन ने SIR अभियान को “वोट चोरी” का साधन बताया, जबकि एनडीए ने विपक्ष पर “घुसपैठियों को संरक्षण देने” का आरोप लगाया।इन आरोप-प्रत्यारोपों ने चुनाव को और गर्माया, खासकर शहरी और सीमावर्ती इलाकों में ध्रुवीकरण की चर्चा बढ़ी।
5. रिकॉर्ड तोड़ मतदान—यह किसका संकेत?पहले और दूसरे दोनों चरणों में रिकॉर्डतोड़ वोटिंग हुई।राजनेताओं और विश्लेषकों के बीच इस बात पर मतभेद है कि यह बढ़ा हुआ मतदान किसके हित में जाएगा।कुछ जानकार कहते हैं—बदलाव की हवा चल रही है, लोगों ने “नई सरकार” के लिए वोट दिया है।
वहीं अन्य विश्लेषक मानते हैं
एनडीए का वोटबैंक बेहद संगठित है, इसलिए भारी वोटिंग उनकी रणनीति को और मजबूत कर सकती है।इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में प्रशांत किशोर की 10,000 रेड्डियों और उनके अभियान को मिली अभूतपूर्व चर्चा ने भी समीकरणों को उलझाया है।सच यही है कि अभी यह तय करना मुश्किल है कि यह वोटिंग बदलाव चाहने वालों का परिणाम है या एनडीए के ध्रुवीकृत और सशक्त कैडर का।
6. 14 नवंबर—सत्य का दिनएग्ज़िट पोल अक्सर एक झलक देते हैं, लेकिन असली तस्वीर ईवीएम खोलने पर ही सामने आती है।इसलिए 14 नवंबर बिहार की राजनीति के लिए ऐतिहासिक दिन साबित होने वाला है।चाहे परिणाम किसी के भी पक्ष में जाएं, पर यह तो तय है कि यह चुनाव बिहार की राजनीतिक संरचना में एक बड़ा परिवर्तन लाने वाला है।
