बी के झा
NSK


वैशाली/पटना, 7 फरवरी
एक ओर कुख्यात अपराधी का एनकाउंटर, दूसरी ओर प्रवासी मजदूरों के लिए राहत पैकेज—बिहार में एक ही दिन में राज्य की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। पुलिस की बंदूक और सरकार की सहायता राशि, दोनों ने मिलकर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या बिहार कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक संतुलन साध रहा है, या यह सब आने वाले राजनीतिक संदेश का हिस्सा है?
2 लाख का इनामी शूटर प्रिंस ढेर
पीएमसीएच से फरार, 28 से अधिक संगीन मामलों में आरोपी और सरकार द्वारा दो लाख रुपये के इनाम वाला शार्प शूटर प्रिंस उर्फ अभिषेक आखिरकार पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। वैशाली जिले के गोरौल थाना क्षेत्र के हुसेना खुर्द गांव निवासी प्रिंस को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर एक घर में घेर लिया था। पुलिस के अनुसार, उसने पहले फायरिंग की, जवाबी कार्रवाई में वह घायल हुआ और अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया।
वैशाली के एसपी विक्रम सिहाग ने बताया कि प्रिंस के पास से पिस्टल बरामद की गई है और उसका एक साथी घायल अवस्था में गिरफ्तार किया गया है, जिसके पास से भी हथियार मिले हैं। उस पर अलग से मामला दर्ज किया जाएगा।प्रिंस पर हाजीपुर कोर्ट परिसर में पुलिसकर्मी की हत्या, देश के अलग-अलग हिस्सों में सोना लूट के बड़े कांड (2017 आसनसोल – 56 किलो, 2019 हाजीपुर – 55 किलो, 2022 कटनी – 16 किलो) समेत लूट, हत्या और आर्म्स एक्ट के कुल 28 से अधिक मामले दर्ज थे।
कानूनविदों का सवाल: एनकाउंटर आख़िरी विकल्प था या सिस्टम की नाकामी?
वरिष्ठ कानूनविदों का मानना है कि अपराधी का मारा जाना भले ही पुलिस के लिए बड़ी सफलता लगे, लेकिन इससे पीएमसीएच से फरारी जैसे सवाल और गहरे हो जाते हैं।पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता (नाम काल्पनिक) कहते हैं,“अगर कोई अपराधी जेल से इलाज के दौरान फरार हो जाता है, तो एनकाउंटर से पहले यह तय होना चाहिए कि उस फरारी की जिम्मेदारी किसकी थी।
एनकाउंटर न्याय का विकल्प नहीं हो सकता।
”वहीं कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि अत्यंत खतरनाक अपराधियों के मामले में पुलिस के पास अक्सर सीमित विकल्प रह जाते हैं।
प्रवासी मजदूरों पर ‘मेहरबान’ सरकार
इसी दिन पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रवासी मजदूरों के लिए बड़ा फैसला लिया गया। दुर्घटना में प्रवासी मजदूर की मौत पर मिलने वाली सहायता राशि दो लाख से बढ़ाकर चार लाख रुपये कर दी गई।इसके साथ ही:मृत प्रवासी मजदूर का शव राज्य सरकार के खर्चे पर घर पहुंचाया जाएगा घायल मजदूरों का मुफ्त इलाज पहले की तरह जारी रहेगा यह निर्णय बिहार राज्य प्रवासी मजदूर दुर्घटना अनुदान योजना (संशोधन) नियमावली 2023 में संशोधन के बाद लिया गया है।
शिक्षाविदों का आकलन: कल्याण बनाम पलायन की जड़
राजनीतिक अर्थशास्त्र के जानकार मानते हैं कि यह फैसला राहत तो देता है, लेकिन मूल समस्या नहीं सुलझाता।पटना विश्वविद्यालय के एक शिक्षाविद कहते हैं,“चार लाख की सहायता मौत के बाद है। सवाल यह है कि बिहार से लोग मरने के लिए क्यों बाहर जाते हैं?
जब तक स्थानीय रोजगार नहीं बनेगा, तब तक यह नीति मरहम से ज़्यादा कुछ नहीं।
”विपक्ष का आरोप: चुनावी साल की ‘सॉफ्ट पॉलिटिक्स’
विपक्षी दलों ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं।राजद और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह फैसला आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है।राजद प्रवक्ता का बयान:“सरकार पहले रोजगार देती, तो मजदूर बाहर जाते ही नहीं। अब हादसे के बाद पैसे देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता।”
17 प्रस्तावों की कैबिनेट मुहर
कैबिनेट बैठक में कुल 17 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिनमें:सुपौल के वीरपुर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का निर्माण125 यूनिट मुफ्त बिजली के लिए 349 करोड़ रुपये बजट सत्र में तृतीय अनुपूरक बजट पेश करने की स्वीकृति विभिन्न योजनाओं के लिए धनराशि जारी करना शामिल है
निष्कर्ष:
दो बिहार, एक सरकार
एक तरफ अपराध के खिलाफ सख्ती दिखाती पुलिस, दूसरी ओर सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाती सरकार—
बिहार की यह दोहरी तस्वीर है।राज्य यह संदेश देना चाहता है कि वह अपराधियों के लिए कठोर है और गरीबों के लिए संवेदनशील। लेकिन सवाल यही है कि क्या यह संतुलन टिकाऊ है, या सिर्फ परिस्थितिजन्य?
बिहार की राजनीति में फिलहाल बंदूक और बजट—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
