बी के झा
NSK

पटना, 17 दिसंबर
एनडीए की हालिया चुनावी सफलता के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि गठबंधन के भीतर स्थिरता आएगी, लेकिन हकीकत इसके उलट दिख रही है। चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के बीच उभरी ताजा सियासी खींचतान ने यह संकेत दे दिया है कि सत्ता की छांव में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं टकराव पैदा करती हैं।
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) में लोजपा (रामविलास) के कई नेताओं की एंट्री ने एनडीए के अंदर ‘पार्टी तोड़’ की बहस को तेज कर दिया है।
कुशवाहा का दांव:
संगठन विस्तार या रणनीतिक संतुलन?
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा का कहना है कि उनकी पार्टी में नए नेताओं के आने से न सिर्फ बिहार बल्कि भविष्य में यूपी और दिल्ली जैसे राज्यों में भी संगठनात्मक मजबूती मिलेगी।
कुशवाहा इसे स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया बताते हैं।
उनके मुताबिक, अगर ये नेता कहीं और जाते, तो एनडीए को नुकसान होता—
इस लिहाज से आरएलएम में आना गठबंधन के हित में है।लेकिन सवाल यह है कि जब चिराग पासवान की पार्टी ने विधानसभा चुनाव में शत-प्रतिशत स्ट्राइक रेट और लोकसभा में मजबूत प्रदर्शन किया, तो फिर असंतोष क्यों?
यही सवाल इस पूरे घटनाक्रम को साधारण दल-बदल से आगे ले जाता है।चिराग पासवान की चुनौती: सफलता के बावजूद असंतोष लोजपा (रामविलास) के भीतर उठती नाराजगी चिराग पासवान के लिए चेतावनी है। पार्टी के चर्चित चेहरे और पूर्व प्रवक्ता एके वाजपेयी का राष्ट्रीय लोक मोर्चा में जाना केवल एक नेता का फैसला नहीं, बल्कि नेतृत्व शैली पर सवाल के तौर पर देखा जा रहा है। खुद वाजपेयी का कहना है कि उन्हें पार्टी में सम्मान नहीं मिला और चिराग की क्षमता को लेकर वे आश्वस्त नहीं रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, युवा नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती यही होती है—
सफलता के बाद भी वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना। चिराग पासवान का उदय तेज रहा है, लेकिन पार्टी के भीतर संतुलन साधना अब उनकी अग्निपरीक्षा बन गया है।
एनडीए के भीतर छीनाझपटी का संकेत राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह घटनाक्रम केवल दो दलों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि एनडीए के अंदर प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की होड़ है। हर घटक दल आगामी विधानसभा चुनावों से पहले अपनी उपयोगिता और ताकत साबित करना चाहता है। ऐसे में ‘पार्टी तोड़’ की चर्चा भले ही सार्वजनिक रूप से न स्वीकारी जाए, लेकिन सियासी गलियारों में इसे एक रणनीतिक खेल के तौर पर देखा जा रहा है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया:
मौन में छिपा व्यंग्य विपक्षी दल इस पूरे घटनाक्रम पर खुलकर बयान देने से बच रहे हैं, लेकिन अंदरखाने इसे एनडीए की “अंदरूनी कमजोरी” बता रहे हैं।
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता का कहना है, “जो गठबंधन खुद को अजेय बता रहा था, वही अब अपने ही सहयोगियों को संभालने में उलझ गया है। यह आने वाले चुनावों का ट्रेलर है।
”राजद और कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर यह खींचतान बढ़ी, तो इसका सीधा लाभ विपक्ष को मिल सकता है, खासकर दलित और पिछड़ा वोट बैंक में।सोशल मीडिया का सियासी आईना
राष्ट्रीय लोक मोर्चा में नेताओं की एंट्री पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। किसी ने इसे “फर्जी चेहरों का जमावड़ा” बताया, तो किसी ने सवाल उठाया कि क्या ये सभी एक ही दल से थे। यह डिजिटल प्रतिक्रिया बताती है कि जनता के बीच भी इस सियासी उठापटक को लेकर संशय और व्यंग्य दोनों मौजूद हैं।
निष्कर्ष:
मजबूती या दरार?उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह मौका खुद को मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने का है, जबकि चिराग पासवान के लिए यह चेतावनी कि चुनावी सफलता ही सब कुछ नहीं होती। एनडीए के लिए यह समय आत्ममंथन का है—
क्या यह गठबंधन भीतर से और मजबूत होगा या महत्वाकांक्षाओं की खींचतान इसे कमजोर करेगी?
फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम केवल एक दल-बदल नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों का संकेतक बन चुका है।
