ऑयल मार्केट में उथल-पुथल: $103 के पार कच्चा तेल, ईरान-अमेरिका तनातनी ने बढ़ाई वैश्विक बेचैनी

बी के झा

नई दिल्ली, 26 मार्च

वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर चुका है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड $103 प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी $91 के ऊपर ट्रेड करता दिखा। इस उछाल के पीछे सबसे बड़ा कारण ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव और विरोधाभासी कूटनीतिक संकेत माने जा रहे हैं।

तनाव की जड़: बातचीत से इंकार और विरोधाभासी दावे

तेल बाजार में इस उबाल की शुरुआत तब हुई जब ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी सीधी बातचीत से साफ इनकार कर दिया। ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, “अतीत के अनुभवों को देखते हुए फिलहाल प्रत्यक्ष वार्ता संभव नहीं है।”दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप (या अमेरिकी नेतृत्व) का दावा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है।इन परस्पर विरोधी बयानों ने निवेशकों को असमंजस में डाल दिया है, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ी है।

होर्मुज जलडमरूमध्य: संकट का केंद्र

इस पूरे घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य पर वैश्विक नजरें टिकी हुई हैं।दुनिया के लगभग 20% तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है किसी भी तरह की रुकावट = वैश्विक आपूर्ति संकट परिणाम: कीमतों में तेज उछाल

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर श्वेता चौधरी का मानना है कि होर्मुज सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की जीवनरेखा है। यहां हलचल का मतलब है पूरी दुनिया में आर्थिक दबाव।”अर्थशास्त्रियों की चेतावनी: महंगाई का नया दौर?

प्रमुख अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक $100 के ऊपर बनी रहती हैं, तो इसका सीधा असर वैश्विक महंगाई पर पड़ेगा।अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी का मानना है कि “तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी विकासशील देशों के लिए महंगाई और चालू खाता घाटा दोनों को बढ़ा देती है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह गंभीर चुनौती है।”

भारत पर असर: आम आदमी की चिंता बढ़ी

भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करते हैं, इस उछाल से सीधे प्रभावित होंगे।संभावित असर:पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी परिवहन लागत में इजाफा खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव

आम नागरिक कि प्रतिक्रिया:“

अगर तेल फिर महंगा हुआ, तो हर चीज महंगी हो जाएगी—सब्जी से लेकर बस किराया तक।”

विपक्ष का हमला, सरकार पर दबाव

देश के विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है।विपक्षी नेता सलमान खुर्शीद:“सरकार को पहले से रणनीति बनानी चाहिए थी। अंतरराष्ट्रीय संकट का असर सीधे जनता पर पड़ रहा है, लेकिन राहत के ठोस कदम नजर नहीं आ रहे।”

राजनीतिक विश्लेषण: “ऊर्जा युद्ध” का नया दौर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल तेल की कीमतों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक बड़े “ऊर्जा युद्ध” का संकेत है।राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर का मानना है कि:“ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अब केवल सैन्य नहीं रहा, बल्कि यह ऊर्जा और आर्थिक प्रभुत्व की लड़ाई बन चुका है। तेल इसका सबसे बड़ा हथियार है।”

आगे की राह: अनिश्चितता बनी रहेगी

विशेषज्ञों के अनुसार:जब तक ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम नहीं होताऔर होर्मुज जलडमरूमध्य सुरक्षित नहीं होता तब तक तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा।

निष्कर्ष

कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल केवल एक आर्थिक घटना नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, कूटनीति और सामरिक संतुलन का प्रतिबिंब है।आज का तेल बाजार हमें यह संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में “ऊर्जा” ही विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा निर्णायक तत्व बनने जा रही है।

NSK

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