कांतारा की चावुंडी दैव कौन हैं? रणवीर सिंह का मज़ाक क्यों आस्था, संस्कृति और कानून—तीनों पर भारी पड़ गया

बी के झा

NSK

नई दिल्ली | 29 जनवरी

फिल्म कांतारा ने भारतीय सिनेमा में केवल एक कहानी नहीं सुनाई थी, बल्कि उस लोक-आध्यात्मिक परंपरा को मुख्यधारा में ला खड़ा किया, जिसे सदियों तक ‘लोक’ कहकर हाशिये पर रखा गया। अब उसी परंपरा के एक दैवीय स्वरूप—चावुंडी दैव—को लेकर अभिनेता रणवीर सिंह कानूनी और सामाजिक विवादों में फंस गए हैं।एक सार्वजनिक मंच पर मज़ाकिया लहज़े में दिए गए उनके हाव-भाव और बयान को लेकर आरोप है कि उन्होंने कांतारा में दिखाई गई दैव परंपरा का उपहास किया और उसे एक “अजीब एक्सप्रेशन” से जोड़कर पेश किया।

इस पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है और मामला केवल एक अभिनेता की टिप्पणी तक सीमित नहीं रहा—यह अब आस्था, सांस्कृतिक सम्मान और अभिव्यक्ति की सीमाओं की बहस बन चुका है।कांतारा और लोक आस्था की पुनर्प्रतिष्ठा कांता राव की असाधारण सफलता का कारण यही रहा कि उसने 21वीं सदी के शहरी दर्शक को उसकी आस्था की जड़ों से जोड़ दिया। यह आस्था किसी धर्मग्रंथ की लिखित आज्ञा से नहीं, बल्कि खेतों, जंगलों, नदियों और पीढ़ियों की स्मृति से बनी है।दक्षिण भारत के तुलुनाडु क्षेत्र की दैव परंपरा को उत्तर भारत के दर्शकों ने अपने-अपने रक्षक देवताओं—डीह बाबा, गोगाजी, तेजाजी, पाबूजी—के भाव से जोड़ा। इसी परंपरा में कांतारा ने जिन दैवीय शक्तियों को दिखाया, उनमें गुलिगा, पंजुरली और चावुंडी दैव प्रमुख हैं।

कौन हैं चावुंडी दैव?

चावुंडी दैव तुलुनाडु की प्राचीन भूत कोला (भूत आराधने) परंपरा में पूजी जाने वाली एक उग्र स्त्री रक्षक शक्ति हैं। लोककथाओं में उन्हें गुलिगा दैव की बहन माना गया है। उनका स्वरूप भयंकर है—भस्म से लिपटा शरीर, बिखरे बाल, खोपड़ियों की माला और वाहन बाघ।लेकिन यह उग्रता विनाश के लिए नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन के लिए है।मान्यता है कि जब समुदाय अपने पूर्वजों से किए वादों—जल, जंगल और जमीन—से मुकरता है, तब चावुंडी दैव हस्तक्षेप करती हैं। जंगलों का अंधाधुंध कटाव, नदियों का मार्ग रोकना, तालाब सुखाना या प्रकृति के साथ विश्वासघात—इन सबका दंड चावुंडी के न्याय से जुड़ा है।‘परफॉर्मेंस’ नहीं, जीवित आस्था

शिक्षाविद और लोक-संस्कृति विशेषज्ञ प्रो. शिवराम हेगड़े कहते हैं—“दैव परंपरा को अगर सिर्फ एक नृत्य या अभिनय समझा गया, तो यही टकराव होगा। यहां दैव को जीवित न्यायकारी सत्ता माना जाता है।”इसीलिए जब किसी सार्वजनिक मंच पर इस परंपरा की नकल या मज़ाक होता है, तो स्थानीय समाज में इसे अपमान माना जाता है।

चावुंडी दैव और चामुंडी देवी: समानता और अंतर

हालांकि नाम और उग्र स्वरूप के कारण चावुंडी दैव की तुलना उत्तर भारतीय चामुंडी देवी से की जाती है, लेकिन दोनों एक नहीं हैं।चामुंडी देवी वैदिक-पौराणिक परंपरा में दुर्गा का उग्र रूप हैं, जबकि चावुंडी दैव स्थानीय लोक-आध्यात्मिक सत्ता हैं, जिनकी पूजा मंदिरों में नहीं, बल्कि भूत कोला अनुष्ठानों के माध्यम से होती है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

हिन्दू संगठनों की प्रतिक्रिया

विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों ने इस मामले को “लोक आस्था का अपमान” बताते हुए अभिनेता से सार्वजनिक माफी की मांग की है।एक बयान में कहा गया—“यह मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी का नहीं, सांस्कृतिक मर्यादा का है।

”धर्मगुरुओं का पक्ष

कर्नाटक के एक प्रमुख शैव संत ने कहा—“दैव परंपरा हिन्दू धर्म की ही जड़ है। उसका उपहास पूरे सनातन पर प्रहार जैसा है।”

कानूनविदों की राय

वरिष्ठ अधिवक्ता आर. वेंकटेशन के अनुसार—“यदि किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है और वह सार्वजनिक मंच पर होती है, तो आईपीसी की धाराएं स्वतः लागू हो सकती हैं। यह मामला हल्का नहीं है।

”विपक्षी दलों का आरोप

विपक्षी दलों ने इसे “सेलेक्टिव आक्रोश” बताते हुए कहा कि—“जब लोक आस्था का मज़ाक उड़ाया जाता है, तब अभिव्यक्ति की आज़ादी की ढाल नहीं होनी चाहिए।”

राज्य सरकार का रुख

कर्नाटक सरकार ने बयान जारी कर कहा है कि वह मामले की निष्पक्ष जांच कराएगी और राज्य की लोक परंपराओं के सम्मान से कोई समझौता नहीं होगा।

राजनीतिक विश्लेषण

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी मानते हैं—“कांतारा के बाद लोक परंपराएं राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गई हैं। अब यह सिर्फ सिनेमा नहीं, सांस्कृतिक पहचान का सवाल है।”उनके अनुसार, यह विवाद आने वाले समय में संस्कृति बनाम कॉमेडी और आस्था बनाम अभिव्यक्ति की बहस को और तेज़ करेगा।

निष्कर्ष

रणवीर सिंह का मामला यह दिखाता है कि आधुनिक भारत में लोक परंपराएं अब हाशिये की चीज़ नहीं रहीं।चावुंडी दैव केवल कांतारा का किरदार नहीं हैं—

वह उस सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक हैं, जहां प्रकृति, न्याय और समुदाय एक साथ सांस लेते हैं।और शायद यही वजह है कि यहां किया गया एक मज़ाक, केवल मज़ाक नहीं रह जाता—

वह पूरे विश्वास तंत्र से टकरा जाता है।

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