बी के झा
नई दिल्ली, 14 दिसंबर भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अपने कार्यकाल की शुरुआत ऐसे समय में की है, जब न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सार्वजनिक विमर्श तेज़ है। 24 नवंबर से शुरू हुए अपने 15 महीनों के कार्यकाल में उन्होंने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि उनका एजेंडा केवल लंबित मामलों के निपटारे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि न्यायिक प्रशासन की बुनियादी प्रक्रियाओं—
विशेषकर कॉलेजियम प्रणाली—में भरोसा बढ़ाने पर केंद्रित होगा।इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में CJI सूर्यकांत ने कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार, ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ की अवधारणा, न्यायिक स्वतंत्रता, सोशल मीडिया पर आलोचना और न्यायपालिका की संस्थागत जिम्मेदारियों पर खुलकर बात की। उनके विचारों ने न केवल कानूनी जगत, बल्कि राजनीतिक और अकादमिक हलकों में भी नई बहस छेड़ दी है।
कॉलेजियम पर खुलापन, लेकिन संतुलन के साथजस्टिस सूर्यकांत ने कॉलेजियम प्रणाली का बचाव करते हुए कहा कि यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए विकसित हुई है, लेकिन किसी भी प्रणाली की तरह इसमें भी सुधार की गुंजाइश है।
उन्होंने माना कि नियुक्तियों और तबादलों को लेकर पारदर्शिता की मांग जायज़ है और इसी दिशा में अब अनुमोदन या अस्वीकृति के कारण दर्ज करने की कोशिश की जा रही है।उनके अनुसार, उम्मीदवारों के साथ कॉलेजियम सदस्यों की व्यक्तिगत बातचीत एक सकारात्मक कदम है, जिससे योग्यता, सत्यनिष्ठा और संवैधानिक समझ का प्रत्यक्ष आकलन संभव होता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कुछ आंतरिक प्रक्रियाएं ऐसी हैं, जिन्हें सार्वजनिक करना प्रणाली की अखंडता को नुकसान पहुंचा सकता है।‘मास्टर ऑफ रोस्टर’: अधिकार नहीं, जिम्मेदारी
CJI सूर्यकांत ने ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ की अवधारणा को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश का यह दर्जा किसी एकतरफा शक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि वरिष्ठता के साथ आने वाली प्रशासनिक जिम्मेदारी है। मामलों का आवंटन अन्य न्यायाधीशों की उपलब्धता, विशेषज्ञता और न्यायालय के समग्र संतुलन को ध्यान में रखकर परामर्श के बाद किया जाता है।
न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की आत्मा न्यायिक स्वतंत्रता पर उन्होंने दो टूक कहा कि यह संविधान के शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का मूल है।
न्यायपालिका की जवाबदेही किसी राजनीतिक सत्ता के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और नागरिकों के प्रति है। यही स्वतंत्रता न्यायालय को लोकप्रिय या अलोकप्रिय फैसले लेने का साहस देती है।
सोशल मीडिया आलोचना पर संयम की सलाह
सोशल मीडिया पर जजों की आलोचना को लेकर जस्टिस सूर्यकांत का रुख संतुलित रहा। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना समाधान नहीं है। संदर्भ से काटकर साझा किए गए वीडियो या टिप्पणियां भ्रम पैदा करती हैं, लेकिन न्यायाधीशों को इससे विचलित नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि न्याय की गुणवत्ता पर ध्यान बनाए रखना ही सबसे बड़ा उत्तर है।
राजनीतिक और वैचारिक प्रतिक्रियाएं
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि CJI का यह रुख कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक संस्थागत संदेश है।
विश्लेषक शरत प्रधान के अनुसार, “कॉलेजियम में पारदर्शिता की बात कहकर CJI ने सुधार का रास्ता खोला है, लेकिन उन्होंने न्यायिक स्वायत्तता की लाल रेखा भी खींच दी है।”
कानूनविद
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह और शिक्षाविद प्रो. (डॉ.) माधव मेनन का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी मुख्य न्यायाधीश ने कॉलेजियम में सुधार की बात की हो, लेकिन जिस स्पष्टता से जस्टिस सूर्यकांत ने सीमाएं और संभावनाएं बताई हैं, वह संवाद को आगे बढ़ाएगी।
विपक्षी दलों ने जहां पारदर्शिता की बात का स्वागत किया, वहीं कुछ नेताओं ने इसे अधूरा कदम बताया। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि “अगर कारण बताए जा सकते हैं, तो पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने पर भी विचार होना चाहिए।”
वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष के नेताओं का कहना है कि न्यायपालिका द्वारा आत्मसुधार की पहल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। सरकार से जुड़े एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ ने कहा कि “कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव नहीं, संवाद की जरूरत है, और CJI के बयान उसी दिशा में हैं।
निष्कर्ष
सुधार का संकेत, टकराव नहीं जस्टिस सूर्यकांत के विचार यह संकेत देते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय आत्मावलोकन के दौर में है। कॉलेजियम प्रणाली को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने की पहल, लेकिन संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की चेतावनी—दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि न्यायपालिका सुधार चाहती है, लेकिन अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि यह रोडमैप शब्दों से आगे बढ़कर व्यवहार में कितना उतरता है।
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