“खून, सियासत और बंगाल का बारूद: शुभेंदु के PA की हत्या पर भाजपा का विस्फोट, अभिषेक बनर्जी पर सीधे आरोप”

बी के झा

NSK

कोलकाता, 7 मई

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर रक्तरंजित मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। सत्ता परिवर्तन की दहलीज पर खड़े राज्य में नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की निर्मम हत्या ने राजनीतिक तापमान को विस्फोटक बना दिया है। भाजपा अब खुलकर तृणमूल कांग्रेस और खासतौर पर Abhishek Banerjee पर गंभीर आरोप लगा रही है।राज्य में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद जहां नई सरकार गठन की तैयारियां चल रही थीं, वहीं मध्यमग्राम की सड़कों पर चली गोलियों ने बंगाल की राजनीति को फिर उसी पुराने सवाल के सामने खड़ा कर दिया है—

क्या बंगाल में सत्ता का रास्ता अब भी हिंसा की गलियों से होकर गुजरता है?“

हम अपने कार्यकर्ताओं को कब तक रोक पाएंगे?”भाजपा नेताओं के बयान इस घटना के बाद केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भीतर उबल रहे आक्रोश की खुली अभिव्यक्ति बनकर सामने आए हैं। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष आनंद बनर्जी ने बेहद तीखे शब्दों में कहा कि पार्टी ने वर्षों तक संयम रखा, लेकिन अब कार्यकर्ताओं का गुस्सा नियंत्रण से बाहर हो सकता है।उन्होंने आरोप लगाया कि 2021 चुनावों के बाद भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, लेकिन पार्टी ने लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन किया। उनके बयान का सबसे गंभीर हिस्सा वह था, जब उन्होंने कहा—“

हम अपने कार्यकर्ताओं को आखिर कब तक रोक पाएंगे?”

राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे एक चेतावनी भरा राजनीतिक संदेश मान रहे हैं। बंगाल की राजनीति में इस प्रकार की भाषा केवल बयानबाजी नहीं होती, बल्कि जमीनी स्तर पर बड़े टकरावों की पूर्व भूमिका भी बन सकती है।अभिषेक बनर्जी पर सीधे आरोपभाजपा नेता Arjun Singh ने बिना लाग-लपेट सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि इस हत्या के पीछे अभिषेक बनर्जी का हाथ है। उन्होंने दावा किया कि यह हमला भाजपा को “डराने और शक्ति प्रदर्शन” का प्रयास था।भाजपा के नवनिर्वाचित विधायक कौस्तव बागची ने भी इसे “पूर्व नियोजित राजनीतिक हत्या” बताते हुए कहा कि जब तक अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं होगी, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा अब इस हत्या को केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रहने देना चाहती, बल्कि इसे “राजनीतिक आतंक बनाम लोकतांत्रिक जनादेश” के नैरेटिव में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है।

अग्निमित्रा पॉल का भावुक हमला

भाजपा की उभरती नेता Agnimitra Paul ने इस घटना को भवानीपुर में Mamata Banerjee की हार से जोड़ते हुए कहा कि यह “राजनीतिक प्रतिशोध” का परिणाम हो सकता है।उन्होंने चंद्रनाथ रथ को पार्टी कार्यकर्ताओं का “भाई” बताते हुए कहा कि जनता के भीतर भारी गुस्सा है। पॉल ने यह भी दावा किया कि भाजपा के बूथ कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे हैं और राज्य में भय का माहौल बनाया जा रहा है।राजनीतिक गलियारों में उनके इस बयान को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बंगाल में भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व और “पीड़ित कार्यकर्ता” राजनीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।“

बंगाल में लोकतंत्र या गैंगवार?”

राजनीतिक शिक्षाविदों का कहना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति धीरे-धीरे वैचारिक संघर्ष से हटकर “संगठित शक्ति संघर्ष” का रूप लेती जा रही है। कोलकाता के राजनीतिक अध्येताओं के अनुसार, बंगाल में चुनाव केवल मतदान नहीं, बल्कि “क्षेत्रीय नियंत्रण” की लड़ाई बन चुके हैं।एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है—“जब राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक चेतावनी देने लगें, तब समझना चाहिए कि लोकतंत्र और सड़क की शक्ति के बीच की रेखा कमजोर पड़ रही है।”

कानूनविदों ने मांगी निष्पक्ष जांच

कानूनी विशेषज्ञों ने इस मामले में तीखी प्रतिक्रिया दी है। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि यदि हत्या के पीछे राजनीतिक साजिश की आशंका है, तो जांच राज्य पुलिस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।कुछ कानूनविदों ने केंद्रीय एजेंसियों या विशेष जांच दल (SIT) की मांग उठाई है। उनका कहना है कि किसी बड़े राजनीतिक नेता के करीबी सहयोगी की हत्या केवल आपराधिक घटना नहीं, बल्कि राज्य की संस्थागत विश्वसनीयता की परीक्षा है।

हिन्दू संगठनों में उबाल

घटना के बाद कई स्थानीय हिन्दू संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए। संगठनों का आरोप है कि बंगाल में वर्षों से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हिंसा का माहौल बनाया गया है।कुछ संगठनों ने इसे “राष्ट्रवादी विचारधारा को डराने की कोशिश” बताया और चेतावनी दी कि यदि अपराधियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो राज्यव्यापी आंदोलन चलाया जाएगा।

पुलिस की जांच और बढ़ते सवाल

राज्य के DGP सिद्ध नाथ गुप्ता ने बताया कि जांच शुरू कर दी गई है और घटनास्थल से कारतूस, CCTV फुटेज तथा संदिग्ध वाहन बरामद किए गए हैं। हालांकि पुलिस को शक है कि इस्तेमाल की गई गाड़ी की नंबर प्लेट फर्जी थी।लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि अस्पताल से कुछ ही दूरी पर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देकर हमलावर आखिर कैसे फरार हो गए?

क्या यह केवल पेशेवर अपराध था या इसके पीछे किसी बड़े नेटवर्क का हाथ है?

बंगाल की राजनीति का खतरनाक मोड़

भाजपा की प्रचंड चुनावी जीत के बाद यह पहली बड़ी हिंसक घटना है, जिसने स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन का रास्ता आसान नहीं होने वाला।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में राजनीतिक बयानबाजी और सड़क की प्रतिक्रिया इसी तरह तेज होती गई, तो बंगाल एक बार फिर प्रतिशोध की राजनीति के भंवर में फंस सकता है।फिलहाल पूरा राज्य दो सवालों के बीच खड़ा है—

क्या यह केवल एक हत्या थी?

या फिर बंगाल की नई राजनीतिक लड़ाई की पहली खूनी दस्तक?

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