बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 13 दिसंबर
भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की एक हालिया टिप्पणी ने न केवल न्यायपालिका की प्राथमिकताओं पर बहस को तेज किया है, बल्कि देश को एक बार फिर उस ऐतिहासिक रात की याद दिला दी है, जब सुप्रीम कोर्ट आधी रात के बाद सुबह तीन बजे खुला था। जस्टिस सूर्यकांत का स्पष्ट संदेश है—
न्याय का पहला अधिकार सबसे गरीब और सबसे कमजोर नागरिक का है।एक याचिका को खारिज करते हुए CJI ने कहा, “मेरे कोर्ट में लग्जरी यानी अमीरों की मुकदमेबाजी के लिए कोई जगह नहीं है। मैं यहां सबसे आखिरी पंक्ति में बैठे सबसे छोटे और सबसे गरीब याचियों के लिए हूं। जरूरत पड़ी तो मैं उनके लिए आधी रात तक भी बैठूंगा।”
यह टिप्पणी केवल एक भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की उस आत्मा की अभिव्यक्ति है, जो समानता, गरिमा और न्याय को सर्वोपरि मानती है।
2015 की वह रात:
जब सुप्रीम कोर्ट 3 बजे खुला 30 जुलाई 2015 की रात भारतीय न्यायिक इतिहास में एक असाधारण अध्याय के रूप में दर्ज है।
1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी से कुछ घंटे पहले, उसकी अंतिम याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ सुबह तीन बजे बैठी। यह पहली बार था जब शीर्ष अदालत ने किसी मौत की सजा से जुड़े मामले में इतनी देर रात असाधारण सुनवाई की।
करीब 90 मिनट तक चली इस सुनवाई के बाद अदालत ने फांसी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसके कुछ ही घंटों बाद, नागपुर सेंट्रल जेल में याकूब मेमन को फांसी दे दी गई।
दिल्ली की उस रात की हलचल—वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायपालिका के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच दौड़—
इस बात का प्रतीक थी कि कानून की अंतिम सांस तक भी न्यायिक प्रक्रिया जीवित रहती है।
गरीब बनाम ‘लग्जरी लिटिगेशन’:
CJI का साफ संदेश
जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी को कई कानूनी विशेषज्ञ लग्जरी लिटिगेशन—
यानी प्रभावशाली और संपन्न वर्ग द्वारा वर्षों तक अदालतों को व्यस्त रखने वाली मुकदमेबाजी—के खिलाफ एक कड़ा संकेत मान रहे हैं।
संवैधानिक विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) आर.के. वर्मा कहते हैं, “यह बयान न्यायपालिका की नैतिक दिशा को रेखांकित करता है।
सुप्रीम कोर्ट का समय और ऊर्जा सीमित है।
अगर यह समय गरीबों, बंदियों, महिलाओं और हाशिए पर खड़े नागरिकों के मामलों में लगे, तो यही संविधान की सच्ची सेवा है।”
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक संजय दीक्षित का मानना है कि CJI का यह रुख न्यायपालिका और जनता के बीच विश्वास को मजबूत करता है। “ऐसे दौर में जब न्याय को लेकर आम नागरिक में निराशा है, यह संदेश उम्मीद जगाता है कि सुप्रीम कोर्ट आज भी अंतिम सहारा है।”
याकूब मेमन मामला: कानून बनाम संवेदना
याकूब मेमन का मामला हमेशा से कानून और संवेदना के टकराव का प्रतीक रहा है। एक ओर 257 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले आतंकी हमले थे, दूसरी ओर यह सवाल कि क्या मौत की सजा के अंतिम क्षण तक न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी रही?
सीनियर अधिवक्ता और कानून विशेषज्ञ श्री अरविन्द कुमार सिंह मानते हैं कि 2015 की आधी रात की सुनवाई ने यह स्थापित किया कि भारत की न्यायपालिका
-वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेश यादव ने कहा CJI का यह रुख स्वागत योग्य है
even सबसे कठोर फैसलों में—प्रक्रियात्मक न्याय से समझौता नहीं करती।न्यायपालिका की प्राथमिकताएं और भविष्य की दिशा
CJI सूर्यकांत के कार्यकाल को न्यायिक सुधारों, लंबित मामलों में कमी और गरीबों तक न्याय की पहुंच बढ़ाने के प्रयासों से जोड़कर देखा जा रहा है।
उन्होंने तकनीक, वैकल्पिक विवाद समाधान और निचली अदालतों को सशक्त करने पर भी जोर दिया है।पूर्व न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) का कहना है, “
अगर सुप्रीम कोर्ट सच में ‘गरीब का कोर्ट’ बनता है, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
निष्कर्ष‘
गरीब का केस हो तो आधी रात को भी बुला लो’—यह वाक्य केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका की आत्मा का घोष है। 2015 की ऐतिहासिक रात और 2025 की यह नई न्यायिक सोच, दोनों मिलकर यह संदेश देती हैं कि न्याय समय नहीं देखता, बल्कि जरूरत देखता है।आज, जब अदालतों पर मुकदमों का बोझ है और समाज में असमानता गहरी होती जा रही है,
CJI सूर्यकांत का यह दृष्टिकोण भारतीय लोकतंत्र को एक नैतिक दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
