चुनाव में कैश बांटना वेलफेयर नहीं—मुरली मनोहर जोशी का तीखा प्रहार, केंद्र, बिहार सरकार और ‘रेवड़ी राजनीति’ पर राजनीतिक विश्लेषकों, शिक्षाविदों और विपक्ष का बड़ा हमला•••

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 21 नवंबर

भारतीय राजनीति में बढ़ती ‘कैश और रेवड़ी संस्कृति’ पर भाजपा के वरिष्ठतम नेता और चिंतक डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने ऐसा हमला बोला है, जिसे राजनीति का पूरा हल्का झकझोरने वाला बयान कहा जा रहा है।पूर्व चुनाव आयुक्त जी. कृष्णमूर्ति के 91वें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में जोशी ने चेतावनी दी—

चुनाव में कैश बांटना कोई वेलफेयर नहीं—यह वोट खरीदने का आधुनिक तरीका है। यह लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए खतरनाक है।”उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार चुनाव से ठीक पहले नीतीश सरकार की महिलाओं को 10,000 रुपये कैश योजना ने पूरे राजनीतिक माहौल को गर्म कर रखा है।“

समान विकास ही संविधान की आत्मा”—

जोशी ने आर्थिक असमानता पर कड़ी चिंता जताते हुए कहा—

अगर विकास समान नहीं होगा, तो आर्थिक और राजनीतिक दोनों अधिकार अधूरे रह जाएंगे। वोट का अधिकार तभी सार्थक है जब नागरिक आर्थिक रूप से मजबूत हों।”उन्होंने छोटे राज्यों के गठन, जनसंख्या नियंत्रण और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण पर भी जोर दिया।“आज सरकारें वेलफेयर के नाम पर वोट खरीद रही हैं”—

जोशीअपनी बात को और कठोर बनाते हुए उन्होंने कहा—सरकारें कैश बांटकर इसे वेलफेयर बताती हैं, लेकिन जनता समझती है कि यह चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा भ्रम है।

राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे जोशी का सबसे साहसिक बयान बताया है, खासकर ऐसे समय में जब केंद्र और राज्य सरकारें लगातार नई कैश-आधारित योजनाएं ला रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की बड़ी टिप्पणियाँ“ वेलफेयर को वोट बैंक मशीन बना दिया गया”—

प्रो. अरुण देसाई

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. देसाई ने कहा—मुरली मनोहर जोशी ने राजनीतिक वर्ग का सबसे बड़ा सच उजागर किया है। आज वेलफेयर नीति नहीं—चुनावी हथियार बन चुकी है।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की तरफ संकेत करते हुए कहा—जब शीर्ष नेतृत्व खुद रेवड़ी कार्यक्रमों को बढ़ावा देता है तो राज्यों को रोकने का नैतिक आधार खत्म हो जाता है।”“रेवड़ियां समाज को बांटती हैं, मतदाता को निर्भर बनाती हैं”—

रेखा शर्मा (चुनावी रणनीतिकार)रेखा शर्मा ने कहा—ये योजनाएं गरीबों की गरीबी नहीं मिटातीं, बल्कि उन्हें स्थायी निर्भरता में फंसा देती हैं। यह लोकतंत्र के चरित्र को बदल देती है।”उनका कहना है कि अब राजनीति नीति से नहीं, पैसे से तय होने लगी है।

शिक्षाविदों और सामाजिक चिंतकों की बड़ी टिप्पणियां“बिहार की राजनीति में मुद्दे गायब—

कैश स्कीम केंद्र में”—डॉ. रघुनाथ मिश्रा‌

उन्होंने कहा—बिहार जैसे राज्य में जहां शिक्षा-स्वास्थ्य सबसे बड़े मुद्दे हैं, वहां चुनाव सिर्फ 10,000 रुपये की स्कीम पर लड़ लिया गया। यह लोकतंत्र का मज़ाक है।उन्होंने कटाक्ष किया—जब वोट कैश में बदलने लगे, तो चुनाव सिर्फ औपचारिकता रह जाता है।“अगर ईमानदारी नहीं बची, तो लोकतंत्र खत्म”—

वरिष्ठ पत्रकार अनिल चौधरी

अनिल चौधरी ने कहा—जोशी ने वह बोल दिया है जो भाजपा के भीतर कोई कहने की हिम्मत नहीं करता। केंद्र और राज्य दोनों वोट के लिए योजनाएं डिजाइन कर रहे हैं, विकास के लिए नहीं।”उन्होंने आगाह किया—यदि फ्री कैश ही चुनाव का आधार बन गया, तो देश नीतियों से नहीं—ट्रांजैक्शन से चलेगा। यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।”

विपक्षी दलों की धारदार प्रतिक्रियाएँ

जोशी के बयान के बाद विपक्ष ने सरकार पर जमकर निशाना साधा।

लगभग सभी दलों ने एक ही बात कही—जोशी ने सच बोल दिया है, बस सरकार इसे स्वीकार नहीं करना चाहती।

1. कांग्रेस: “भाजपा रेवड़ी बोलती है, लेकिन हर चुनाव में बांटती खुद है”कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा—जोशी ने वह कहा है जो भाजपा अंदर दबाकर रखती है। केंद्र सरकार आज चुनाव जीतने के लिए सरकारी पैसों, धार्मिक ध्रुवीकरण और कैश योजनाओं पर निर्भर है।उन्होंने और भी तीखा हमला किया—मोदी जी रेवड़ी की आलोचना करते हैं, और चुनाव से पहले वही रेवड़ियां बांटते हैं। यह लोकतंत्र की खुली खरीद-फरोख्त है।”

2. राजद (RJD): “यह चुनाव नहीं—इलेक्शन मैनेजमेंट इंडस्ट्री बन गई है”राजद प्रवक्ता मनोज झा ने टिप्पणी की—जोशी सही कह रहे हैं, लेकिन भाजपा बताए कि उनकी चुनावी रणनीति क्या है? केंद्र की योजनाएँ भी चुनावी टाइमिंग पर ही आती हैं। यह लोकतंत्र नहीं—इलेक्शन मैनेजमेंट है।”उन्होंने तंज किया—अगर रेवड़ियां ही चुनाव जिताती हैं, तो विकास मॉडल की क्या जरूरत?”

3. तृणमूल कांग्रेस (TMC): “भाजपा गरीबों के नाम पर कैश देती है, बाद में टैक्स वसूलती है”टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा—जोशी भाजपा के आखिरी नेताओं में हैं जो सच बोलते हैं। केंद्र चुनाव के वक्त पैसे बांटता है और चुनाव के बाद महंगाई बढ़ाकर जनता से वसूल लेता है।”उन्होंने गंभीर आरोप लगाया—देश को ‘फ्री राशन मतदाता’ बनाम ‘ध्रुवीकृत मतदाता’ में बांट दिया गया है। यह लोकतंत्र की हत्या है।”

4. वाम दल (CPI-M): “रेवड़ी राजनीति असल में कॉर्पोरेट-हितैषी राजनीति है”CPM नेता सीताराम येचुरी ने कहा—गरीबों को थोड़ी रेवड़ियां और चुनाव के बाद कॉर्पोरेट को अरबों की छूट—यही भाजपा का मॉडल है।”उन्होंने कहा—जोशी का बयान भाजपा की अंदरूनी बेचैनी दिखाता है।

”5. जेडीयू के पूर्व सहयोगी तेजस्वी यादव: “नीतीश महिलाओं को सशक्त नहीं, वोट बैंक बना रहे हैं”तेजस्वी यादव ने कहा—चुनाव से ठीक पहले 10,000 रुपये देना महिला सशक्तिकरण नहीं—सीधी राजनीतिक रिश्वत है। यह लोकतंत्र का पतन है।

उन्होंने कहा—बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा—सब गायब। सिर्फ कैश की राजनीति बची है।”क्या भारत कैश-आधारित राजनीति की ओर बढ़ रहा है?

जोशी के बयान ने और विशेषज्ञों की टिप्पणियों ने कई गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं—

क्या भारत की राजनीति नीति-आधारित से कैश-आधारित हो चुकी है?क्या चुनाव अब फ्री योजनाओं का बाजार बन चुके हैं?

क्या आर्थिक असमानता मतदान अधिकार को कमजोर कर रही है?

और क्या यह मॉडल लोकतंत्र को संस्थागत रूप से कमजोर कर देगा?अंत में जोशी का संदेश साफ और चेतावनी की तरह है—

लोकतंत्र सिर्फ वोट से नहीं बचता—मतदाता की आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक ईमानदारी से बचता है।

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