बी के झा
नई दिल्ली/ पटना, 8 दिसंबर
बिहार की राजनीति इन दिनों एक बार फिर तीखी बहसों से घिरी है।जदयू के नालंदा से सांसद कौशलेन्द्र कुमार ने बंगाल में बाबरी मस्जिद पुनर्निर्माण के समर्थन में दिया बयान ऐसा था जिसने मानो सूखे मैदान में चिंगारी गिरा दी हो।भारत की राजनीति में यह मुद्दा वर्षों से भावनात्मक, धार्मिक और वैचारिक संवेदनाओं की धुरी रहा है—और अब बिहार में इस पर नया राजनीतिक भूचाल खड़ा हो गया है।
सांसद का बयान—‘बाबरी मस्जिद बननी चाहिए’कौशलेन्द्र कुमार ने अपने बयान में कहा—बंगाल में बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण होना चाहिए… समाज में भाईचारा और सद्भाव इसी से मजबूत होगा।”एक ओर उन्होंने इसे धार्मिक सद्भाव का प्रतीक बताया, वहीं उनकी ही पार्टी में और विरोधी दलों में इस पर मिश्रित से अधिक तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं।
जदयू के अंदर ही विरोध — ‘यह बयान पार्टी लाइन नहीं’हालाँकि जदयू शीर्ष नेतृत्व ने आधिकारिक प्रतिक्रिया से बचने की कोशिश की, लेकिन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अनौपचारिक बातचीत में कहा—यह संवेदनशील राष्ट्रव्यापी मुद्दा है, जदयू का इससे कोई लेना-देना नहीं। यह सांसद का व्यक्तिगत बयान है।बिहार जदयू सूत्र बताते हैं कि पार्टी नेतृत्व सांसद से ‘स्पष्टीकरण’ भी मांग सकता है।
BJP का कड़ा हमला — ‘नीतीश कुमार बताएं, यह महागठबंधन का स्टैंड है क्या?’भाजपा नेताओं ने इस बयान कोमहागठबंधन की मुस्लिम तुष्टिकरण राजनीति कहा।बीजेपी प्रवक्ता का बयान—क्या नीतीश कुमार और जदयू बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण चाहते हैं? यह वोट बैंक के लिए धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ है। देश इस तरह के बयानों को बर्दाश्त नहीं करेगा।”सूबे के बीजेपी नेताओं ने इसे“मुस्लिम appeasement का नया अध्याय” और“राममंदिर के बाद हिंदुओं की भावनाओं पर दूसरा आघात”बताया।
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया — ‘यह हिंदू आस्था पर सीधा प्रहार’VHP (विश्व हिंदू परिषद)“संविधान सम्मत फैसला आ चुका है। राम मंदिर का निर्माण पूर्ण वैध है। ऐसे बयानों से सिर्फ समाज में जहर घोलने की कोशिश होती है।”बजरंग दल“मस्जिद का पुनर्निर्माण मांगना दरअसल कट्टरपंथी वोटों को खुश करने का एजेंडा है। हिंदू समाज इसे एक बड़ी साजिश के रूप में देखता है।”RSS से जुड़े एक वरिष्ठ कार्यकर्ता (अनाम अनुरोध पर)“नालंदा ज्ञान का केंद्र रहा है। आज वहाँ के सांसद विभाजनकारी बयान दे रहे हैं—यह चिंताजनक है। हिंदू समाज ऐसी राजनीति के खिलाफ एकजुट होगा।”
RJD और महागठबंधन की असहज चुप्पी — ‘हम दूर रहना चाहते हैं’राजद ने बयान पर सीधे टिप्पणी किए बिना कहा—यह सांसद की निजी राय है। राज्य में असली मुद्दे बेरोजगारी और विकास हैं।”महागठबंधन के दूसरे घटक दल भी इस मुद्दे को छूने से बचते दिखे, जिससे साफ है कि सभी दल जानते हैं कि बाबरी विवाद की गर्मी ज़्यादा होती है और फायदा कम।
कांग्रेस का रुख — ‘समाज में विभाजन की राजनीति बंद हो’कांग्रेस नेताओं ने सांसद के बयान का बचाव तो नहीं किया, लेकिन भाजपा पर निशाना साधा—बीजेपी हर घटना को हिंदू-मुस्लिम बना देती है। बाबरी का अध्याय सुप्रीम कोर्ट में खत्म हो चुका।”
राजनीतिक विश्लेषण — इस बयान का राजनीतिक मतलब क्या है?विशेषज्ञों के अनुसार, कौशलेन्द्र कुमार का यह बयान कई political layers लिए हुए है—
मुस्लिम वोटों के प्रभाव का संकेतनालंदा और आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या प्रभावी है।इस बयान को उसी राजनीतिक गणित से जोड़ा जा रहा है।
महागठबंधन में positioningकुछ विश्लेषक इसे “महागठबंधन के भीतर अपना कद बढ़ाने की कोशिश” बताते हैं।
विपक्ष को narrative देने की चूकBJP को इस बयान से बड़ा ‘राजनीतिक हथियार’ मिल गया है, जिसे वह 2025 विधानसभा चुनावों तक खेल सकती है।
बाबरी विवाद दोबारा गरमाने का प्रयास?देशभर में पिछले कुछ दिनों से—बाबरी पोस्टरधार्मिक जुलूसों पर पथरावमस्जिद-निर्माण की बातें—इन सभी गतिविधियों को “एक व्यापक नैरेटिव निर्माण की कोशिश” के रूप में देखा जा रहा है।
जनता की प्रतिक्रिया — ‘क्यों उखाड़ते हो पुराने घाव?’ग्रामीणों, धार्मिक समूहों और सामाजिक संगठनों में दो तरह की प्रतिक्रियाएँ दिखीं—
कुछ लोगों ने इसे सद्भाव का कदम कहा
परंतु अधिकतर ने कहा—बाबरी को लेकर देश ने बहुत झेला है। अब फिर से इसे राजनीति की आग में क्यों झोंका जा रहा है?”
निष्कर्ष —
बयान छोटा, असर विशाल कौशलेंद्र कुमार का बयान एक साधारण टिप्पणी नहीं।यह एक ऐसा बिंदु बन गया है जिससे —बिहार की सियासत महागठबंधन के समीकरण हिंदू संगठनों की प्रतिक्रियाऔर बीजेपी की रणनीति सभी की दिशा आने वाले समय में प्रभावित हो सकती है।
यह मुद्दा सिर्फ “बाबरी मस्जिद पुनर्निर्माण” का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की नई वैचारिक खाई का प्रतीक बन गया है।
NSK

