बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 23 नवंबर
भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने जा रहे जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक विमर्श को “स्वदेशी न्यायशास्त्र” की ओर मोड़ने का स्पष्ट संकेत दिया। उनका संदेश साफ था—भारत की अदालतें अब इतनी परिपक्व हो चुकी हैं कि विदेशी न्यायालयों के निर्णयों पर आधारित तर्कों की जरूरत नहीं, बल्कि अपने ही फैसलों पर आधारित विचारधारा को स्थापित करने का समय आ गया है।
भारत का अपना न्यायशास्त्र—75 साल की पूंजीजस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 75 वर्षों में ऐसे सुदृढ़ और विश्वसनीय निर्णयों का भंडार तैयार कर चुका है, जिन्हें दुनिया की कई अदालतें उद्धृत करती हैं।उन्होंने सवाल उठाया—जब दुनिया हमारी अदालतों के फैसलों को मानती है, तो हमें अपने सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से सर्वथा भिन्न देशों के निर्णयों का सहारा क्यों लेना चाहिए?
उनके अनुसार, न्यायिक निर्णय केवल कानून की व्याख्या नहीं होते, बल्कि देश के सामाजिक ढांचे, आर्थिक परिस्थितियों, राजनीतिक प्रकृति और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप भी होने चाहिए।और ये सभी तत्व भारत को विशिष्ट बनाते हैं—इसलिए भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण भी विशिष्ट होना चाहिए।विदेशी उदाहरणों पर निर्भरता कम करने का संकेत
जस्टिस सूर्यकांत का यह बयान उस बहस का हिस्सा है, जिसमें वर्षों से सवाल उठता रहा है कि क्या भारतीय अदालतें, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट, विदेशी न्यायालयों के फैसलों का अत्यधिक संदर्भ लेती हैं।कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि इस बयान से भारत में न्यायिक ‘आत्मनिर्भरता’ का दौर तेज हो सकता है।कानूनविदों के एक वर्ग का मानना है कि:विदेशी न्याय व्यवस्था भारत के सामाजिक स्वरूप से काफी भिन्न है।पश्चिमी देशों के फैसलों पर आधारित तर्क कभी-कभी भारतीय परिप्रेक्ष्य से मेल नहीं खाते।सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसलों का स्वयं बड़ा संग्रहालय बन जाना चाहिए।
लंबित मामलों का बोझ—CJI सूर्यकांत की बड़ी चुनौतीसूर्यकांत ने स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट में लगभग 90,000 मामले लंबित हैं।लेकिन उन्होंने इसके बावजूद आशा जताई कि व्यवस्थित रणनीति से इस चुनौती को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
उनकी प्राथमिकताएँ
:1. 7 व 9 जजों की बड़ी संवैधानिक पीठों का गठन– ताकि विमर्श योग्य राष्ट्रीय मुद्दों का समयबद्ध निपटारा हो सके।
2. संस्थागत सुधारों पर जोर
3. सभी न्यायिक रिक्तियों को तुरंत भरना
4. मामलों के शुरुआती चरण में ही विवाद के दायरे को स्पष्ट करने वाली प्रणाली विकसित करना, जिससे न्यायिक समय बच सके।उन्होंने बताया कि कुछ हालिया आदेशों से एक ही निर्णय में 1,000 मामलों का निपटारा संभव हुआ, जो न्यायिक सुधारों की दिशा में सकारात्मक संकेत है।कर मामलों पर भी दिया स्पष्ट संदेश
उन्होंने कहा कि सरकार का टैक्स मामलों में व्यावहारिक रवैया दिखाई दे रहा है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “5 करोड़ रुपये जैसी राशि पर लंबा मुकदमा चलाना समझदारी नहीं”—इससे अदालतों का समय और संसाधन दोनों नष्ट होते हैं।
सोशल मीडिया की आलोचना—एक न्यायाधीश का धैर्य परीक्षण
CJI पद संभालने से पहले ही जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि उन्हें सोशल मीडिया की आलोचना से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।उनके शब्दों में—न्यायाधीश दबाव में न आते हैं और न आना चाहिए। सोशल मीडिया की टिप्पणियों को अनदेखा करना ही सर्वोत्तम तरीका है।”उन्होंने कहा कि CJI को हर तरह के दबाव से ऊपर रहकर काम करना होता है—और वे इसके लिए पूरी तरह तैयार हैं।
विश्लेषण: भारतीय न्याय प्रणाली के लिए क्या अर्थ रखते हैं सूर्यकांत के संकेत?कानून विशेषज्ञों के अनुसार, उनका यह दृष्टिकोण भारत में एक “स्वतंत्र न्यायिक वैचारिकी” के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि इससे—भारतीय परिस्थितियों अनुरूप फैसलों की नींव मजबूत होगी न्यायिक प्रणाली अधिक आत्मविश्वासी बनेगी विदेशी कानूनों पर निर्भरता घटेगी इसके साथ ही बड़े लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा करके अदालत की कार्यक्षमता बढ़ाने का रोडमैप भी स्पष्ट हो गया है।
