जामिया में परीक्षा प्रश्न से उठा तूफान: ‘भारत में मुसलमानों का उत्पीड़न’ सवाल, प्रोफेसर शहारे निलंबित, बहस सड़क से संसद तक

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 24 दिसंबर

देश की प्रतिष्ठित केंद्रीय यूनिवर्सिटियों में शुमार जामिया मिलिया इस्लामिया एक बार फिर वैचारिक और अकादमिक बहस के केंद्र में आ गई है। बीए ऑनर्स (सोशल वर्क) के सेमेस्टर एग्जाम में पूछा गया एक सवाल— “भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों के उत्पीड़न पर लिखें। कुछ उदाहरण दें”—

अब केवल एक परीक्षा प्रश्न नहीं रहा, बल्कि राष्ट्र, शिक्षा, अभिव्यक्ति की सीमा और अकादमिक जिम्मेदारी पर बड़ी बहस बन चुका है।इस 15 अंकों के प्रश्न के सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बवाल मच गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पेपर सेट करने वाले प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी शहारे को निलंबित कर दिया और मामले की जांच के लिए एक समिति गठित कर दी।

कौन हैं प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी शहारे?

प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी शहारे जामिया के सोशल वर्क विभाग के वरिष्ठ शिक्षक हैं।पिछले 22 वर्षों से जामिया में सेवाएं जेएनयू से एमफिल और पीएचडी नागपुर यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी अध्यापन शोध रुचि:ग्रामीण व शहरी विकास दलित और जनजातीय मुद्दे सामाजिक बहिष्करण व स्वीकृति शिक्षा और सामाजिक विकास उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और वर्तमान में 7 पीएचडी शोधार्थी उनके मार्गदर्शन में काम कर रहे हैं।

यही वजह है कि दो दशक से अधिक के अनुभव वाले प्रोफेसर द्वारा इस तरह का प्रश्न पूछे जाने पर विवाद और गहरा हो गया।प्रश्न या पूर्वाग्रह? शिक्षा जगत में सवाल यह है कि—क्या यह प्रश्न सामाजिक यथार्थ की अकादमिक समीक्षा था, या

क्या यह एकतरफा राजनीतिक नैरेटिव को स्थापित करने की कोशिश?

राजनीतिक शिक्षाविदों का कहना है कि “सामाजिक समस्याएं” जैसे विषय में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा अकादमिक रूप से असामान्य नहीं है, लेकिन प्रश्न की भाषा और फ्रेमिंग बेहद महत्वपूर्ण होती है।एक वरिष्ठ शिक्षाविद के अनुसार—“यदि प्रश्न में ‘उत्पीड़न’ को पहले से तथ्य मान लिया जाए, तो छात्र विश्लेषण नहीं, बल्कि आरोप दोहराने को मजबूर हो जाता है। यह शिक्षा नहीं, इंडो ctrination का खतरा पैदा करता है।

”यूनिवर्सिटी का सख्त कदम

जामिया के रजिस्ट्रार शेख सफीउल्लाह द्वारा जारी आदेश में प्रोफेसर शहारे के निलंबन की पुष्टि की गई है। पत्र में नियमों के अनुसार एफआईआर की संभावना का भी उल्लेख किया गया, हालांकि विश्वविद्यालय अधिकारियों ने बाद में स्पष्ट किया कि—“फिलहाल एफआईआर दर्ज कराने का कोई इरादा नहीं है। जांच पूरी होने के बाद ही आगे का फैसला लिया जाएगा।”यह भी कहा गया कि परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वविद्यालय की साख से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

कानूनी दृष्टिकोण:

FIR या अकादमिक जांच?

वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि यह मामला आपराधिक से अधिक अकादमिक अनुशासन का है।

सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह ने कहा—“किसी परीक्षा प्रश्न को लेकर सीधे आपराधिक कार्रवाई करना अत्यधिक कदम हो सकता है। पहले यह तय होना चाहिए कि क्या इसमें जानबूझकर राष्ट्र विरोधी मंशा थी या अकादमिक भूल।

उन्होंने चेताया कि—“अगर हर वैचारिक विवाद को एफआईआर में बदला गया, तो विश्वविद्यालय विचारों के कब्रिस्तान बन जाएंगे।”समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों की राय कुछ समाजसेवियों ने सवाल को समाज की सच्चाइयों पर चर्चा का हिस्सा बताया, जबकि अन्य ने इसे एक समुदाय को पीड़ित और दूसरे को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति कहा।एक सामाजिक कार्यकर्ता के अनुसार—“भारत में हर समुदाय को समस्याएं हैं। शिक्षा का काम संतुलित दृष्टि देना है, न कि एकतरफा नैरेटिव।”

राजनीतिक प्रतिक्रिया और वैचारिक ध्रुवीकरण सत्तापक्ष से जुड़े नेताओं ने इसे “शैक्षणिक संस्थानों में वैचारिक एजेंडा” बताया, वहीं विपक्षी स्वर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कह रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—“यूनिवर्सिटियां अब केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष का मैदान बनती जा रही हैं।”अब आगे क्या?जांच समिति तय करेगी कि प्रश्न नियमों का उल्लंघन था या नहीं प्रोफेसर शहारे का पक्ष अभी सामने नहीं आया विश्वविद्यालय की साख और अकादमिक स्वतंत्रता—दोनों दांव पर

निष्कर्ष:

सवाल सिर्फ एक नहीं, पूरी व्यवस्था परयह विवाद एक परीक्षा प्रश्न से कहीं आगे जाकर यह सवाल खड़ा करता है—क्या भारतीय विश्वविद्यालय आलोचनात्मक सोच सिखा रहे हैं या वैचारिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं?

जामिया का यह प्रकरण आने वाले समय में देश की उच्च शिक्षा नीति, अकादमिक स्वतंत्रता और जिम्मेदारी की दिशा तय करने वाला उदाहरण बन सकता है।

फैसला चाहे जो हो, इतना तय है कि यह बहस अब थमने वाली नहीं है।

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