तिलक पर तिरस्कार: ब्रिटेन के स्कूल में 8 वर्षीय हिंदू बच्चे से भेदभाव, धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल

बी के झा

NSK

लंदन / नई दिल्ली, 20 जनवरी जिस ब्रिटेन को बहुसंस्कृतिवाद, धार्मिक सहिष्णुता और मानवाधिकारों का वैश्विक पैरोकार माना जाता है, वहीं उसकी राजधानी लंदन से आई एक घटना ने इन दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक 8 वर्षीय हिंदू छात्र को केवल इसलिए अपना स्कूल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा, क्योंकि वह माथे पर तिलक लगाकर स्कूल गया था—जो उसकी धार्मिक आस्था और पारिवारिक संस्कार का प्रतीक है।यह मामला लंदन के विकर्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल का है, जिसे ब्रिटिश हिंदू और भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था INSIGHT UK ने उजागर किया है।“

अपने धर्म को साबित करो”—बच्चे से सवाल, समाज से शर्म* एनडीटीवी समेत कई रिपोर्ट्स के अनुसार, स्कूल स्टाफ ने न केवल बच्चे से तिलक के धार्मिक महत्व को “समझाने और सही ठहराने” की अपेक्षा की, बल्कि उस पर निगरानी भी रखी गई। शिक्षाविदों के अनुसार, यह व्यवहार बाल मनोविज्ञान और शिक्षा के मूल सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।आरोप है कि:ब्रेक टाइम में भी बच्चे पर नजर रखी गईउसे दोस्तों से अलग-थलग किया गयाकुछ स्कूल जिम्मेदारियों से हटाया गयाभय और असुरक्षा का माहौल बनाया गया परिणामस्वरूप, बच्चा मानसिक रूप से इतना दबाव में आ गया कि माता-पिता को स्कूल छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा।

शिक्षाविदों की राय: यह शिक्षा नहीं, दमन है

ब्रिटेन और भारत के कई शिक्षाविदों का कहना है कि“किसी बच्चे से उसकी धार्मिक पहचान को छुपाने या उसे तर्कों से साबित करने को कहना, आधुनिक शिक्षा नहीं बल्कि सांस्कृतिक दमन है।”उनका मानना है कि स्कूलों का दायित्व समावेशन (Inclusion) सिखाना है, न कि बहुसंख्यक मानकों के अनुसार बच्चों को ढालना।

अंतरराष्ट्रीय कानून और ब्रिटिश कानून क्या कहते हैं?

कानूनविदों के अनुसार यह मामला:यूरोपीय मानवाधिकार संधि (ECHR)यूके इक्वैलिटी एक्ट 2010और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि (UNCRC)का संभावित उल्लंघन है।इन सभी कानूनों में स्पष्ट है कि:किसी भी बच्चे को उसकी धार्मिक पहचान के कारण भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न या अलगाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता।वरिष्ठ कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला अदालत तक गया तो स्कूल प्रशासन को गंभीर कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

हिंदू संगठनों का आक्रोश: “यह सेक्युलरिज़्म नहीं, चयनात्मक असहिष्णुता

ब्रिटेन और भारत दोनों जगह हिंदू संगठनों ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि:सिख पगड़ीईसाई क्रॉसमुस्लिम हिजाबको स्वीकार करने वाला तंत्रहिंदू तिलक से असहज क्यों हो जाता है?

हिंदू धर्मगुरुओं ने इसे “सांस्कृतिक नस्लवाद” की संज्ञा दी है और कहा है कि तिलक केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। *राजनीतिक प्रतिक्रिया: विपक्ष का हमला, ब्रिटेन से जवाब तलब* भारत में विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार से कड़ा रुख अपनाने की मांग की है। नेताओं का कहना है कि:“अगर यह घटना किसी अन्य धार्मिक समूह के साथ होती, तो ब्रिटेन में राजनीतिक भूचाल आ जाता।”

उन्होंने इसे हिंदू फोबिया का उदाहरण बताते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की मांग की है। *भारत सरकार की प्रतिक्रिया: ‘धार्मिक स्वतंत्रता गैर-परक्राम्य’

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार ने इस घटना को गंभीरता से लिया है। विदेश मंत्रालय के स्तर पर कहा गया है कि:भारत धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक मानवाधिकार मानता है प्रवासी भारतीयों, विशेषकर बच्चों की गरिमा और सुरक्षा सर्वोपरि है संभावना जताई जा रही है कि भारत इस मुद्दे को ब्रिटिश अधिकारियों और द्विपक्षीय संवाद में उठाएगा।

रक्षा और सुरक्षा विशेषज्ञों का नजरिया

रक्षा और सामरिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि:“जब किसी समुदाय को संस्थागत स्तर पर अलग-थलग किया जाता है, तो यह केवल सामाजिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौती भी बन सकता है।”उनके अनुसार, यूरोप में बढ़ती सांस्कृतिक असहिष्णुता सामाजिक विखंडन को जन्म दे सकती है।

निष्कर्ष:

सवाल केवल तिलक का नहीं

यह मामला सिर्फ एक बच्चे या एक स्कूल तक सीमित नहीं है।यह सवाल है:धार्मिक स्वतंत्रता का बहुसंस्कृति वाद की सच्चाई का और उस पश्चिमी नैरेटिव का, जो दूसरों को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाता है एक 8 साल के बच्चे को यह एहसास दिलाना कि उसकी पहचान “समस्या” है—किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

अगर तिलक लगाने पर स्कूल छोड़ना पड़े, तो सवाल यह नहीं कि बच्चा क्या पहने—सवाल यह है कि समाज क्या बनता जा रहा है।

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