✦ विशेष लेख | इतिहास–राजनीति–समाज ✦
बी के झा
दरभंगा ( बिहार ), 19 जनवरी
दरभंगा राज सिर्फ़ एक रियासत नहीं था, वह भारतीय सभ्यता, मिथिला संस्कृति और राष्ट्रनिर्माण के मूल्यों का जीवंत प्रतीक था। अपनी निजी ट्रेन, निजी रेलवे टर्मिनल, यूरोपीय शैली के महलों और विश्व की महंगी कारों से सुसज्जित यह राजवंश वैभव का शिखर था, लेकिन उससे भी बड़ा था उसका त्याग, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व।
हाल ही में 96 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही इस ऐतिहासिक राजवंश की एक जीवित कड़ी इतिहास में विलीन हो गई।
निजी ट्रेन से चलने वाला राजा, संविधान बनाने वाला शासक
20वीं सदी के प्रारंभ में दरभंगा राज भारत की सबसे समृद्ध रियासतों में गिना जाता था।करीब 4,495 गांव, बिहार और बंगाल में फैला विशाल क्षेत्र, और ऐसे राजा —महाराज कामेश्वर सिंह, जो एक ओर राजसी वैभव के प्रतीक थे, तो दूसरी ओर भारत की संविधान सभा के सदस्य।उन्होंने उस संविधान के निर्माण में योगदान दिया, जिसने अंततः उनके ही विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया — यह लोकतंत्र के प्रति दुर्लभ समर्पण का उदाहरण है।
राजनीतिक विश्लेषक की प्रतिक्रिया“
आज के दौर में सत्ता बचाने के लिए संविधान बदला जाता है, लेकिन कामेश्वर सिंह जैसे राजा सत्ता छोड़ने के लिए संविधान बनाने वालों में थे। यह भारतीय लोकतंत्र का नैतिक आधार है।”
तीन रानियां, एक जटिल निजी इतिहास
महाराज की तीन पत्नियां —महारानी राजलक्ष्मी देवी (जिनकी डायरियां आज भी इतिहास का मौन दस्तावेज़ हैं)महारानी कामेश्वरी प्रिया (आधुनिक, शिक्षित, प्रशासन में सक्रिय)और महारानी कामसुंदरी देवी — जिनके साथ दरभंगा राज ने स्वतंत्र भारत में सांस ली।
600 किलो सोना : जब राजघराने ने देश को पहले रखा
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब महारानी कामसुंदरी देवी की अगुवाई में दरभंगा राज परिवार ने 600 किलो सोना भारत सरकार को दान कर दिया।
कानूनविद की टिप्पणी“
यह दान किसी कानूनी बाध्यता में नहीं था, यह संवैधानिक नैतिकता और राष्ट्रधर्म का उदाहरण है।”
हिन्दू धर्म गुरु का वक्तव्य“राजा वह नहीं जो सोना जमा करे, राजा वह है जो संकट में राष्ट्र को समर्पित कर दे — दरभंगा राज रामराज्य की अवधारणा का आधुनिक उदाहरण है।”शिक्षा, सड़कें और संस्थान : राज से सेवा तक दरभंगा राज ने —शिक्षण संस्थान बनाए विश्वविद्यालयों को दान दिए सड़कों, अस्पतालों और सामाजिक ढांचे का निर्माण कराया
शिक्षाविद का मत“
यदि आज बिहार में उच्च शिक्षा का कोई आधार है, तो उसमें दरभंगा राज की नींव शामिल है।”
रहस्यमय मृत्यु और अनुत्तरित प्रश्न
1 अक्टूबर 1962 को महाराज कामेश्वर सिंह की अचानक और रहस्यमय मृत्यु,बिना किसी जांच के जल्दबाज़ी में अंतिम संस्कार —
आज भी इतिहास के सबसे बड़े अनुत्तरित अध्यायों में है।
विपक्षी नेता की प्रतिक्रिया
“आज अगर किसी आम नागरिक की ऐसी मृत्यु होती, तो जांच आयोग बनता। राजा के मामले में चुप्पी बताती है कि सत्ता हमेशा पारदर्शी नहीं रही।
”अंतिम विदाई : राजकीय सम्मान, पारिवारिक तनाव
महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुआ।बिहार सरकार के मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, और हज़ारों आम नागरिक उपस्थित रहे।हालांकि संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर पारिवारिक विवाद ने यह भी दिखाया कि इतिहास की सबसे बड़ी विरासतें भी मानवीय संघर्षों से अछूती नहीं होतीं।
स्थानीय समाजसेवी की प्रतिक्रिया
“दरभंगा राज ने हमें गर्व दिया, अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि उसकी स्मृतियों को संजोकर रखें।वहीं एक वयोवृद्ध शिक्षाविद के आंखों में डबडबाए आसूं, रुढ़े आवाज में कहा आज दरभंगा राज को इस स्थिति तक पहुंचाने के पीछे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय डाँ जगन्नाथ मिश्र ने इस राज घराने को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । लेकिन वह भी दरभंगा राज का नाम नहीं मिटा पाए, लेकिन खुद बिहार के राजनीति से जरुर गायब हो गए।
”राज्य सरकार का पक्ष
बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल ने कहा —“दरभंगा राज परिवार का योगदान बिहार ही नहीं, पूरे देश के लिए ऐतिहासिक है। महारानी को श्रद्धांजलि देना हमारे लिए सौभाग्य है।”
निष्कर्ष :
वैभव से विरक्ति तक की यात्रा
दरभंगा राज की कहानी सिर्फ़ महलों, ट्रेनों और सोने की नहीं है।
यह कहानी है —सत्ता छोड़ने की नैतिकता धन को सेवा में बदलने की परंपराऔर राज से राष्ट्र बनने की यात्रा महारानी कामसुंदरी देवी के पंचतत्व में विलीन होने के साथ दरभंगा राज का एक युग समाप्त हुआ, लेकिन उसकी विरासत भारतीय इतिहास में अमर रहेगी।
NSK




