दिल्ली में काबुल की नई दस्तक: नूर अहमद बने भारत में अफगानिस्तान के पहले राजनयिक, दक्षिण एशिया की कूटनीति में नए संकेत

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / काबुल, 10 जनवरी

तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत-अफगानिस्तान संबंधों में एक अहम कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अफगानिस्तान ने नूर अहमद को भारत स्थित अपने दूतावास में राजनयिक नियुक्त किया है। यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच संवाद, भरोसे और रणनीतिक पुनर्संतुलन की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।नूर अहमद इससे पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय में पहले राजनीतिक निदेशक के रूप में कार्य कर चुके हैं और कूटनीतिक मामलों में उन्हें अनुभवी अधिकारी माना जाता है। वे अपनी नई जिम्मेदारी संभालने के लिए भारत पहुंच चुके हैं। तालिबान शासन के बाद यह भारत में किसी अफगान राजनयिक की पहली औपचारिक नियुक्ति है।

कूटनीति का नया अध्याय

राजनयिकों के अनुसार, यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब भारत और अफगानिस्तान दोनों ही व्यावहारिक कूटनीति (Pragmatic Diplomacy) की राह पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। भारत ने अब तक तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन मानवीय सहायता, स्वास्थ्य सहयोग और सीमित कूटनीतिक संवाद जारी रखा है।नूर अहमद की नियुक्ति को इसी संवाद प्रक्रिया का संस्थागत विस्तार माना जा रहा है।भारत-अफगान संबंधों में स्वास्थ्य और मानवीय सहयोग केंद्र में20 दिसंबर को अफगानिस्तान के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री मौलवी नूर जलाल जलाली ने भारत को अफगानिस्तान की दवा और स्वास्थ्य जरूरतों के लिए प्रमुख वैकल्पिक साझेदार बताया था। नई दिल्ली में आयोजित विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान जलाली ने स्पष्ट शब्दों में कहा:“भारत के साथ हमारे संबंध मजबूत हैं। हम सहयोग और साझेदारी का एक नया अध्याय खोलना चाहते हैं। पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध फिलहाल अच्छे नहीं हैं।”इस दौरे के दौरान भारत ने अफगानिस्तान को लगातार मानवीय सहायता, विशेषकर दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की दीर्घकालिक आपूर्ति जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

राजनीतिक विश्लेषक: पाकिस्तान से दूरी,

भारत की ओर झुकाव’वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर.के. शर्मा मानते हैं:“नूर अहमद की नियुक्ति यह दर्शाती है कि तालिबान शासन अब पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर नहीं रहना चाहता। भारत एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में अफगानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।”उनके अनुसार, यह कदम अफगानिस्तान की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने की कोशिश भी है।

रक्षा विशेषज्ञों की दृष्टि: सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल और रक्षा विशेषज्ञ अशोक मेहता कहते हैं:“भारत के लिए अफगानिस्तान केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। वहां की स्थिति का सीधा असर कश्मीर, मध्य एशिया और आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर पड़ता है।”उनका मानना है कि सीमित लेकिन निरंतर संवाद भारत को सुरक्षा जोखिमों पर नजर रखने का अवसर देता है।

पहले भी बढ़े थे संबंधों के संकेत नवंबर 2024 में अफगानिस्तान के वाणिज्य और उद्योग मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी ने घोषणा की थी कि भारत और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से चली आ रही वीजा समस्याओं का समाधान हो गया है।इसके बाद अफगान नागरिकों को चिकित्सा उपचार और व्यापार के लिए भारतीय वीजा मिलना फिर से शुरू हुआ।अक्टूबर 2025 में अफगान विदेश मंत्री अमीर खां मुतक्की ने तालिबान के सत्ता में आने के बाद पहली बार भारत का दौरा किया था। उन्होंने इस यात्रा को “गर्मजोशी भरा और सकारात्मक” बताया था।

रणनीतिक मायने

विशेषज्ञों के अनुसार, नूर अहमद की नियुक्ति तीन बड़े संकेत देती है:भारत-अफगान संवाद अब अस्थायी नहीं, संरचित हो रहा है तालिबान शासन अंतरराष्ट्रीय वैधता के लिए विविध साझेदार चाहता है पाकिस्तान के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच भारत एक विकल्प बन रहा है।

निष्कर्ष

भारत में नूर अहमद की नियुक्ति केवल एक राजनयिक तैनाती नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति का प्रतीक है। यह कदम बताता है कि तमाम जटिलताओं और मतभेदों के बावजूद, संवाद के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। आने वाले समय में यह नियुक्ति भारत-अफगानिस्तान संबंधों को किस दिशा में ले जाती है

यह न केवल काबुल और दिल्ली, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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