बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 13 दिसंबर
राजधानी की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाला एक चौंकाने वाला मामला दिल्ली हाईकोर्ट में सामने आया है। दिल्ली के एक नामी प्राइवेट स्कूल ने अदालत के समक्ष यह स्वीकार किया है कि जिस जमीन पर वह बीते करीब 50 वर्षों से संचालित हो रहा है, उसके स्वामित्व से जुड़े कोई वैध दस्तावेज उसके पास मौजूद नहीं हैं। न तो भूमि आवंटन पत्र है और न ही कोई लीज डीड।
यह खुलासा न केवल स्कूल प्रबंधन की मनमानी को उजागर करता है, बल्कि सरकारी निगरानी तंत्र की गंभीर अनदेखी पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।हाईकोर्ट में कबूलनामा, गोलमोल जवाबों के बाद सच आया सामने जस्टिस
ज्योति सिंह की एकल पीठ के समक्ष पेश हुए हलफनामे में स्कूल प्रबंधन ने माना कि स्कूल वर्ष 1975 से संचालित है, लेकिन जमीन के आवंटन से जुड़े आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। सुनवाई के दौरान स्कूल की प्रिंसिपल जमीन के स्वामित्व और लीज से जुड़े सवालों पर लंबे समय तक गोलमोल जवाब देती रहीं।
अंततः उन्होंने स्वीकार कर लिया कि स्कूल के पास कोई वैध कागजात नहीं हैं।प्रबंधन ने अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हुए दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) पर आरोप मढ़ा कि दस्तावेज उन्हें उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। हालांकि, डीडीए पहले ही अदालत को बता चुका है कि उसके पास इस जमीन से जुड़ा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। इसी के मद्देनजर कोर्ट ने डीडीए को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाते हुए अपना स्पष्ट पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
प्राइवेट स्कूल प्रबंधन की दादागिरी पर सवाल
शिक्षाविदों और शिक्षा अधिकार से जुड़े जानकारों का कहना है कि यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिल्ली में फल-फूल रही उस ‘प्राइवेट स्कूल संस्कृति’ की तस्वीर है, जहां नियम-कानून को ताक पर रखकर शिक्षा को व्यवसाय बना दिया गया है। शिक्षाविद प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार का कहना है, “
अगर कोई स्कूल आधी सदी तक बिना वैध जमीन दस्तावेजों के चल सकता है, तो यह साफ तौर पर प्रशासनिक मिलीभगत या घोर लापरवाही को दर्शाता है।”दिल्ली सरकार की भूमिका पर भी उठे सवाल इस पूरे प्रकरण में दिल्ली सरकार और शिक्षा विभाग की भूमिका भी कटघरे में है।
सवाल यह उठ रहा है कि बिना जमीन के स्वामित्व के प्रमाण के आखिर कैसे स्कूल को मान्यता मिलती रही? कैसे पीढ़ियों के छात्र यहां पढ़ते रहे और मोटी फीस वसूली जाती रही? शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह सरकारी निगरानी तंत्र की विफलता है, जिसकी कीमत अब छात्रों और अभिभावकों को चुकानी पड़ रही है।अभिभावकों में चिंता, बच्चों के भविष्य को लेकर आशंका हाईकोर्ट
में जैसे ही यह तथ्य सामने आया, स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों के अभिभावकों में गहरी चिंता फैल गई। अभिभावकों की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि स्कूल का संचालन ही कानूनी रूप से संदिग्ध है, तो उनके बच्चों का भविष्य अधर में लटक सकता है। उनकी डिग्री, सर्टिफिकेट और आगे की पढ़ाई पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह सोचकर वे भयभीत हैं।
कोर्ट ने अभिभावकों की चिंता को गंभीर बताते हुए आश्वासन दिया कि छात्रों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और मामले की गहराई से जांच की जाएगी।फीस विवाद से शुरू हुआ था मामला गौरतलब
है कि यह स्कूल पहले भी विवादों में रहा है। बीते वर्ष स्कूल प्रबंधन ने फीस बढ़ोतरी के विरोध में एक दर्जन से अधिक छात्रों को स्कूल से निकाल दिया था। मामला अदालत पहुंचा तो बेंच ने अभिभावकों को 60 प्रतिशत फीस जमा करने का निर्देश देते हुए शेष मुद्दों पर बाद में विचार करने की बात कही थी। उसी मामले की सुनवाई के दौरान यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि स्कूल जिस जमीन पर खड़ा है, उसका कोई वैधानिक आधार ही नहीं है।
बड़ा सवाल:
जवाबदेही तय होगी या नहीं?अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले में केवल कागजी खानापूर्ति होगी या फिर प्राइवेट स्कूल प्रबंधन, संबंधित अधिकारियों और मान्यता देने वाली संस्थाओं की जवाबदेही भी तय की जाएगी? शिक्षा के नाम पर चल रहे इस ‘अवैध साम्राज्य’ पर हाईकोर्ट का अंतिम फैसला न सिर्फ इस स्कूल, बल्कि दिल्ली के अन्य प्राइवेट स्कूलों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है।
