बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली, 27 अक्टूबर
बिहार, जिसे कभी “सुशासन” का प्रतीक बताया गया, अब मानव तस्करी के मामलों में देश के शीर्ष चार राज्यों में शामिल हो गया है।नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की ताज़ा रिपोर्ट ने राज्य की कानून-व्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
132 केस, 510 पीड़ित — जिनमें 353 मासूम बच्चेवर्ष 2023 में बिहार में मानव तस्करी के कुल 132 मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में 510 लोग पीड़ित पाए गए — जिनमें 353 नाबालिग और 157 वयस्क शामिल हैं।यह आँकड़ा राज्य के सामाजिक ताने-बाने की दरारों को उजागर करता है, जहाँ गरीबी, बेरोजगारी और असमानता ने बच्चों तक को बेचने की नौबत ला दी है।बिहार में 261 लड़के और 92 लड़कियाँ तस्करी का शिकार बनीं।
यह आंकड़ा खुद सुशासन की नीयत पर सवालिया निशान है।”—
एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता,
पटना
देह व्यापार और जबरन मजदूरी का काला बाज़ारएनसीआरबी की रिपोर्ट में बताया गया है कि बिहार में तस्करी के शिकार 155 लोग वेश्या व्यवसाय (देह व्यापार) के लिए, 93 लोग जबरन बाल श्रम के लिए और 2 लोग जबरन शादी के लिए बेचे गए।इसके अलावा 254 अन्य कारणों से भी लोगों की तस्करी की गई — जिनमें घरेलू नौकर बनाना, फैक्ट्रियों में बंधक मजदूरी कराना और अंग प्रत्यारोपण माफिया की गतिविधियाँ शामिल हैं।अपराध से कमाई के मामले में मानव व्यापार अब ड्रग्स के बाद दूसरे स्थान पर है।”
NCRB रिपोर्ट
आँकड़े घटे, लेकिन सजा शून्य —
अपराधी बेखौफहालांकि 2022 की तुलना में बिहार में मानव तस्करी के मामलों में आधे से अधिक की गिरावट आई है (260 से घटकर 132), लेकिन न्याय व्यवस्था की विफलता चिंता का विषय है।दर्ज 132 मामलों में 114 पर चार्जशीट दाखिल हुई,चार्जशीट रेट 95.8%, लेकिनएक भी अपराधी को सजा नहीं मिली।इस आँकड़े से साफ है कि अपराधी तो पकड़े जा रहे हैं, लेकिन सजा का डर खत्म हो चुका है।2023 में कुल 339 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 334 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई, लेकिन अदालतों में एक भी फैसला पीड़ितों के पक्ष में नहीं जा सका।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: बिहार चौथे पायदान परराज्य 2023 2022 चार्जशीट दरमहाराष्ट्र 388 295 100%तेलंगाना 336 391 100%ओडिशा 162 121 86.5%बिहार 132 260 95.8%इन आंकड़ों से साफ है कि बिहार तेजी से उभरता हुआ केंद्र बनता जा रहा है — मानव तस्करी के अपराधों के लिए, न कि विकास के लिए।
“यही है सुशासन की सच्चाई” —
राजनीतिक विश्लेषक का व्यंग्य
राजनीतिक हलकों में इस रिपोर्ट ने नीतीश सरकार के “सुशासन” मॉडल पर बहस छेड़ दी है।एक वरिष्ठ विश्लेषक ने तीखे शब्दों में कहा —यह है बिहार के सुशासन की असली तस्वीर। जब बच्चे और औरतें तक बिकने लगें, तो समझिए प्रशासन नींद में है।”
सवाल बड़ा है: क्या मानवता की बोली लगाना ही नियति बन जाएगी?बिहार के गाँवों से लेकर सीमावर्ती जिलों तक, मानव तस्करी अब संगठित उद्योग का रूप ले चुकी है।यह व्यापार न सिर्फ गरीबी की उपज है, बल्कि व्यवस्था की असफलता का जीवंत प्रमाण भी।सरकारें बदलती हैं,
लेकिन तस्कर कभी नहीं रुकते — क्योंकि सजा नहीं होती, और व्यवस्था की चुप्पी ही उनकी ताकत बन जाती है।
विश्लेषणात्मक टिप्पणी
बिहार की धरती से प्रतिभाएँ तो रोज निकलती हैं, मगर उसी मिट्टी से बच्चों को तस्करों के हाथों बिकते देखना इस युग का सबसे बड़ा अपराध है।अगर यह ‘सुशासन’ है, तो सोचिए ‘असुशासन’ कैसा होगा।
