धर्मेंद्र प्रधान का अचानक मांझी से मिलना बना सियासी चर्चा का केंद्र — बिहार NDA में सीट बंटवारे को लेकर मचेगा घमासान? — गठबंधन में बढ़ी नाराज़गी की सुगबुगाहट, मांझी की चुप्पी के पीछे छिपे कई सियासी संकेत

बी के झा

NSK

पटना / नई दिल्ली, 5 अक्टूबर

बिहार की सियासत इन दिनों एक बार फिर गरमा गई है। रविवार को उस वक्त राजनीतिक गलियारे में हलचल मच गई जब बीजेपी के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान अचानक हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से उनके सरकारी आवास पर मिलने पहुंचे। मुलाकात के दौरान विनोद तावड़े और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी मौजूद रहे।बैठक के बाद मांझी ने मीडिया से बातचीत में कहा —सीट बंटवारे को लेकर चर्चा हुई है, बहुत जल्द सब तय हो जाएगा। एनडीए में सब ऑल इज वेल है।”लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मुलाकात केवल “सौहार्द्र” दिखाने के लिए नहीं थी, बल्कि एनडीए में भीतरखाने मची खींचतान को शांत करने की कोशिश थी।सीट बंटवारे पर एनडीए में बढ़ी खींचतानबिहार में विधानसभा चुनाव करीब हैं और एनडीए गठबंधन के घटक दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर रस्साकशी जारी है। बीजेपी, जेडीयू, एलजेपी (रामविलास), हम और आरएलएम — पांच दलों का यह गठबंधन अभी तक सीटों के अंतिम फार्मूले पर सहमति नहीं बना पाया है।जानकारी के अनुसार, बीजेपी के अंदरूनी बैठकों में 60 “सिटिंग सीटों” पर मंथन हो चुका है। वहीं, हारी हुई सीटों और नये संभावित चेहरों को लेकर भी रणनीति बन रही है। इस बीच, जीतनराम मांझी की पार्टी हम को मिलने वाली सीटों की संख्या को लेकर असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं।मांझी की नाराज़गी और चिराग की बढ़ती अहमियतराजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मांझी इस बात से खफा हैं कि एनडीए के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में चिराग पासवान की अहमियत लगातार बढ़ती जा रही है। बीजेपी आलाकमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ चिराग पासवान की निकटता को हम पार्टी में असंतोष का बड़ा कारण माना जा रहा है।माना जा रहा है कि मांझी अब यह महसूस करने लगे हैं कि उनकी पार्टी को गठबंधन में वह सम्मान नहीं मिल रहा जो उनके राजनीतिक अनुभव और जातीय समीकरणों के हिसाब से मिलना चाहिए। यही वजह है कि उन्होंने अपने अगले कदम को लेकर गंभीर मंथन शुरू कर दिया है।स्रोतों का कहना है कि अगर सीट बंटवारे में हम को पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिली, तो मांझी एनडीए से अलग होकर तीसरे मोर्चे का विकल्प तलाश सकते हैं।जेडीयू में भी बढ़ रहा असंतोषएनडीए के अंदर केवल हम ही नहीं, बल्कि जेडीयू के कुछ नेता भी बीजेपी की रणनीति से असहज हैं। उन्हें लग रहा है कि बीजेपी नेतृत्व ज्यादा तरजीह चिराग पासवान को दे रहा है, जिससे नीतीश कुमार के समर्थक खेमे में बेचैनी है।राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह स्थिति अगर संभाली नहीं गई, तो एनडीए को सीट बंटवारे के बाद गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है।सवर्ण वोटर्स में भी बदलाव की बयारदिलचस्प बात यह है कि इस बार सवर्ण मतदाताओं का झुकाव पारंपरिक एनडीए से थोड़ा हटकर “इंडी गठबंधन” (विपक्षी मोर्चा) की ओर जाता दिख रहा है।इसके पीछे कारण हैं —स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों की असंतुलित घोषणा,टिकट वितरण में जातीय असमानता की भावना,और चिराग पासवान को मिली “अत्यधिक अहमियत”।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर बीजेपी ने इन बारीक समीकरणों को समय रहते नहीं संभाला, तो यह वोट शिफ्ट एनडीए के लिए कठिन चुनौती बन सकता है।धर्मेंद्र प्रधान की सक्रियता से क्या निकलेगा परिणाम?धर्मेंद्र प्रधान का बिहार दौरा इस लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। उन्होंने पटना में बीजेपी चुनाव समिति की बैठक ली, जहां प्रत्याशियों की सूची और हारी सीटों पर रणनीति पर चर्चा हुई।अब मांझी और उपेंद्र कुशवाहा से मुलाकातें यह संकेत दे रही हैं कि बीजेपी नेतृत्व किसी भी तरह गठबंधन की गांठ खुलने नहीं देना चाहता।उधर, सूत्रों की मानें तो धर्मेंद्र प्रधान जल्द ही एनडीए के सभी घटक दलों को एक मंच पर बुलाकर सीट बंटवारे पर अंतिम मुहर लगवाने की कोशिश करेंगे।मुख्य बिंदु धर्मेंद्र प्रधान, विनोद तावड़े और सम्राट चौधरी ने मांझी से की अहम मुलाकात।सीट बंटवारे को लेकर बढ़ी राजनीतिक हलचल।मांझी की पार्टी को मिली सीटों से असंतोष की खबरें।बीजेपी नेतृत्व में चिराग पासवान की बढ़ती अहमियत से सहयोगी दलों में नाराज़गी।सवर्ण मतदाताओं का झुकाव विपक्षी गठबंधन की ओर बढ़ता दिखा।

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